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घुटनों का टेढ़ापन: कारण, निदान और नवीनतम उपचार विधियाँ

घुटनों का टेढ़ापन (नॉक नी) बच्चों और वयस्कों में एक आम समस्या है। इसके जन्मजात, विकासात्मक और अर्जित कारण हो सकते हैं। विशेषज्ञ निदान और उपचार से पैरों का संरेखण सुधारा जा सकता है।

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घुटनों का टेढ़ापन: कारण, निदान और नवीनतम उपचार विधियाँ

द क्लिफ न्यूज़ | 2 नवंबर 2026

घुटनों का टेढ़ापन, जिसे चिकित्सा जगत में जेनु वल्गम या नॉक नी के नाम से जाना जाता है, एक ऐसी शारीरिक स्थिति है जहाँ खड़े होने पर घुटने एक-दूसरे से सट जाते हैं, जबकि टखनों के बीच सामान्य से अधिक दूरी बनी रहती है। इस अवस्था में पैरों की बनावट अंग्रेजी अक्षर 'X' के समान प्रतीत होती है। यह स्थिति बचपन में सामान्य शारीरिक विकास का हिस्सा हो सकती है, लेकिन कई बार जन्मजात विकृतियों, हड्डियों के रोगों, चोटों या वृद्धि-प्लेट (growth plate) की समस्याओं के कारण भी उत्पन्न हो सकती है। ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों के अनुसार, रोगी की आयु, विकृति की गंभीरता, निचले अंगों के यांत्रिक अक्ष (mechanical axis) और हड्डियों की शेष विकास क्षमता जैसे कारक इसके उपचार को निर्धारित करते हैं।

शिशुओं और छोटे बच्चों में, घुटनों का टेढ़ापन सामान्य विकास का एक हिस्सा है। यह अक्सर दो से तीन वर्ष की आयु में दिखाई देना शुरू होता है और तीन से चार साल की उम्र तक अपने चरम पर पहुँच सकता है। इसके बाद, जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं और उनकी हड्डियाँ विकसित होती हैं, घुटनों का यह झुकाव स्वाभाविक रूप से सुधरने लगता है। अधिकांश बच्चों में, सात से आठ साल की उम्र तक पैरों का संरेखण वयस्क अवस्था के करीब सामान्य हो जाता है। यदि यह स्थिति दोनों पैरों में समान रूप से हो और कोई दर्द या चलने में कठिनाई न हो, तो इसे सामान्य माना जाता है और विशेष उपचार की आवश्यकता नहीं पड़ती।

जन्मजात और विकासात्मक कारण

जन्मजात जेनु वल्गम, जैसा कि नाम से स्पष्ट है, जन्म के समय से ही मौजूद होता है। इसका मूल कारण फीमर (जांघ की हड्डी), टिबिया (पिंडली की हड्डी) या कंकाल की संपूर्ण संरचना में पाई जाने वाली जन्मजात असामान्यताएं हो सकती हैं। स्केलेटल डिसप्लेसिया (skeletal dysplasia) जैसी स्थितियाँ, जिनमें हड्डियों का विकास और आकार सामान्य नहीं होता, इस समस्या को जन्म दे सकती हैं। ऐसे मामलों में, बच्चों के पैरों की लंबाई, शरीर के समग्र अनुपात और अन्य संभावित अस्थि विकृतियों की गहन जाँच आवश्यक होती है ताकि समस्या की जड़ तक पहुँचा जा सके।

अर्जित या रोगजन्य विकृतियाँ

घुटनों का टेढ़ापन विभिन्न बीमारियों और आघातों के कारण भी विकसित हो सकता है, जिन्हें अर्जित या रोगजन्य जेनु वल्गम कहा जाता है। विटामिन डी की गंभीर कमी से होने वाला रिकेट्स (rickets) एक प्रमुख कारण है, जिससे हड्डियाँ नरम और कमजोर हो जाती हैं। गुर्दे की बीमारियाँ भी हड्डियों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे ऑस्टियोडिस्ट्रॉफी (osteodystrophy) जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त, वृद्धि-प्लेट में चोट लगना, संक्रमण या फ्रैक्चर का गलत तरीके से जुड़ना भी घुटनों के टेढ़ेपन का कारण बन सकता है। मोटापा भी एक महत्वपूर्ण कारक है, क्योंकि यह घुटनों पर यांत्रिक भार को बढ़ाता है, जिससे समस्या की गंभीरता बढ़ सकती है। कुछ बच्चों में, वृद्धि-प्लेट के किसी एक हिस्से की असामान्य या अनियंत्रित गतिविधि के कारण हड्डी का विकास असंतुलित हो जाता है, जिससे घुटने टेढ़े हो जाते हैं।

