ब्लाउंट डिज़ीज़: बच्चों के धनुषाकार पैरों की बढ़ती विकृति, समय पर पहचान है जरूरी
ब्लाउंट डिज़ीज़, जिसे टिबिया वारा भी कहते हैं, बच्चों में पैरों के लगातार धनुषाकार होने की एक गंभीर अस्थि-विकास संबंधी बीमारी है। समय पर निदान और उपचार से जटिलताओं को कम किया जा सकता है।

द क्लिफ न्यूज़ | 4 नवंबर 2026
बच्चों के पैरों का धनुषाकार दिखना, जिसे सामान्य भाषा में 'बो लेग्स' भी कहते हैं, अक्सर माता-पिता के लिए चिंता का विषय होता है। हालांकि, बचपन के विकास के शुरुआती चरणों में यह एक सामान्य स्थिति हो सकती है जो अक्सर अपने आप ठीक हो जाती है। लेकिन जब यह धनुष जैसी विकृति उम्र के साथ कम होने के बजाय लगातार बढ़ने लगे, तो यह ब्लाउंट डिज़ीज़ (Blount Disease) नामक एक गंभीर अस्थि-विकास संबंधी विकार का संकेत हो सकती है। इस बीमारी को चिकित्सा जगत में टिबिया वारा (Tibia Vara) के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थिति मुख्य रूप से पिंडली की हड्डी, जिसे टिबिया कहते हैं, के ऊपरी अंदरूनी हिस्से की ग्रोथ प्लेट को प्रभावित करती है। इसके परिणामस्वरूप, हड्डी का विकास असमान हो जाता है, जिससे घुटने बाहर की ओर मुड़ने लगते हैं। चिकित्सा विज्ञान में इस विशिष्ट विकृति को जेनु वेरम (Genu Varum) कहा जाता है, जो घुटनों के अंदर की ओर झुकने वाली जेनु वैल्गम (Genu Valgum) विकृति से भिन्न है।
ब्लाउंट डिज़ीज़ एक विकासात्मक अस्थि विकार है जहाँ टिबिया के ऊपरी हिस्से की भीतरी (मीडियल) ग्रोथ प्लेट का विकास अवरुद्ध हो जाता है, जबकि बाहरी (लैटरल) हिस्से की वृद्धि अपेक्षाकृत सामान्य रूप से जारी रहती है। इस असमान वृद्धि के कारण पिंडली की हड्डी धीरे-धीरे अंदर की ओर मुड़ने लगती है। यदि इस बीमारी की पहचान और उपचार समय पर न किया जाए, तो यह बच्चों के घुटनों की संरचना, उनकी चाल, शरीर के भार का वितरण और भविष्य में जोड़ों के स्वास्थ्य पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
ब्लाउंट डिज़ीज़ के प्रकार और जोखिम कारक
रोग की शुरुआत के समय के आधार पर, ब्लाउंट डिज़ीज़ को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। इन्फैंटाइल ब्लाउंट डिज़ीज़ (Infantile Blount's Disease) चार वर्ष से कम आयु के शिशुओं और छोटे बच्चों में पाई जाती है। जुवेनाइल (Juvenile) प्रकार लगभग चार से दस वर्ष की आयु के बच्चों को प्रभावित करता है, जबकि एडोलसेंट (Adolescent) प्रकार दस वर्ष से अधिक आयु के किशोरों में विकसित होता है। यह ध्यान देने योग्य है कि विभिन्न चिकित्सकीय वर्गीकरणों में इन आयु सीमाओं में थोड़ा अंतर हो सकता है। बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही इसकी पहचान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जैसे-जैसे बच्चे की उम्र बढ़ती है, विकृति अधिक जटिल और उपचार में कठिन हो सकती है।
इस बीमारी के विकास में कई जोखिम कारक योगदान कर सकते हैं। बचपन का मोटापा (childhood obesity) एक प्रमुख कारक है, क्योंकि अतिरिक्त शारीरिक वजन बढ़ती हुई हड्डियों की ग्रोथ प्लेट पर असमान दबाव डालता है। इसके अतिरिक्त, बहुत कम उम्र में चलना शुरू करना, घुटनों पर अत्यधिक यांत्रिक भार (mechanical stress), और आनुवंशिक प्रवृत्ति (genetic predisposition) भी इस स्थिति के विकास में भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि सभी मोटे बच्चों को ब्लाउंट डिज़ीज़ नहीं होती, और सामान्य वजन वाले बच्चों में भी यह बीमारी विकसित हो सकती है।
रोग के लक्षण और निदान
