यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन पर सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान
यूपी में 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर सपा-कांग्रेस गठबंधन में सीटों के बंटवारे पर खींचतान चल रही है। दोनों दल अपनी मांगों पर अड़े हैं, जिससे राह मुश्किल दिख रही है।

द क्लिफ न्यूज़ | लखनऊ | 28 सितंबर 2026
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच संभावित गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर तनातनी की स्थिति बन गई है। जहां दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व ने साथ चुनाव लड़ने की बात कही है, वहीं सीट संख्या, उम्मीदवार चयन के आधार और विभिन्न क्षेत्रों में दावेदारी को लेकर दोनों पार्टियों के नेताओं की सार्वजनिक बयानबाजी ने राजनीतिक पारा चढ़ा दिया है। यह खींचतान इस बात का संकेत दे रही है कि गठबंधन की राह उतनी आसान नहीं होगी जितनी दिखती है।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में यह स्पष्ट किया है कि 2027 का आगामी चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ने की तैयारी है। हालांकि, उन्होंने सीटों के बंटवारे के लिए 'जीत की क्षमता' (winnability) को मुख्य आधार मानने पर जोर दिया है। इसका अर्थ है कि सपा केवल राजनीतिक समीकरणों के आधार पर सीटें आवंटित करने के बजाय, उन सीटों को प्राथमिकता देना चाहती है जहां उनका उम्मीदवार मजबूत स्थिति में हो या पार्टी का संगठन अधिक प्रभावी हो। इस दृष्टिकोण से, सपा संख्याबल से अधिक जमीनी हकीकत और उम्मीदवार की व्यक्तिगत क्षमता को महत्व दे रही है।
गठबंधन में दरार के संकेत और नेताओं की बयानबाजी
सीटों के बंटवारे का मुद्दा गरमाने के साथ-साथ दोनों दलों के नेताओं के बीच जुबानी जंग भी तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने हाल ही में सीट बंटवारे की बातचीत में हो रही देरी पर चिंता व्यक्त की और संकेत दिया कि यदि शीघ्र निर्णय नहीं हुआ तो कांग्रेस को अपनी स्वतंत्र तैयारी करनी पड़ सकती है। इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए सपा सांसद इकरा हसन ने अखिलेश यादव के नेतृत्व पर टिप्पणी की, जिससे दोनों पार्टियों के बीच मतभेद और भी स्पष्ट हो गए। इसके अतिरिक्त, सपा के वरिष्ठ नेताओं शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव के बयानों ने भी दोनों सहयोगियों के बीच की असहजता को सार्वजनिक कर दिया है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी सपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में कांग्रेस को मजबूत करने की बात कहकर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। उनके इस बयान के बाद मैनपुरी, इटावा और कन्नौज जैसे पारंपरिक सपा गढ़ों में भी कांग्रेस की दावेदारी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं। यह स्थिति इंगित करती है कि कांग्रेस न केवल अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहती है, बल्कि उन क्षेत्रों में भी अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रही है जहां वर्तमान में सपा का दबदबा है।
2024 लोकसभा चुनाव का प्रभाव और 2022 के आंकड़े
आगामी सीटों के बंटवारे की बातचीत में 2024 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन का भी महत्वपूर्ण संदर्भ रहेगा। उस दौरान, उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों पर सपा और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में दोनों दल अलग-अलग मैदान में उतरे थे। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार, 2022 के विधानसभा चुनावों में सपा ने 111 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस केवल दो सीटों पर ही सिमट गई थी। इन आंकड़ों को देखते हुए, कांग्रेस संभवतः अधिक सीटों पर अपनी दावेदारी मजबूत करने का प्रयास करेगी, वहीं सपा अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों को सुरक्षित रखना चाहेगी।
रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस पार्टी इस बार उत्तर प्रदेश में अपने संगठन को पुनर्जीवित करने और अधिक से अधिक सीटों पर अपनी दावेदारी पेश करने की तैयारी में है। पार्टी ने 403 विधानसभा क्षेत्रों का विस्तृत मूल्यांकन भी शुरू कर दिया है और सीटों को उनकी प्राथमिकता के आधार पर वर्गीकृत करने की प्रक्रिया चल रही है। कांग्रेस की ओर से सीटों पर बातचीत शीघ्र शुरू करने की मांग लगातार उठाई जा रही है।
आगे की राह और संभावित बातचीत
फिलहाल, दोनों दल अपने-अपने स्तर पर चुनावी तैयारियों को गति दे रहे हैं। सपा ने 'पीडीए रथयात्रा' जैसे अभियानों के माध्यम से जनता से जुड़ने और चुनावी माहौल बनाने का प्रयास शुरू कर दिया है। दूसरी ओर, कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और संभावित सीटों की पहचान पर ध्यान केंद्रित कर रही है। हालांकि शीर्ष नेतृत्व की ओर से साथ चुनाव लड़ने की सहमति बनी हुई है, लेकिन सीटों की संख्या, क्षेत्रवार दावेदारी का फार्मूला और उम्मीदवार चयन के मापदंड अभी भी अनिश्चित बने हुए हैं।
कुछ रिपोर्टों में यह भी संभावना जताई गई है कि अक्टूबर माह में सीट बंटवारे को लेकर औपचारिक बातचीत शुरू हो सकती है। इस प्रस्तावित बातचीत के बाद ही दोनों दलों के बीच सीटों के वास्तविक समीकरण और गठबंधन की मजबूती को लेकर तस्वीर कुछ अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है। सपा-कांग्रेस गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस राजनीतिक खींचतान और नेताओं की बयानबाजी से ऊपर उठकर, सीटों के बंटवारे पर एक सर्वमान्य सहमति बनाना होगी, जो दोनों दलों के कार्यकर्ताओं को स्वीकार्य हो और आगामी चुनाव में जीत की राह प्रशस्त करे।