निदान प्रक्रिया

जेनु वल्गम के निदान के लिए एक विस्तृत शारीरिक परीक्षण किया जाता है। इसमें चिकित्सक रोगी की चाल, दोनों घुटनों की स्थिति, पैरों की लंबाई में अंतर, टखनों के बीच की दूरी और घुटनों के झुकाव के कोण का बारीकी से आकलन करते हैं। समस्या की गंभीरता और उसके कारण को समझने के लिए, विशेष परिस्थितियों में खड़े होकर पूरे पैर का एक्स-रे (कूल्हे से टखने तक) कराया जाता है। यह एक्स-रे निचले अंगों के यांत्रिक अक्ष विचलन (mechanical axis deviation), फीमर और टिबिया के बीच के कोणों और विकृति के सटीक स्थान को निर्धारित करने में मदद करता है। यदि रिकेट्स या किसी अन्य चयापचय संबंधी अस्थि रोग का संदेह होता है, तो रक्त परीक्षण जैसे कैल्शियम, फॉस्फोरस, विटामिन डी के स्तर और अन्य आवश्यक जांचें की जा सकती हैं।

उपचार के आधुनिक तरीके

घुटनों के टेढ़ेपन का उपचार मुख्य रूप से रोगी की उम्र और विकृति के कारण पर निर्भर करता है। सामान्य विकासात्मक जेनु वल्गम के मामलों में, नियमित निगरानी पर्याप्त होती है। विशेष जूतों, व्यायामों या ब्रेसिज़ (braces) के उपयोग से सामान्य विकासात्मक विकृतियों को सीधा करने का कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, इसलिए ऐसे उपायों की सलाह आमतौर पर नहीं दी जाती। यदि विटामिन डी की कमी या अन्य अस्थि रोगों का पता चलता है, तो पहले उन मूल बीमारियों का उपचार किया जाता है।

गंभीर या लगातार बढ़ती विकृति वाले बच्चों में, जिनकी वृद्धि-प्लेटें अभी भी सक्रिय हैं, गाइडेड ग्रोथ सर्जरी (guided growth surgery) एक प्रभावी तरीका है। इसे हेमीएपिफिजियोडेसिस (hemi-epiphysiodesis) भी कहा जाता है। इस प्रक्रिया में, वृद्धि-प्लेट के कुछ हिस्सों को अस्थायी रूप से रोका जाता है ताकि हड्डी का विकास वांछित दिशा में हो और धीरे-धीरे घुटनों का संरेखण सुधर सके। जब हड्डियों की वृद्धि पूरी हो जाती है और विकृति गंभीर होती है, तो करेक्टिव ऑस्टियोटॉमी (corrective osteotomy) की जाती है। इसमें हड्डी को एक निश्चित कोण पर काटकर पुनः स्थापित किया जाता है, जिससे पैरों का यांत्रिक अक्ष ठीक हो जाता है।

समय पर निदान का महत्व

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यदि किसी बच्चे में सात से आठ वर्ष की आयु के बाद भी घुटनों का झुकाव बना रहता है, वह लगातार बढ़ रहा हो, एक पैर दूसरे की तुलना में अधिक प्रभावित हो, या घुटनों में दर्द एवं चलने में कठिनाई हो, तो तत्काल किसी विशेषज्ञ ऑर्थोपेडिक सर्जन से परामर्श लेना चाहिए। समय पर निदान और उचित उपचार से न केवल पैरों का संरेखण सुधरता है, बल्कि घुटनों की कार्यक्षमता भी बेहतर होती है और भविष्य में जोड़ों के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद मिलती है।

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