बच्चों में हिप डिसप्लेसिया: शीघ्र पहचान और सही उपचार से बचाएं स्थायी विकृति
कूल्हे के जोड़ के सामान्य विकास के लिए हिप डिसप्लेसिया (DDH) की शुरुआती पहचान महत्वपूर्ण है। समय पर उपचार न होने पर यह स्थायी विकृति और कम उम्र में गठिया का कारण बन सकता है।

द क्लिफ न्यूज़ | 6 नवंबर 2026
बच्चों में कूल्हे के जोड़ का स्वस्थ विकास, उनके शारीरिक संतुलन, चलने-फिरने की क्षमता और भविष्य में हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिप का डेवलपमेंटल डिसप्लेसिया (Developmental Dysplasia of the Hip–DDH) एक ऐसी विकासात्मक अस्थि संबंधी समस्या है, जिसमें कूल्हे का जोड़ सामान्य रूप से विकसित नहीं हो पाता। इस स्थिति में जांघ की हड्डी, जिसे फीमर कहा जाता है, का गोलाकार ऊपरी सिरा (Femoral Head) श्रोणि (Pelvis) की हड्डी में स्थित एसिटाबुलम (Acetabulum) के भीतर पर्याप्त स्थिरता से नहीं टिक पाता। इसके परिणामस्वरूप जोड़ में अस्थिरता, आंशिक विस्थापन (Subluxation) या पूर्ण डिसलोकेशन (Dislocation) हो सकता है। यदि समय रहते इस समस्या की पहचान और उपचार न किया जाए, तो यह बच्चों में स्थायी विकृति, असामान्य चाल और कम उम्र में ही ऑस्टियोआर्थराइटिस (Osteoarthritis) का कारण बन सकती है।
डीडीएच जन्म के समय मौजूद हो सकता है या शैशवावस्था के दौरान विकसित हो सकता है। यह लड़कियों में लड़कों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है। इस बीमारी के प्रमुख जोखिम कारकों में गर्भ में बच्चे का नितंब नीचे की ओर होना (Breech Presentation), परिवार में इस बीमारी का इतिहास होना, पहला बच्चा होना, गर्भ में एम्नियोटिक द्रव की कमी तथा पैरों की कुछ जन्मजात विकृतियां शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, शिशु के पैरों को सीधा करके कसकर लपेटने की आदत भी कूल्हे के सामान्य विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।
शुरुआती लक्षणों की पहचान में चुनौतियाँ
डीडीएच की शुरुआती अवस्था में अक्सर स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, जो इसकी पहचान में एक बड़ी चुनौती पेश करता है। नवजात शिशुओं में, प्रशिक्षित चिकित्सक बार्लो (Barlow) और ऑर्टोलानी (Ortolani) परीक्षणों के माध्यम से कूल्हे की अस्थिरता का आकलन करते हैं। प्रभावित कूल्हे को बाहर की ओर फैलाने में आने वाली कमी, दोनों जांघों या नितंबों की त्वचा की सिलवटों में असमानता, और एक पैर का दूसरे से छोटा दिखाई देना इसके संभावित संकेत हो सकते हैं। गैलेज़ी साइन (Galazzi sign) में घुटनों की ऊंचाई असमान दिखाई दे सकती है। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि केवल त्वचा की सिलवटों में असमानता इस बीमारी की पुष्टि नहीं करती है, इसके लिए आगे की जांच आवश्यक है।
बड़े बच्चों में, डीडीएच के कारण लंगड़ाकर चलना, ट्रेंडेलनबर्ग चाल (Trendelenburg gait), श्रोणि का एक ओर झुक जाना, प्रभावित पैर की लंबाई में कमी और कुछ मामलों में चलने की शुरुआत में देरी जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं। यदि दोनों कूल्हे प्रभावित हों, तो लक्षण अपेक्षाकृत कम स्पष्ट हो सकते हैं। प्रारंभिक अवस्था में दर्द का अभाव होने के कारण, अभिभावक अक्सर इस समस्या को बच्चे के विकास का सामान्य अंतर समझकर नजरअंदाज कर सकते हैं, जिससे सही समय पर इलाज में देरी हो जाती है।
नैदानिक प्रक्रिया और इमेजिंग तकनीकें
