मप्र में 1,134 करोड़ की GeM खरीदी की जांच के लिए एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय समिति का गठन जरूरी
सभी 374 नगरीय निकायों की जांच एक ही निष्पक्ष विशेषज्ञ समिति से कराई जाए, प्रत्येक निकाय की अलग रिपोर्ट बने

द क्लिफ़ न्यूज़, भोपाल।
मध्य प्रदेश के 374 नगरीय निकायों द्वारा पिछले तीन वर्षों में सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के माध्यम से की गई लगभग 1,134 करोड़ रुपये की सामग्री खरीदी में सामने आई मूल्य संबंधी विसंगतियों ने प्रदेश की प्रशासनिक और वित्तीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे द्वारा विभागीय बैठक में प्रस्तुत किए गए खरीदी संबंधी आंकड़ों के बाद यह मामला केवल महंगे सामान की खरीदी तक सीमित नहीं रह गया है। अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब नगरीय निकायों की निगरानी, निरीक्षण और नियंत्रण के लिए पहले से प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद थी, तब इतनी बड़ी राशि की खरीदी में असामान्य मूल्य अंतर समय रहते क्यों नहीं पकड़े गए?
इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच के लिए आवश्यक है कि राज्य सरकार एक ही स्वतंत्र, उच्चस्तरीय और छोटी विशेषज्ञ जांच समिति गठित करे। यही समिति प्रदेश के सभी 374 नगरीय निकायों की खरीदी की एक-एक करके अलग-अलग जांच करे। प्रत्येक निकाय के लिए स्वतंत्र निष्कर्ष तैयार किए जाएं, लेकिन जांच का नेतृत्व, नियंत्रण और अंतिम जवाबदेही एक ही समिति के पास रहे। इससे जांच के मानदंडों में एकरूपता बनी रहेगी और विभिन्न नगरीय निकायों, अधिकारियों तथा सप्लायरों के बीच संभावित संबंधों की समग्र जांच भी संभव होगी।
समिति में तीन से पांच ऐसे अनुभवी और निष्पक्ष व्यक्तियों को शामिल किया जाना चाहिए, जिनका सेवा रिकॉर्ड साफ-सुथरा हो और जिन्हें प्रशासनिक जांच, सरकारी खरीद, वित्तीय लेखा परीक्षण तथा आर्थिक अनियमितताओं की जांच का पर्याप्त अनुभव हो। इसके लिए केवल नगरीय प्रशासन विभाग के वर्तमान अधिकारियों पर निर्भर रहना उचित नहीं होगा। अन्य विभागों के योग्य सेवारत अधिकारियों, अनुभवी सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और वित्तीय अन्वेषण विशेषज्ञों को भी शामिल किया जा सकता है। आवश्यकता के अनुसार समिति डिजिटल फॉरेंसिक और तकनीकी मूल्यांकन के विशेषज्ञों की सहायता ले सकती है, लेकिन सभी जांचों का अंतिम उत्तरदायित्व उसी एक समिति के पास रहना चाहिए।
समिति के सदस्यों का चयन केवल वरिष्ठता अथवा पद के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी ईमानदारी, निष्पक्षता, जांच संबंधी विशेषज्ञता और पूर्व कार्यप्रणाली के आधार पर होना चाहिए। ऐसे किसी अधिकारी को समिति में शामिल नहीं किया जाए, जिसकी संबंधित खरीदी, निगरानी व्यवस्था, संबंधित नगरीय निकायों या जांच के दायरे में आने वाले प्रशासनिक निर्णयों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबद्धता रही हो। समिति के सदस्यों से हितों के टकराव के संबंध में लिखित घोषणा भी ली जानी चाहिए।
इस प्रकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि नगरीय निकायों की कार्यप्रणाली पर निगरानी और नियंत्रण के लिए पहले से ही विभिन्न स्तरों पर प्रशासनिक एवं वैधानिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, संचालनालय नगरीय प्रशासन एवं विकास, संभागीय संयुक्त संचालक कार्यालयों तथा कलेक्टर कार्यालयों के स्तर पर अलग-अलग विषयों में निरीक्षण, समीक्षा, पर्यवेक्षण और आवश्यक कार्रवाई की जिम्मेदारियां निर्धारित हैं। संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों का दायित्व है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले निकायों के कार्यों पर नियमानुसार निगरानी रखें तथा अनियमितताओं की जानकारी मिलने पर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करें।
