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दिव्यांगजनों का हुनर: गोबर और फूलों से बन रहे पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद

महोबा की संस्था दिव्यांगों को गोबर और फूलों से धार्मिक प्रतिमाएं व धूपबत्ती बनाने का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बना रही है, साथ ही पर्यावरण संरक्षण...

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•संवाददाता: अभिनय सिंह चंदेल
दिव्यांगजनों का हुनर: गोबर और फूलों से बन रहे पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद

MAHOBA | संवाददाता: अभिनय सिंह चंदेल

द क्लिफ न्यूज़ | महोबा | 5 नवंबर 2026

बुंदेलखंड सोसायटी फॉर रूरल डेवलपमेंट संस्था महोबा में दिव्यांगता को कमजोरी नहीं, बल्कि हुनर और आत्मनिर्भरता की शक्ति में बदल रही है। पिछले एक दशक से यह संस्था मानसिक, शारीरिक, मूक-बधिर और सेरेब्रल पाल्सी से प्रभावित विद्यार्थियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। इस अनूठी पहल के तहत, दिव्यांग विद्यार्थी गाय के गोबर और मंदिरों से एकत्रित फूलों का उपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल आकर्षक धार्मिक प्रतिमाएं और धूपबत्तियां तैयार कर रहे हैं, जिससे उनकी जिंदगी संवर रही है।

संस्था में, विद्यार्थी गाय के गोबर में इमली के बीज, मैदा, लकड़ी का पाउडर और मुल्तानी मिट्टी का मिश्रण मिलाकर रामदरबार, लक्ष्मी-गणेश, राधा-कृष्ण और शिव की सुंदर प्रतिमाओं के साथ-साथ स्मृति चिह्न भी बना रहे हैं। ये उत्पाद पूरी तरह से जैविक और पर्यावरण के अनुकूल हैं। इसके अलावा, मंदिरों में अर्पित किए जाने वाले फूलों का पुन: उपयोग करके धूपबत्ती का निर्माण किया जा रहा है। धूपबत्ती में गोबर, फूलों का पाउडर, कपूर, लोबान और नारियल तेल के मिश्रण का उपयोग होता है, जो जलने पर एक सुखद अनुभव प्रदान करता है और पर्यावरण में प्रदूषण को कम करने में भी सहायक है।

पर्यावरण संरक्षण के साथ आत्मनिर्भरता

यह पहल न केवल दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर कर रही है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज में एक मजबूत संदेश भी दे रही है। संस्था के प्रबंधक आकाश राय और विशेष शिक्षक दीप शिखा के कुशल मार्गदर्शन में शालिनी प्रजापति, प्रीति प्रजापति, इंद्रेश यादव, दिनेश कुशवाहा, लवली अनुरागी, दिव्या अनुरागी, मनोज प्रजापति, शिखा चौरसिया, अखिलेश रैकवार, उषा रैकवार, बबलू, आशीष और श्याम बिहारी जैसे विद्यार्थी विभिन्न कौशल सीख रहे हैं। मूर्तियों की रंगाई का कार्य उज्ज्वल केचौरसिया की देखरेख में होता है, जबकि देवेंद्र प्रजापति उत्पादन प्रक्रिया में सहयोग करते हैं।

तैयार उत्पादों को सुखाने के बाद उनकी रंगाई, पैकिंग और जेल भरने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया दिव्यांग विद्यार्थियों को न केवल एक नया हुनर सिखाती है, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र और स्वावलंबी बनाने में भी मदद करती है। संस्था का यह प्रयास समाज में दिव्यांगजनों के प्रति दृष्टिकोण बदलने और उन्हें समान अवसर प्रदान करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।

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