डीडीएच की पुष्टि के लिए शारीरिक परीक्षण के साथ-साथ उपयुक्त इमेजिंग तकनीकों का उपयोग आवश्यक है। सामान्यतः, चार से छह महीने से कम उम्र के शिशुओं में हिप अल्ट्रासाउंड (Hip Ultrasound) अधिक प्रभावी होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस आयु तक फीमरल हेड का एक बड़ा हिस्सा उपास्थि (Cartilage) से बना होता है, जो अल्ट्रासाउंड में बेहतर दिखाई देता है। इसके बाद, पेल्विस (Pelvis) के एपी व्यू (AP View) एक्स-रे (X-ray) महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। इस जांच में एसिटाबुलर इंडेक्स (Acetabular Index), शेन्टन लाइन (Shenton Line), फीमरल हेड की स्थिति तथा हड्डियों के विकास का मूल्यांकन किया जाता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में, समस्या की अधिक स्पष्ट समझ के लिए एमआरआई (MRI) या सीटी स्कैन (CT Scan) की आवश्यकता पड़ सकती है।
उपचार के विभिन्न चरण और तरीके
डीडीएच का उपचार मुख्य रूप से बच्चे की उम्र, कूल्हे के जोड़ की स्थिरता, विस्थापन की गंभीरता और एसिटाबुलम के विकास की स्थिति पर निर्भर करता है। जीवन के शुरुआती छह महीनों में, उपयुक्त शिशुओं के लिए पावलिक हार्नेस (Pavlik Harness) एक अत्यंत प्रभावी उपचार विकल्प है। यह विशेष उपकरण कूल्हे को एक सुरक्षित और सामान्य विकास की स्थिति में बनाए रखने में सहायता करता है।
छह से अठारह महीने की उम्र के बच्चों में, कभी-कभी एनेस्थीसिया (Anesthesia) के तहत क्लोज्ड रिडक्शन (Closed Reduction) और उसके बाद हिप स्पाइका कास्ट (Hip Spica Cast) की आवश्यकता हो सकती है। यदि क्लोज्ड रिडक्शन सफल न हो, तो ओपन रिडक्शन (Open Reduction) की प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसमें सर्जिकल चीरे के माध्यम से जोड़ को सही स्थिति में लाया जाता है।
अठारह महीने से अधिक उम्र के बच्चों के लिए, कई बार ओपन रिडक्शन के साथ-साथ पेल्विक (Pelvic) या फीमोरल ऑस्टियोटॉमी (Femoral Osteotomy) जैसी सर्जरी की आवश्यकता होती है। साल्टर (Salter), पेम्बर्टन (Pemberton) और डेगा (Dega) ऑस्टियोटॉमी जैसी विभिन्न तकनीकों का उपयोग करके कूल्हे के जोड़ की संरचना को सुधारा जा सकता है। उन किशोरों और युवा मरीजों में जिनकी हड्डियों की वृद्धि पूरी हो चुकी है, पेरियासेटेबुलर ऑस्टियोटॉमी (Periacetabular Osteotomy) एक उपयोगी सर्जिकल विकल्प हो सकता है। वयस्कों में उपचार का निर्णय उपास्थि की स्थिति और गठिया की गंभीरता के आधार पर लिया जाता है। यदि जोड़ अत्यधिक क्षतिग्रस्त हो गया हो, तो टोटल हिप रिप्लेसमेंट (Total Hip Replacement) सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है।
संभावित जटिलताएं और निवारण
डीडीएच के उपचार के दौरान कुछ संभावित जटिलताएं हो सकती हैं, जैसे फीमरल हेड का एवैस्कुलर नेक्रोसिस (Avascular Necrosis), यानी हड्डी में रक्त की आपूर्ति बाधित होना, जोड़ का दोबारा डिसलोकेट हो जाना, अवशिष्ट एसिटाबुलर डिसप्लेसिया (Residual Acetabular Dysplasia) यानी एसिटाबुलम का पूरी तरह से विकसित न होना, पैरों की लंबाई में अंतर और जोड़ की गति का सीमित हो जाना। इन संभावित जटिलताओं को देखते हुए, उपचार के बाद नियमित चिकित्सकीय निगरानी और बच्चे के विकास का निरंतर मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है।
निष्कर्ष: शीघ्रता ही कुंजी है
प्रत्येक नवजात शिशु की नियमित क्लिनिकल हिप स्क्रीनिंग (Clinical Hip Screening) अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। विशेष रूप से वे शिशु जिनमें ब्रीच प्रेजेंटेशन (Breech Presentation) या सकारात्मक पारिवारिक इतिहास (Positive Family History) हो, उनमें सामान्य शारीरिक परीक्षण के बावजूद, चिकित्सकीय सलाह के अनुसार समय पर इमेजिंग जांच करवाना महत्वपूर्ण है। डीडीएच के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि शीघ्र पहचान, बच्चे की उम्र के अनुरूप सही उपचार और नियमित फॉलो-अप के माध्यम से बच्चों को स्थायी विकृति, भविष्य में होने वाले दर्द और समयपूर्व हिप ऑस्टियोआर्थराइटिस से काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