ऐसी स्थिति में जांच का दायरा केवल खरीदी करने वाले मुख्य नगर पालिका अधिकारियों, स्टोरकीपरों, इंजीनियरों और अन्य कर्मचारियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। जिन अधिकारियों पर खरीदी की निगरानी, वित्तीय नियंत्रण, निरीक्षण और प्रशासनिक समीक्षा की जिम्मेदारी थी, उनकी भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। यह पता लगाया जाना आवश्यक है कि संबंधित अवधि में किस अधिकारी के पास कौन-सा वैधानिक अथवा प्रशासनिक दायित्व था और उसने उसका किस सीमा तक निर्वहन किया।
यदि निर्धारित अवधि में निरीक्षण किए गए थे, तो उनकी रिपोर्ट में क्या दर्ज किया गया? क्या असामान्य खरीद दरों के संबंध में कोई आपत्ति दर्ज की गई? क्या किसी अधिकारी को मूल्य संबंधी विसंगतियों की जानकारी पहले से थी? यदि थी, तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? यदि निरीक्षण और समीक्षा नहीं की गई, तो उसके क्या कारण थे? इन प्रश्नों के दस्तावेज आधारित उत्तर सामने आने चाहिए।
वर्तमान में यह चिंता भी व्यक्त की जा रही है कि जिन विभागीय और प्रशासनिक अधिकारियों के स्तर पर निगरानी तथा नियंत्रण की जिम्मेदारी रही है, उन्हीं से इस मामले की जांच कराई जा रही है। यदि जांच की व्यवस्था वास्तव में ऐसी है, तो उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। नगरीय प्रशासन से जुड़े अधिकारी अपने सेवाकाल में नगरीय निकायों, संभागीय संयुक्त संचालक कार्यालयों, संचालनालय और शासन स्तर पर अलग-अलग पदों पर कार्यरत रहते हैं। ऐसी स्थिति में उनके पूर्व प्रशासनिक संबंधों और संभावित हितों के टकराव की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
यह उचित नहीं होगा कि जिस प्रशासनिक व्यवस्था की संभावित विफलता की जांच होनी है, उसी व्यवस्था से जुड़े और जांच के दायरे में आने वाले अधिकारी जांच की दिशा तथा निष्कर्ष निर्धारित करें। इससे वास्तविक जिम्मेदारियों के निर्धारण में बाधा आने और मामले की लीपापोती होने की आशंका पैदा हो सकती है। हालांकि किसी अधिकारी को बिना जांच दोषी नहीं माना जा सकता, लेकिन जांच प्रक्रिया को संदेह से मुक्त रखना सरकार की जिम्मेदारी है।
एक ही स्वतंत्र समिति द्वारा सभी 374 निकायों की जांच कराने का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि वह अलग-अलग निकायों में हुई खरीदी का तुलनात्मक अध्ययन भी कर सकेगी। इसके लिए सबसे पहले संबंधित तीन वर्षों के सभी खरीद आदेश, बोलियां, सप्लायर विवरण, तकनीकी स्वीकृतियां, सामग्री प्राप्ति प्रमाणपत्र, स्टॉक रजिस्टर, भुगतान अभिलेख और GeM के उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित किए जाएं।
समिति प्रत्येक निकाय की पूरी खरीद प्रक्रिया की जांच करे। केवल उन वस्तुओं की जांच पर्याप्त नहीं होगी जिनकी कीमतें असामान्य दिखाई दे रही हैं। यह भी पता लगाया जाए कि खरीद की आवश्यकता किसने निर्धारित की, तकनीकी शर्तें किसने तैयार कीं, सप्लायर के चयन में किसकी भूमिका रही, आदेश किसने स्वीकृत किया, सामग्री किसने प्राप्त की और भुगतान किसके अनुमोदन से हुआ।
