गरीब फरियादियों के अधिकारों से समझौता नहीं: हाईकोर्ट ने लिपिकों का ADPO पद पर 10% पदोन्नति कोटा किया रद्द
न्यायालय ने कहा—न्याय व्यवस्था में योग्य और अनुभवी अभियोजक अनिवार्य, प्रतियोगी परीक्षा को दरकिनार कर राजपत्रित पदों पर नियुक्ति का रास्ता असंवैधानिक ।

दिनेश सिकरवार, संवाददाता
द क्लिफ़ न्यूज़, ग्वालियर
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने न्याय व्यवस्था की गुणवत्ता, नागरिकों के मौलिक अधिकारों और निष्पक्ष अभियोजन को सर्वोपरि मानते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने मध्य प्रदेश लोक अभियोजन (राजपत्रित सेवा) भर्ती नियम, 1991 में वर्ष 2002 में किए गए उस संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया है, जिसके माध्यम से लिपिकीय संवर्ग के कर्मचारियों को सीधे सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी (ADPO) के द्वितीय श्रेणी राजपत्रित पद पर 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटा दिया गया था। न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने 29 अक्टूबर 2026 को सुनाए निर्णय में स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में अभियोजकों की योग्यता और दक्षता से समझौता नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि राज्य अपने नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता का संरक्षक है। इसलिए उसका दायित्व केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि न्यायालयों में सरकार की ओर से पैरवी करने वाले लोक अभियोजक योग्य, दक्ष और विधिक अनुभव रखने वाले हों। कमजोर और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों के लिए प्रभावी न्यायिक व्यवस्था का महत्व और अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि ऐसे नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्याय प्रणाली पर निर्भर रहते हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि 14 अक्टूबर 2002 की अधिसूचना के माध्यम से सीआरपीसी क्लर्क, सहायक ग्रेड-III और एपीसीडी ग्रेड-III के कर्मचारियों को विधि स्नातक की डिग्री तथा सात वर्ष की सेवा के आधार पर ADPO बनने का विशेष पदोन्नति मार्ग उपलब्ध कराया गया था। इससे पूर्व इन पदों पर शत-प्रतिशत नियुक्तियां सीधी भर्ती के माध्यम से होती थीं। संशोधन के बाद 90 प्रतिशत पद सीधी भर्ती और 10 प्रतिशत पद विभागीय पदोन्नति से भरने की व्यवस्था लागू की गई थी।
खंडपीठ ने इस व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि लिपिकीय कर्मचारियों के कार्य और लोक अभियोजकों की न्यायिक जिम्मेदारियों में बुनियादी अंतर है। लिपिकीय संवर्ग का कार्य मुख्यतः कार्यालयीन और प्रशासनिक होता है, जबकि ADPO को आपराधिक मामलों का संचालन, गवाहों का परीक्षण और प्रतिपरीक्षण, साक्ष्यों के आधार पर प्रभावी पैरवी तथा जांच एजेंसियों को विधिक परामर्श देने जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। केवल विधि स्नातक की डिग्री प्राप्त कर लेना इन जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए आवश्यक व्यावहारिक अनुभव का विकल्प नहीं हो सकता।
न्यायालय ने इस तथ्य पर भी चिंता जताई कि लोक सेवा आयोग की निर्धारित प्रतियोगी परीक्षा में सफल नहीं होने वाला व्यक्ति लिपिकीय पद पर नियुक्ति प्राप्त कर सात वर्ष बाद सीधे द्वितीय श्रेणी राजपत्रित अधिकारी बनने का अवसर हासिल कर सकता था। खंडपीठ ने ऐसी व्यवस्था को प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से होने वाली भर्ती प्रक्रिया को दरकिनार करने वाला रास्ता माना।
फैसले में लोक अभियोजकों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा गया कि अभियोजन की कमजोरी से आपराधिक न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से गवाहों के मुकरने, साक्ष्यों के प्रभावी प्रस्तुतीकरण और गंभीर अपराधों की सुनवाई में अभियोजक की दक्षता निर्णायक भूमिका निभाती है। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि लोक अभियोजक का दायित्व केवल सरकार का पक्ष प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि न्याय के प्रशासन में सहयोग करना भी है।
खंडपीठ ने अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24 और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 49 के संदर्भ में विधिक पात्रता पर भी विचार किया। न्यायालय ने कहा कि अदालत में ADPO के रूप में पैरवी करने के लिए अधिवक्ता के रूप में नामांकन और ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) उत्तीर्ण करने की आवश्यकता है। हालांकि, इन योग्यताओं को ADPO भर्ती नियमों में न्यूनतम पात्रता के रूप में शामिल करने का व्यापक प्रश्न किसी अन्य उपयुक्त मामले में विचारणीय बताया गया।
न्यायालय ने अभियोजन संचालक के 4 जुलाई 2019 के पत्र का भी संज्ञान लिया, जिसमें लिपिकीय संवर्ग से पदोन्नत अधिकारियों के प्रदर्शन पर सवाल उठाते हुए 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटा समाप्त करने की अनुशंसा की गई थी। खंडपीठ ने पाया कि राज्य सरकार इस व्यवस्था को जारी रखने का कोई संतोषजनक और तर्कसंगत आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी।
अंततः उच्च न्यायालय ने वर्ष 2002 के संशोधन को संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन मानते हुए निरस्त कर दिया। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिका दाखिल होने से पहले इस प्रावधान के अंतर्गत हो चुकी पदोन्नतियां फैसले से प्रभावित नहीं होंगी, क्योंकि संबंधित अधिकारियों को मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया था। साथ ही विवादित प्रावधान के अंतर्गत आगे पदोन्नति का रास्ता बंद कर दिया गया।
यह निर्णय केवल सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति से जुड़ा विवाद नहीं, बल्कि न्यायिक संस्थाओं में योग्यता, संवैधानिक समानता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप है। फैसले से यह संदेश सामने आया है कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए नियुक्तियों और पदोन्नतियों में वैधानिक पात्रता तथा पेशेवर दक्षता को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
