मप्र के नगरीय निकायों में खरीदी घोटाले की आशंका, 1,134 करोड़ के खर्च पर उठे गंभीर सवाल
GeM पोर्टल का उद्देश्य सरकारी खरीद को पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और दस्तावेज-आधारित बनाना है। लेकिन डिजिटल पोर्टल की उपस्थिति अपने आप उचित कीमत .....

द क्लिफ़ न्यूज़,भोपाल
मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में सरकारी धन से की गई सामग्री खरीदी का तरीका गंभीर सवालों के घेरे में है। प्रदेश के 374 नगरीय निकायों द्वारा तीन वर्षों में सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल से लगभग 1,134 करोड़ रुपये का सामान खरीदे जाने के बाद विभागीय विश्लेषण में एक जैसे या समान श्रेणी के उत्पादों की कीमतों में असाधारण अंतर सामने आया है। यह विवाद सार्वजनिक धन के इस्तेमाल में वित्तीय अनुशासन पर सवाल उठाता है।
मामले की चर्चा नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे की एक विभागीय बैठक का वीडियो सामने आने के बाद तेज हुई। भोपाल के भौंरी स्थित सुंदरलाल पटवा शहरी विकास प्रशिक्षण संस्थान में हुई बैठक में मुख्य नगर पालिका अधिकारियों और अन्य अधिकारियों के सामने खरीद से संबंधित विस्तृत आंकड़े रखे गए। राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम के अपर प्रबंध संचालक अंशुमन राज ने खरीद दरों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया।
प्रस्तुति का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष संभावित बचत से जुड़ा है। विभागीय विश्लेषण के अनुसार, यदि पिछले तीन वर्षों की खरीदी औसत दरों पर की जाती, तो लगभग 200 से 250 करोड़ रुपये की बचत संभव थी। ऊपरी अनुमान 1,134 करोड़ रुपये के कुल व्यय का लगभग 22 प्रतिशत बैठता है। हालांकि 250 करोड़ रुपये को सिद्ध भ्रष्टाचार नहीं कहा जा सकता। वास्तविक नुकसान दस्तावेजों और तकनीकी विशेषताओं की जांच से ही निर्धारित होगा।
सबसे चर्चित उदाहरण 60 वॉट की एलईडी लाइट का है। प्रस्तुति में बताया गया कि एक नगरीय निकाय ने ऐसी लाइट 306 रुपये में खरीदी, जबकि भोपाल में इसी श्रेणी की लाइट की दर 11,800 रुपये दर्ज हुई। दर का अंतर 11,494 रुपये यानी करीब 38.6 गुना है। संबंधित लाइटों की वास्तविक बनावट, ब्रांड, वारंटी और स्थापना की शर्तें समान थीं या नहीं, यह जांच का विषय है। फिर भी इतनी बड़ी विसंगति खरीद की स्वीकृति और मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठाती है।
सफाई में इस्तेमाल होने वाले फिनाइल या फेनोलिक कीटाणुनाशक की दरों ने भी अधिकारियों को चौंकाया। एक खरीद में प्रति लीटर पांच रुपये की दर का उल्लेख किया गया, जबकि दूसरी प्रविष्टि में 33,500 रुपये तक का मूल्य सामने आया। दर्ज दरों का अनुपात 6,700 गुना बनता है। हालांकि इकाई, पैक आकार, सांद्रता या डेटा प्रविष्टि की गलती की संभावना भी जांचनी होगी।
कचरा वाहनों की खरीद में भी उल्लेखनीय अंतर बताया गया। अपर मुख्य सचिव ने बैठक में उदाहरण दिया कि एक निकाय ने करीब दो लाख रुपये में कचरा वाहन खरीदा, जबकि दूसरे ने समान बताया गया वाहन चार अतिरिक्त डस्टबिन के साथ लगभग छह लाख रुपये में लिया। यानी कीमत तीन गुनी और अंतर चार लाख रुपये रहा। संजय दुबे ने ऐसे निकायों की जरूरत पर भी सवाल उठाया जिन्होंने डेढ़ करोड़ रुपये तक की लागत वाले कचरा वाहन खरीदे, जबकि उनके वार्डों की संख्या और वाहनों के वास्तविक उपयोग का औचित्य स्पष्ट नहीं था।
यह मामला कुछ चुनिंदा उत्पादों तक सीमित नहीं दिखाई देता। प्रकाशित विवरणों के अनुसार, तीन वर्षों में कचरा टिपर और डंपर की खरीद पर करीब 65 करोड़ रुपये, स्ट्रीट लाइट संबंधी खरीद पर लगभग 49 करोड़ रुपये और कीटाणुनाशकों पर करीब 18 करोड़ रुपये खर्च होने का उल्लेख है। एक नगर परिषद द्वारा लगभग 97 लाख रुपये के जीआई ऑक्टागोनल खंभे खरीदने पर भी सवाल उठे कि इतने खंभों को लगाने के लिए पर्याप्त स्थान और स्वीकृत कार्य मौजूद हैं या नहीं। प्रत्येक खरीद का भौतिक सत्यापन जरूरी है।
अंशुमन राज ने यह भी बताया कि वर्ष 2023 में एक शिकायत के परीक्षण के दौरान उन्हें एक निकाय द्वारा 200 एलईडी बल्बों पर 60 लाख रुपये खर्च किए जाने का मामला मिला था। इन संख्याओं के आधार पर प्रति बल्ब औसत खर्च 30 हजार रुपये बनता है। उनके अनुसार, इसी प्रकरण ने प्रदेशभर की खरीद का विश्लेषण करने की पहल को जन्म दिया। इसके मूल दस्तावेजों का सत्यापन जरूरी है।
