गौरझामर में अवैध अस्पतालों पर कार्रवाई टली, पत्रकार को मिली धमकी
सागर जिले के गौरझामर में झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा संचालित अवैध अस्पतालों की जांच और पत्रकार को मिली धमकी का मामला गरमाया। प्रशासन की निष्क्रियता से...

देवरी जिला सागर मध्यप्रदेश | संवाददाता: त्रिवेंद्र जाट
द क्लिफ न्यूज़ | 26 अक्टूबर 2026
मध्य प्रदेश के सागर जिले की देवरी तहसील के अंतर्गत आने वाले गौरझामर में कथित झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा संचालित अवैध चिकित्सालयों का मामला अब तूल पकड़ रहा है। स्थानीय पत्रकार मुकेश जैन द्वारा दो कथित डॉक्टरों, डॉ. टीके विश्वास और डॉ. अश्वनी मजूमदार पर अभद्रता और जान से मारने की धमकी देने की शिकायत दर्ज कराने के बाद, प्रशासन की निष्क्रियता पर सवाल उठ रहे हैं। इस घटनाक्रम ने क्षेत्र में संचालित हो रहे इन कथित अवैध अस्पतालों की वैधता और वहां दी जा रही स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, गौरझामर में कई ऐसे अस्पताल संचालित हो रहे हैं, जिन पर लंबे समय से बिना उचित चिकित्सकीय योग्यता और सरकारी अनुमति के मरीजों के इलाज करने के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय लोगों और पत्रकारों ने इन अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताते हुए कई बार प्रशासन से शिकायत की थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए, सागर कलेक्टर प्रतिभा पाल और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. देवेश पटेरिया ने देवरी के अनुविभागीय दंडाधिकारी (बीएमओ) डॉ. पूजा परमार को तत्काल जांच कर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश जारी किए थे। इन निर्देशों के बावजूद, जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्यवाही न होने से स्थानीय निवासियों में गहरा असंतोष फैल रहा है।
चिकित्सालयों की वैधता पर उठ रहे सवाल
सूत्रों के अनुसार, जिन दो कथित डॉक्टरों पर धमकी देने का आरोप है, उन्होंने पत्रकारों से यह दावा किया था कि उन्हें अस्पताल संचालन की अनुमति देवरी के बीएमओ कार्यालय से प्राप्त हुई है। यदि यह दावा सत्य है, तो यह स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। स्थानीय निवासियों और पत्रकार समुदाय की मांग है कि यदि ऐसे दावों के पीछे कोई सच्चाई है, तो स्वास्थ्य विभाग को सार्वजनिक रूप से उन दस्तावेजों को स्पष्ट करना चाहिए। यह भी सवाल उठता है कि क्या बीएमओ कार्यालय ऐसे किसी भी व्यक्ति को अस्पताल संचालन की अनुमति जारी कर सकता है, जो निर्धारित चिकित्सकीय योग्यताओं को पूरा न करता हो। हालांकि, इन दावों की अब तक कोई भी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
स्वास्थ्य मंत्री राजन शुक्ला द्वारा इस मामले को संज्ञान में लिए जाने और उनके द्वारा कलेक्टर को सख्त निर्देश दिए जाने के बावजूद, धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। प्रशासन की इस अप्रत्याशित विलंब और कार्रवाई की कमी से स्थानीय निवासियों में गहरा असंतोष व्याप्त है। उनका मानना है कि यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो प्रशासन को बिना किसी दबाव के कठोर कदम उठाने चाहिए, ताकि अवैध चिकित्सा पद्धतियों पर अंकुश लगाया जा सके और आमजन को सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें। कई नागरिकों ने यह भी चिंता व्यक्त की है कि इस तरह की निष्क्रियता अन्य झोलाछाप डॉक्टरों को भी बढ़ावा दे सकती है, जिससे जन स्वास्थ्य को और अधिक खतरा हो सकता है।
पत्रकार की सुरक्षा और प्रशासन की भूमिका
पत्रकार मुकेश जैन द्वारा स्थानीय थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराने के बाद, अब पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और अवैध चिकित्सा केंद्रों के संचालन की जांच करना, ये दोनों ही मुद्दे अत्यंत संवेदनशील हैं और इन पर त्वरित कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है। स्थानीय लोगों का यह भी मानना है कि यदि इस धमकी की घटना की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो भविष्य में इस तरह के मामले सामने आने पर कोई भी अपनी आवाज उठाने से डरेगा। यह एक गंभीर चिंता का विषय है कि जो पत्रकार समाज में हो रहे गलत कार्यों को उजागर करने का प्रयास करते हैं, उन्हें ही जान से मारने की धमकियां मिलने लगें।
क्षेत्र के जागरूक नागरिकों और पत्रकार समुदाय की प्रमुख मांग यह है कि स्वास्थ्य विभाग पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच करे। यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि क्या संबंधित अस्पतालों के पास वैध पंजीयन है और क्या वहां के डॉक्टर निर्धारित चिकित्सकीय मानकों को पूरा करते हैं। इसके साथ ही, पत्रकार को दी गई धमकी के आरोपों की पुलिस द्वारा भी तत्परता से जांच की जानी चाहिए, ताकि दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कड़ी कार्रवाई हो सके और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके। इस संबंध में, यह भी आवश्यक है कि प्रशासन ऐसे मामलों में त्वरित प्रतिक्रिया दे और नागरिकों को आश्वस्त करे कि उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य सर्वोपरि है।
फिलहाल, सभी की निगाहें जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अगले कदमों पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वे इन गंभीर आरोपों की हकीकत कब तक सामने लाते हैं और दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की जाती है। इस पूरे प्रकरण में प्रशासन की कार्यप्रणाली और उसकी संवेदनशीलता का परीक्षण होगा। यह मामला न केवल अवैध चिकित्सालयों के संचालन का है, बल्कि यह पत्रकारों के निर्भय होकर काम करने की स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित में आवाज़ उठाने के अधिकार से भी जुड़ा है। उम्मीद है कि प्रशासन इस बार गंभीरता से लेते हुए त्वरित और न्यायोचित कार्यवाही करेगा।
