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1,134 करोड़ की सरकारी खरीदी पर लोकायुक्त का शिकंजा, जवाबदेही की बड़ी परीक्षा

अधिकारी स्थानीय निकायों में प्रशासनिक संचालन और अनेक वित्तीय निर्णयों की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

Few hours ago
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1,134 करोड़ की सरकारी खरीदी पर लोकायुक्त का शिकंजा, जवाबदेही की बड़ी परीक्षा

राजीव त्रिपाठी ✅

 

मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में पिछले तीन वर्षों के दौरान लगभग 1,134 करोड़ रुपये की सरकारी खरीदी में सामने आई कथित अनियमितताओं ने प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था, वित्तीय अनुशासन और सार्वजनिक खरीद प्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) और मध्य प्रदेश ई-नगर पालिका पोर्टल के माध्यम से हुई खरीद में एक ही प्रकार की वस्तुओं की कीमतों में असाधारण अंतर मिलने के बाद मामला अब विभागीय जांच से आगे बढ़कर लोकायुक्त संगठन की जांच के दायरे में पहुंचने की बात सामने आई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, लोकायुक्त पुलिस ने नगरीय विकास एवं आवास विभाग से पिछले तीन वर्षों की खरीद का विस्तृत रिकॉर्ड, डिजिटल साक्ष्य और अब तक की प्रशासनिक कार्रवाई की जानकारी मांगी है।

 

इस प्रकरण की गंभीरता केवल सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि डिजिटल पोर्टल, ऑनलाइन निविदा व्यवस्था और निर्धारित वित्तीय नियमों के बावजूद सरकारी खरीद में इतनी बड़ी मूल्य-विसंगतियां कैसे उत्पन्न हुईं। यदि तकनीकी जांच में सामने आए संदिग्ध लेनदेन की पुष्टि होती है, तो यह मामला स्थानीय निकायों की वित्तीय निगरानी व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता को भी रेखांकित करेगा।

 

प्राप्त जानकारी के अनुसार, लोकायुक्त पुलिस के महानिदेशक योगेश देशमुख के स्तर से नगरीय विकास एवं आवास विभाग के आयुक्त को पत्र भेजकर खरीद से संबंधित विस्तृत अभिलेख मांगे जाने की बात कही गई है। इनमें खरीद आदेश, भुगतान विवरण, आपूर्तिकर्ताओं की जानकारी, निविदा संबंधी दस्तावेज, एआई आधारित विश्लेषण तथा विभाग द्वारा पहले की गई जांच और कार्रवाई का रिकॉर्ड शामिल बताया गया है। इन दस्तावेजों के परीक्षण से यह स्पष्ट हो सकेगा कि मूल्य-विसंगतियां केवल प्रक्रियागत त्रुटियों का परिणाम थीं अथवा इनके पीछे सुनियोजित आर्थिक अनियमितता की आशंका है।

 

इस मामले में 392 अधिकारी-कर्मचारियों के जांच के दायरे में होने की जानकारी सामने आई है, जिनमें 135 मुख्य नगर पालिका अधिकारी शामिल बताए गए हैं। यह संख्या प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि मुख्य नगर पालिका अधिकारी स्थानीय निकायों में प्रशासनिक संचालन और अनेक वित्तीय निर्णयों की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। हालांकि जांच के दायरे में आने का अर्थ किसी अधिकारी का दोषी सिद्ध होना नहीं है। प्रत्येक अधिकारी की वास्तविक भूमिका, वित्तीय अधिकार, स्वीकृति प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर ही व्यक्तिगत जिम्मेदारी निर्धारित की जानी चाहिए।

 

राज्य सरकार द्वारा अब तक सात अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किए जाने और लगभग तीन से चार करोड़ रुपये की राशि की वसूली किए जाने की जानकारी भी दी गई है। इसके अतिरिक्त 80 से अधिक ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं पर कार्रवाई अथवा जांच का शिकंजा कसने की बात सामने आई है। इन आंकड़ों की अंतिम पुष्टि आधिकारिक कार्रवाई आदेशों से होना आवश्यक है। फिर भी यह प्रकरण एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है कि यदि संभावित वित्तीय अनियमितता का अनुमान लगभग 250 करोड़ रुपये तक है, तो अब तक की वसूली उसकी तुलना में इतनी सीमित क्यों है।

 

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू सरकारी खरीद की कीमतों में सामने आया असाधारण अंतर है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, कुछ निकायों में फिनायल की कीमत पांच रुपये प्रति लीटर दर्शाई गई, जबकि अन्य स्थानों पर उसी श्रेणी की वस्तु की कीमत 33,500 रुपये प्रति लीटर तक दर्ज होने की बात सामने आई। इसी प्रकार 60 वॉट की एलईडी लाइट एक स्थान पर 306 रुपये और दूसरे स्थान पर 11,800 रुपये में खरीदे जाने का उदाहरण सामने रखा गया है।