विशेष रूप से मुख्य नगर पालिका अधिकारियों के स्थानांतरण और सप्लायरों की गतिविधियों का संयुक्त अध्ययन किया जाना चाहिए। यह पता लगाया जाए कि किसी सीएमओ की एक निकाय से दूसरी निकाय में पदस्थापना होने पर क्या उसके पूर्व कार्यस्थल के सप्लायर नई पदस्थापना वाले निकाय में भी सक्रिय हुए। क्या उन सप्लायरों को लगातार खरीद आदेश मिले? क्या पुराने निकाय से सीएमओ के स्थानांतरण के बाद संबंधित सप्लायर की कारोबारी गतिविधियां कम हुईं? यदि एक ही अधिकारी और सप्लायर का संबंध अनेक निकायों की खरीदी में बार-बार सामने आता है, तो उसके कारणों की विस्तृत जांच होनी चाहिए।
हालांकि केवल किसी सीएमओ के स्थानांतरण के साथ सप्लायर की गतिविधियां बढ़ने से मिलीभगत सिद्ध नहीं होती। इसके लिए संबंधित फर्मों की सामान्य कारोबारी गतिविधियों, बाजार में उपलब्धता, उत्पाद की आवश्यकता और अन्य स्वतंत्र प्रमाणों का परीक्षण करना होगा।
समिति को यह भी जांचना चाहिए कि कहीं अलग-अलग नामों से काम करने वाली सप्लायर फर्मों का वास्तविक नियंत्रण किसी एक व्यक्ति या कारोबारी समूह के पास तो नहीं था। इसके लिए फर्मों के पंजीयन, GSTIN, PAN, पते, संचालकों, भागीदारों और उपलब्ध स्वामित्व संबंधी विवरणों का मिलान किया जा सकता है। प्रतिस्पर्धी बोलियों में बार-बार एक ही समूह से संबंधित फर्मों की भागीदारी मिलने पर उसकी भी जांच आवश्यक होगी।
खरीदी की कीमतों में असामान्य अंतर का तकनीकी मूल्यांकन भी जरूरी है। उदाहरण के लिए, समान श्रेणी की एलईडी लाइट, रसायन अथवा कचरा वाहन अलग-अलग निकायों द्वारा अलग दरों पर खरीदे गए हों, तो उनकी तकनीकी विशेषताओं, गुणवत्ता, मात्रा, परिवहन, स्थापना, वारंटी तथा आपूर्ति की अन्य शर्तों की तुलना की जाए। केवल कीमतों के अंतर को भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक वित्तीय नुकसान का निर्धारण प्रमाणित तुलनीय दरों और प्राप्त सामग्री के आधार पर किया जाना चाहिए।
समिति द्वारा खरीदी गई सामग्री का भौतिक सत्यापन भी कराया जाए। यह पता लगाया जाए कि जिस सामग्री का भुगतान हुआ, वह वास्तव में संबंधित निकाय को प्राप्त हुई या नहीं। प्राप्त सामग्री निर्धारित गुणवत्ता और मात्रा के अनुरूप थी या नहीं। जिन वस्तुओं का उपयोग हो चुका है, उनके संबंध में स्टॉक रजिस्टर, वितरण अभिलेख और अन्य उपलब्ध प्रमाणों का परीक्षण किया जाए।
GeM पोर्टल की डिजिटल ऑडिट ट्रेल का परीक्षण भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। संबंधित अधिकारियों की अधिकृत यूजर आईडी, खरीद आदेश तैयार करने, स्वीकृति देने और भुगतान संबंधी गतिविधियों के उपलब्ध रिकॉर्ड जांचे जाएं। यदि किसी सप्लायर द्वारा सरकारी अधिकारी की आईडी का अनधिकृत उपयोग करने अथवा रिमोट एक्सेस के माध्यम से खरीद प्रक्रिया प्रभावित करने की आशंका के ठोस संकेत मिलते हैं, तो विशेषज्ञों से डिजिटल फॉरेंसिक परीक्षण कराया जाए।
इसी प्रकार सप्लायरों को हुए भुगतान और संभावित अनुचित आर्थिक लाभ के संबंध में पर्याप्त प्रारंभिक साक्ष्य मिलने पर संबंधित प्रकरण को सक्षम आर्थिक अपराध जांच एजेंसी के समक्ष भेजा जाना चाहिए। प्रशासनिक जांच समिति को अपने वैधानिक अधिकारों की सीमा में रहकर कार्य करना होगा और जिन मामलों में आपराधिक अन्वेषण आवश्यक हो, उन्हें सक्षम एजेंसी को सौंपना होगा।
इस प्रकरण में पूर्व में राज्यस्तरीय GeM निगरानी डैशबोर्ड विकसित करने संबंधी पहल के दावों की भी जांच होनी चाहिए। तत्कालीन आयुक्त निकुंज श्रीवास्तव के कार्यकाल में ऐसी व्यवस्था विकसित करने के लिए कोई निर्देश जारी हुए थे या नहीं, इसकी मूल अभिलेखों से पुष्टि की जाए। यदि निर्देश दिए गए थे, तो उनका पालन कितना हुआ, किन अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई और निगरानी व्यवस्था प्रभावी क्यों नहीं बन सकी, इसका परीक्षण आवश्यक है।