ब्लाउंट डिज़ीज़ का सबसे प्रमुख और स्पष्ट लक्षण पैरों का लगातार धनुषाकार (bowed) होना है। कुछ बच्चों में यह विकृति दोनों पैरों में देखी जाती है, जबकि कुछ में एक पैर में यह अधिक स्पष्ट होती है। इसके अलावा, पिंडली का अंदर की ओर मुड़ना (inward rotation), घुटनों की असमान स्थिति, और चलते समय असामान्य चाल (gait abnormality) भी इसके लक्षण हो सकते हैं। गंभीर मामलों में, चलते समय घुटने का अचानक बाहर की ओर एक झटका सा महसूस हो सकता है, जिसे 'लैटरल थ्रस्ट' (lateral thrust) कहा जाता है। यह घुटने पर असामान्य यांत्रिक दबाव का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
इस बीमारी की पुष्टि के लिए, डॉक्टर द्वारा चिकित्सकीय परीक्षण के साथ-साथ खड़े होकर वजन वहन करने की स्थिति में निचले अंगों (टांगों) का एक्स-रे (X-ray) लेना अत्यंत आवश्यक है। आवश्यकतानुसार, पूरे पैर की लंबाई का एक्स-रे लेकर यांत्रिक अक्ष (mechanical axis) और विकृति की सीमा का सटीक मूल्यांकन किया जाता है। रेडियोलॉजिकल निष्कर्षों में टिबियल मेटाफिसियल-डायफिसियल एंगल (tibial metaphyseal-diaphyseal angle) में वृद्धि, मीडियल प्रॉक्सिमल टिबिया में 'बीकिंग' (beaking) या उभार, और ग्रोथ प्लेट की अनियमितताएँ शामिल हो सकती हैं। विशेष रूप से इन्फैंटाइल ब्लाउंट डिज़ीज़ के निदान में, लैंगेनस्किल्ड (Langenskiöld) वर्गीकरण के छह चरणों का उपयोग करके रोग की गंभीरता का अनुमान लगाया जाता है, जो उपचार योजना बनाने में सहायक होता है।
उपचार के विकल्प और बचाव
ब्लाउंट डिज़ीज़ का उपचार रोगी की आयु, विकृति की गंभीरता, ग्रोथ प्लेट की स्थिति और बीमारी की प्रगति जैसे कारकों पर निर्भर करता है। शुरुआती अवस्था में, कुछ छोटे बच्चों को नी-एंकल-फुट ऑर्थोसिस (Knee-Ankle-Foot Orthosis - KAFO) जैसे ब्रेस (brace) पहनने से लाभ मिल सकता है। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ब्रेसिंग सभी रोगियों के लिए प्रभावी नहीं होती है।
बढ़ती हुई विकृति के मामलों में, प्रॉक्सिमल टिबियल करेक्टिव ऑस्टियोटॉमी (proximal tibial corrective osteotomy) नामक शल्य चिकित्सा प्रक्रिया द्वारा हड्डी की दिशा को सुधारा जा सकता है। जिन बच्चों में अभी शारीरिक वृद्धि की पर्याप्त संभावना शेष है, उनमें चयनित परिस्थितियों में 'गाइडेड ग्रोथ' (guided growth) तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। यह तकनीक बच्चों की प्राकृतिक वृद्धि का उपयोग करके विकृति को ठीक करने में मदद करती है। अत्यधिक गंभीर या जटिल बहुआयामी विकृतियों के लिए, इलिजारोव (Ilizarov) या टेलर स्पैटियल फ्रेम (Taylor spatial frame) जैसी विधियों का उपयोग करके क्रमिक सुधार किया जाता है। उपचार के बाद, नियमित चिकित्सकीय निगरानी आवश्यक है, क्योंकि कुछ मामलों में विकृति पुनः विकसित हो सकती है।
ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वे ब्लाउंट डिज़ीज़ को सामान्य फिजियोलॉजिकल बो लेग्स (physiological bowlegs) और पोषण संबंधी रिकेट्स (nutritional rickets) जैसी अन्य स्थितियों से स्पष्ट रूप से अलग पहचानें। सामान्य धनुषाकार पैर आमतौर पर दो वर्ष की आयु तक अपने आप ठीक हो जाते हैं, जबकि ब्लाउंट डिज़ीज़ में विकृति समय के साथ बढ़ती जाती है। शीघ्र निदान, उचित उपचार, वजन का प्रबंधन, और नियमित चिकित्सकीय निगरानी गंभीर विकृति, पैरों की लंबाई में अंतर (leg length discrepancy) और भविष्य में घुटने के समयपूर्व ऑस्टियोआर्थराइटिस (premature knee osteoarthritis) जैसी जटिलताओं के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
