मप्र में 1,134 करोड़ की खरीदी पर सवाल, निगरानी की पहल के बावजूद समय रहते क्यों नहीं पकड़ी गईं विसंगतियां
तत्कालीन आयुक्त निकुंज श्रीवास्तव के कार्यकाल में उठी थी राज्यस्तरीय GeM डैशबोर्ड बनाने की मांग।

राजीव त्रिपाठी
पुराने निर्देशों, डैशबोर्ड की कार्यप्रणाली और अधिकारियों की जवाबदेही की जांच जरूरी।
मध्य प्रदेश के 374 नगरीय निकायों द्वारा पिछले तीन वर्षों में सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के माध्यम से की गई लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी में सामने आई मूल्य संबंधी विसंगतियों ने अब एक नया और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है। क्या प्रदेश में सरकारी खरीद की राज्यस्तरीय निगरानी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत वर्षों पहले ही महसूस कर ली गई थी? यदि ऐसा था, तो उस दिशा में क्या कार्रवाई हुई और असामान्य कीमतों पर खरीदी के मामले समय रहते क्यों नहीं पकड़े जा सके?
इस मामले में सामने आई नई जानकारी के अनुसार, नगरीय प्रशासन के तत्कालीन आयुक्त निकुंज श्रीवास्तव के कार्यकाल में GeM पोर्टल से खरीदी को लेकर कुछ निर्देश तैयार कराए गए थे। इसी दौरान नगरीय निकायों की खरीदी पर राज्यस्तर से निगरानी रखने के लिए एक साझा डैशबोर्ड विकसित करने का सुझाव भी दिया गया था। इस प्रक्रिया से जुड़े होने का दावा करने वाले एक जानकार के अनुसार, तत्कालीन आयुक्त को बताया गया था कि जिस प्रकार प्रत्येक नगरीय निकाय को GeM पोर्टल पर अपनी खरीद संबंधी जानकारी देखने की सुविधा मिलती है, उसी प्रकार राज्य मुख्यालय पर भी सभी निकायों की खरीद का समेकित विवरण उपलब्ध होना चाहिए।
जानकारी के अनुसार, इस सुझाव के बाद भोपाल में कार्यरत GeM से संबंधित अधिकारियों को बुलाकर राज्यस्तरीय डैशबोर्ड तैयार करने के लिए कहा गया था। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि डैशबोर्ड वास्तव में कब तैयार हुआ, कब से संचालित हुआ और उसमें किन स्तरों पर निगरानी की सुविधा उपलब्ध कराई गई। इन तथ्यों की पुष्टि संबंधित विभागीय अभिलेखों और अधिकारियों से होना आवश्यक है।
यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान विवाद में असामान्य खरीद दरों का पता विभिन्न निकायों के आंकड़ों की तुलनात्मक समीक्षा से ही चला है। यदि राज्यस्तर पर ऐसी व्यवस्था पहले से प्रभावी होती, जिसमें एक ही श्रेणी की सामग्री की खरीद दरों, मात्रा और आपूर्तिकर्ताओं का नियमित विश्लेषण किया जाता, तो संभावित विसंगतियों की पहचान पहले भी हो सकती थी।
हालांकि केवल डैशबोर्ड की उपलब्धता से अनियमितताएं स्वतः पकड़ में नहीं आतीं। इसके लिए आंकड़ों की नियमित समीक्षा, असामान्य कीमतों पर चेतावनी, तकनीकी परीक्षण और जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा समयबद्ध कार्रवाई की व्यवस्था भी जरूरी है।
विभागीय विश्लेषण में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के नगरीय निकायों ने तीन वर्षों में लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी की। यदि यह खरीदी तुलनात्मक औसत दरों पर होती, तो करीब 200 से 250 करोड़ रुपये की संभावित बचत का अनुमान लगाया गया है। यह अनुमान गंभीर वित्तीय परीक्षण की आवश्यकता दर्शाता है, हालांकि इसे जांच पूरी होने से पहले वास्तविक नुकसान अथवा प्रमाणित भ्रष्टाचार नहीं माना जा सकता।
खरीदी में मूल्य संबंधी अंतर के उदाहरण भी सामने आए हैं। एक निकाय द्वारा 60 वॉट की एलईडी लाइट 306 रुपये में खरीदने और भोपाल में इसी श्रेणी की लाइट की दर 11,800 रुपये दर्ज होने की जानकारी प्रस्तुत की गई। इसी प्रकार फिनाइल की खरीद में पांच रुपये और 33,500 रुपये जैसी अत्यधिक अलग-अलग दरों का उल्लेख हुआ। कचरा वाहनों की कीमतों में भी बड़ा अंतर बताया गया है।
इन उदाहरणों में वस्तुओं की तकनीकी विशेषताओं, मात्रा, पैकिंग, वारंटी, स्थापना खर्च और खरीद की शर्तों का सत्यापन जरूरी है। लेकिन इतने बड़े मूल्य अंतर सामने आने के बाद यह प्रश्न स्वाभाविक है कि खरीद स्वीकृत करने वाले अधिकारियों के स्तर पर तुलनात्मक मूल्य परीक्षण की क्या व्यवस्था थी।
इस पूरे प्रकरण का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू GeM पोर्टल पर सरकारी मशीनरी की निर्भरता है। GeM केंद्र सरकार द्वारा विकसित सरकारी खरीद का डिजिटल मंच है, जिसका उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और अधिक व्यवस्थित बनाना है। लेकिन सरकारी पोर्टल के माध्यम से खरीदी होने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक वस्तु की कीमत उचित है अथवा खरीद की आवश्यकता और गुणवत्ता का स्वतंत्र परीक्षण हो चुका है।
सरकारी खरीद व्यवस्था से जुड़े जानकारों के अनुसार, यदि विभाग केवल इस आधार पर किसी खरीद को उचित मान लें कि वह GeM पोर्टल के माध्यम से हुई है, तो मूल्य तुलना, गुणवत्ता परीक्षण और वास्तविक आवश्यकता के आकलन जैसे महत्वपूर्ण चरण कमजोर पड़ सकते हैं। कुछ आपूर्तिकर्ताओं द्वारा ऐसी प्रक्रियाओं का अनुचित लाभ उठाए जाने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता, हालांकि किसी विशेष विक्रेता की संलिप्तता जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही निर्धारित होनी चाहिए।
सबसे बड़ा प्रश्न अब यह है कि जब वर्षों पहले राज्यस्तरीय डैशबोर्ड की आवश्यकता पर विचार किया गया था, तब उस पहल का अंतिम परिणाम क्या रहा? क्या सभी नगरीय निकायों की खरीदी का डेटा राज्य मुख्यालय को नियमित रूप से उपलब्ध होने लगा था? यदि हां, तो उस डेटा की समीक्षा किस अधिकारी अथवा शाखा की जिम्मेदारी थी? क्या असामान्य दरों की पहचान करने के लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया विकसित की गई थी?