एक ही समिति को सभी निकायों की जांच सौंपने के बावजूद प्रत्येक नगरीय निकाय का अलग जांच प्रतिवेदन तैयार किया जाना चाहिए। प्रतिवेदन में संबंधित निकाय की कुल खरीदी, संदिग्ध प्रकरण, प्रमाणित वित्तीय नुकसान, प्रक्रियागत अनियमितताएं, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका, निगरानी संबंधी विफलताएं तथा आवश्यक कार्रवाई की अनुशंसा स्पष्ट रूप से दर्ज हो।
इसके अतिरिक्त समिति एक समेकित राज्यस्तरीय प्रतिवेदन भी प्रस्तुत करे, जिसमें विभिन्न नगरीय निकायों में सामने आए समान खरीद पैटर्न, सप्लायरों के संभावित नेटवर्क, अधिकारियों की पदस्थापनाओं से जुड़े संबंध तथा निगरानी व्यवस्था की कमियों का विश्लेषण हो। इससे व्यक्तिगत जिम्मेदारी के साथ प्रणालीगत खामियों की पहचान भी संभव होगी।
समिति को आवश्यक अभिलेख प्राप्त करने, संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगने, विशेषज्ञ सहायता लेने और जांच प्रतिवेदन सक्षम प्राधिकारी को प्रस्तुत करने के लिए विधिसम्मत अधिकार दिए जाने चाहिए। जिन अधिकारियों के विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष प्रस्तावित हों, उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाए। साथ ही समिति को जांच पूरी करने के लिए चरणबद्ध और व्यावहारिक समयसीमा दी जाए तथा जांच की प्रगति की स्वतंत्र प्रशासनिक समीक्षा की व्यवस्था भी हो।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि समिति अपनी जांच में खरीदी से जुड़े अधिकारियों के साथ उन अधिकारियों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट करे, जिन पर संबंधित अवधि में निगरानी और नियंत्रण का दायित्व था। जहां लापरवाही, कर्तव्य निर्वहन में विफलता, नियमों का उल्लंघन अथवा मिलीभगत के प्रमाण मिलें, वहां दोष की प्रकृति और संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की अनुशंसा की जाए।
प्रदेश के सभी 374 नगरीय निकायों की जांच का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक निकाय में भ्रष्टाचार हुआ है। इसका उद्देश्य प्रत्येक निकाय की वित्तीय गतिविधियों की निष्पक्ष समीक्षा करना, वास्तविक अनियमितताओं की पहचान करना और निर्दोष अधिकारियों को अनावश्यक आरोपों से बचाते हुए जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध प्रमाण आधारित कार्रवाई सुनिश्चित करना होना चाहिए।
इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी की जांच केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि सामान महंगा क्यों खरीदा गया। जांच से यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि खरीदी किसके निर्णय से हुई, किसे अनुचित लाभ पहुंचा, अनियमितताएं रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी और निगरानी की व्यवस्था होने के बावजूद वे समय रहते क्यों नहीं पकड़ी गईं।
इसलिए राज्य सरकार को एक ही निष्पक्ष, अनुभवी और अधिकारसंपन्न उच्चस्तरीय जांच समिति गठित करके सभी 374 नगरीय निकायों की अलग-अलग जांच करानी चाहिए। खरीदी करने वालों के साथ उसकी निगरानी में विफल पाए जाने वाले अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। निष्पक्ष जांच की वास्तविक सफलता केवल अनियमित धनराशि का पता लगाने में नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन की सुरक्षा सुनिश्चित करने और भविष्य में ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए प्रभावी जवाबदेही स्थापित करने में होगी।