GeM पोर्टल का उद्देश्य सरकारी खरीद को पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और दस्तावेज-आधारित बनाना है। लेकिन डिजिटल पोर्टल की उपस्थिति अपने आप उचित कीमत की गारंटी नहीं देती। यदि खरीदी की मांग अनावश्यक हो, विनिर्देश किसी खास आपूर्तिकर्ता के अनुकूल बनाए जाएं, प्रतिस्पर्धी विकल्पों की तुलना न हो अथवा वस्तु प्राप्त होने के बाद गुणवत्ता परीक्षण न किया जाए, तो ऑनलाइन प्रक्रिया के बावजूद सार्वजनिक धन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए केवल पोर्टल का उपयोग कर लेना पर्याप्त वित्तीय निगरानी नहीं माना जा सकता।
जांच में सबसे पहले हर संदिग्ध खरीद की मूल फाइल सामने आनी चाहिए। स्वीकृत मांगपत्र, बजट मद, बोली की शर्तें, विक्रेता विवरण, तुलनात्मक मूल्यपत्र, खरीद आदेश, बिल, भुगतान और वस्तु प्राप्ति के प्रमाण का मिलान जरूरी है। वाहनों के पंजीयन और परिचालन, एलईडी की गुणवत्ता और फिटिंग तथा रसायनों के पैक और वास्तविक इकाई का मिलान किया जाए। जिन खरीदों में एक ही विक्रेता लगातार चुना गया हो, वहां प्रतिस्पर्धा और निविदा शर्तों की विशेष जांच की जानी चाहिए।
विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने अधिकारियों को चेताया कि किस निकाय ने क्या, कितनी मात्रा में और किस दर पर खरीदा है, उसका विवरण विभाग के पास मौजूद है। उनका संदेश था कि खरीद में अनियमितता करने वाले अधिकारी यह न मानें कि उनके निर्णय निगरानी से बाहर हैं। यह चेतावनी महत्वपूर्ण है, लेकिन जवाबदेही की वास्तविक कसौटी केवल कड़े बयान नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, समयबद्ध निष्कर्ष, दोष सिद्ध होने पर दंड और सार्वजनिक धन की वसूली होगी।
नगरीय विकास एवं आवास राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी ने वायरल वीडियो और खरीद से जुड़ी विसंगतियों की उच्चस्तरीय जांच कराने तथा दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई करने की बात कही है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सार्वजनिक धन के उपयोग पर सवाल उठाकर जवाबदेही तय करने की मांग की है। राजनीतिक आरोपों से परे, नागरिकों का वास्तविक हित इस बात में है कि जांच किसी पक्ष को बचाने या किसी को बिना साक्ष्य दोषी ठहराने के बजाय दस्तावेजों पर आधारित हो।
एक बड़े वित्तीय प्रश्न के साथ स्थानीय सेवाओं का प्रश्न भी जुड़ा है। नगरीय निकाय सफाई, पेयजल, सड़क, प्रकाश व्यवस्था और नालियों जैसी आवश्यक सेवाओं के लिए सीमित संसाधनों पर निर्भर हैं। अगर जरूरत से अधिक कीमत पर खरीद होती है तो वही राशि अतिरिक्त सफाई उपकरण, खराब स्ट्रीट लाइटों के सुधार या सार्वजनिक सुविधाओं के विस्तार में लग सकती थी। इसलिए संभावित अपव्यय का असर केवल लेखा पुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि शहरों और कस्बों में रहने वाले नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है।
सरकार को सभी निकायों के लिए खरीद दरों का नियमित तुलनात्मक डैशबोर्ड, असामान्य मूल्य पर स्वतः चेतावनी, स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण और बड़े अनुबंधों का जोखिम-आधारित लेखा परीक्षण लागू करने पर विचार करना चाहिए। खरीद आदेश और वस्तु प्राप्ति की जानकारी सार्वजनिक होने से स्थानीय पार्षद, मीडिया और नागरिक भी निगरानी कर सकेंगे। शिकायत करने वालों की पहचान सुरक्षित रखने तथा जांच के निष्कर्ष और कार्रवाई की स्थिति प्रकाशित करने की व्यवस्था भी विश्वास बढ़ाएगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर असामान्य कीमत को बिना जांच भ्रष्टाचार कहना जितना अनुचित है, उतना ही गलत यह मान लेना भी होगा कि डिजिटल पोर्टल पर हुई हर खरीदी स्वतः निष्पक्ष है। प्रदेश के 374 निकायों की 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी ने प्रशासन को महत्वपूर्ण चेतावनी दी है। अब सरकार के सामने चुनौती आरोपों की गंभीरता के अनुरूप प्रमाण जुटाने, जिम्मेदारी तय करने और खरीद व्यवस्था में स्थायी सुधार लाने की है। जनता को केवल जांच की घोषणा नहीं, उसका पारदर्शी परिणाम भी मिलना चाहिए।