यदि डैशबोर्ड तैयार होने के बावजूद उसका प्रभावी उपयोग नहीं हुआ, तो यह निगरानी व्यवस्था की कार्यप्रणाली का प्रश्न है। यदि व्यवस्था तैयार ही नहीं हो सकी, तो यह जानना आवश्यक होगा कि प्रस्ताव पर कार्रवाई कहां और किन कारणों से रुकी। दोनों स्थितियों में पुराने आदेश, पत्राचार और तकनीकी कार्यान्वयन संबंधी अभिलेख महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
मामले में एक और गंभीर पहलू तत्काल सुधारात्मक निर्देशों का है। खरीद संबंधी बड़ी विसंगतियां सामने आने के बाद उच्चस्तरीय जांच की घोषणा की गई है, लेकिन उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं होता कि सभी नगरीय निकायों के लिए असामान्य दरों वाली खरीद की समीक्षा, संदिग्ध भुगतान के परीक्षण अथवा नई खरीद से पहले मूल्य सत्यापन के संबंध में कोई अलग और व्यापक निर्देश जारी किए गए हैं या नहीं।
जांच के साथ तत्काल निवारक उपायों की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि विभागीय जांच पूरी होने में समय लग सकता है, जबकि नियमित सरकारी खरीद जारी रहती है। ऐसे में केवल पुराने मामलों की जांच करना पर्याप्त नहीं होगा। भविष्य में समान विसंगतियों को रोकने के लिए प्रभावी नियंत्रण प्रणाली स्थापित करना भी जरूरी है।
यह समस्या केवल नगरीय निकायों तक सीमित होने की आशंका के दृष्टिकोण से भी परीक्षण योग्य है। राज्य सरकार के विभिन्न विभाग, निगम, मंडल और अन्य सार्वजनिक संस्थान GeM पोर्टल के माध्यम से सामग्री और उपकरण खरीदते हैं। यदि किसी विभाग में असामान्य मूल्य अंतर सामने आते हैं, तो अन्य विभागों की खरीद का जोखिम-आधारित परीक्षण भी उपयोगी हो सकता है। हालांकि बिना संबंधित आंकड़ों की जांच के यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सभी विभागों में इसी प्रकार की अनियमितताएं हो रही हैं।
राज्य सरकार के लिए अब आवश्यक है कि पिछले वर्षों में GeM खरीदी की निगरानी के संबंध में जारी निर्देशों, राज्यस्तरीय डैशबोर्ड की स्थापना और उसके उपयोग की स्थिति सार्वजनिक की जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि विभागीय अधिकारियों को असामान्य खरीद दरों की जानकारी कब और किस माध्यम से उपलब्ध हुई तथा उस पर क्या कार्रवाई की गई।
प्रदेश में सरकारी धन के प्रभावी उपयोग का प्रश्न केवल भ्रष्टाचार के आरोपों तक सीमित नहीं है। यदि निगरानी की तकनीकी व्यवस्था उपलब्ध होने के बावजूद उसका उपयोग नहीं किया गया, तो प्रशासनिक जवाबदेही की समीक्षा जरूरी होगी। और यदि वर्षों पहले सुझाई गई व्यवस्था लागू नहीं हुई, तो भविष्य के लिए उसकी स्थापना और संचालन की स्पष्ट समयसीमा तय की जानी चाहिए।
इस पूरे मामले का निष्कर्ष यही है कि सरकार को केवल 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी की जांच तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह भी पता लगाना चाहिए कि वर्षों पहले महसूस की गई निगरानी की जरूरत को कितनी गंभीरता से लिया गया। असामान्य खरीद दरों की पहचान करने वाली व्यवस्था यदि समय रहते प्रभावी हो जाती, तो संभावित वित्तीय अनियमितताओं का पता पहले लगने की संभावना थी। अब आवश्यक है कि जांच के साथ स्पष्ट निर्देश, नियमित मूल्य समीक्षा और जिम्मेदारी तय करने की स्थायी व्यवस्था विकसित की जाए, ताकि सरकारी पोर्टल का उपयोग सार्वजनिक धन की सुरक्षा का वास्तविक माध्यम बन सके।