 

इन उदाहरणों से सरकारी खरीद की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठते हैं। हालांकि केवल कीमतों के अंतर के आधार पर भ्रष्टाचार का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। वस्तु की गुणवत्ता, तकनीकी विशिष्टताएं, मात्रा, ब्रांड, वारंटी, परिवहन, स्थापना और कर संबंधी शर्तें भी कीमत को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए जांच में यह निर्धारित करना आवश्यक होगा कि तुलना की गई वस्तुएं वास्तव में समान थीं या नहीं। यदि समान विशिष्टताओं वाली वस्तुओं की खरीद में असामान्य मूल्य-अंतर की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारियों और आपूर्तिकर्ताओं से उसका औचित्य स्पष्ट कराना जरूरी होगा।

 

इस प्रकरण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा विश्लेषण की भूमिका विशेष महत्व रखती है। बड़ी संख्या में खरीद आदेशों, वस्तुओं की दरों, आपूर्तिकर्ताओं और भुगतान विवरणों की तुलना सामान्य विभागीय जांच में अत्यधिक समय ले सकती है। एआई आधारित प्रणाली इन अभिलेखों में असामान्य मूल्य, बार-बार एक ही आपूर्तिकर्ता से खरीद, खरीद आदेशों के विभाजन और संदिग्ध लेनदेन के पैटर्न की पहचान करने में सहायता कर सकती है।

 

लेकिन एआई द्वारा किसी लेनदेन को संदिग्ध बताना स्वयं में अपराध का प्रमाण नहीं है। तकनीकी निष्कर्षों को मूल दस्तावेजों, बैंकिंग रिकॉर्ड, भौतिक आपूर्ति, स्टॉक रजिस्टर और संबंधित अधिकारियों के बयानों से प्रमाणित करना आवश्यक होगा। इसी प्रक्रिया से तकनीकी संदेह को विधिसम्मत जांच के निष्कर्ष में बदला जा सकेगा।

 

लोकायुक्त की जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी होगा कि खरीद प्रक्रिया में निर्णय लेने वाले अधिकारियों और सामग्री उपलब्ध कराने वाले आपूर्तिकर्ताओं के बीच किसी प्रकार की अनुचित मिलीभगत थी या नहीं। इसके लिए निविदाओं में भाग लेने वाली कंपनियों, उनके स्वामित्व, भुगतान प्राप्त करने वाले बैंक खातों, जीएसटी विवरण और खरीद आदेशों के डिजिटल रिकॉर्ड की जांच उपयोगी हो सकती है। यदि विभिन्न निकायों में एक ही आपूर्तिकर्ता द्वारा असामान्य दरों पर बार-बार सामग्री उपलब्ध कराने का पैटर्न मिलता है, तो उससे आगे की जांच के लिए महत्वपूर्ण सुराग मिल सकते हैं।

 

डिजिटल फॉरेंसिक जांच में पोर्टल पर लॉगिन करने वाले उपयोगकर्ताओं, आईपी एड्रेस, खरीद आदेश तैयार होने के समय, दस्तावेजों में किए गए संशोधनों और भुगतान स्वीकृति के क्रम का परीक्षण भी किया जाना चाहिए। इससे यह समझने में सहायता मिलेगी कि खरीद प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित हुई थी या किसी स्तर पर उसका अनुचित उपयोग किया गया। हालांकि ऐसे तकनीकी साक्ष्यों का संग्रह और परीक्षण विधिसम्मत तरीके से होना चाहिए, ताकि जांच के निष्कर्ष न्यायिक परीक्षण में भी विश्वसनीय बने रहें।

 

प्रकरण के आर्थिक प्रभाव को समझना भी आवश्यक है। प्रारंभिक विश्लेषण में लगभग 200 से 250 करोड़ रुपये की संभावित बचत का अनुमान सामने आया था। यह कुल 1,134 करोड़ रुपये की खरीद का लगभग 18 से 22 प्रतिशत है। इतनी बड़ी संभावित बचत स्थानीय निकायों की आर्थिक स्थिति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती थी। इसी धनराशि से पेयजल व्यवस्था, सड़क निर्माण, सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था, स्वच्छता और अन्य नागरिक सुविधाओं में व्यापक सुधार किया जा सकता था। हालांकि संभावित बचत और प्रमाणित आर्थिक नुकसान में अंतर बनाए रखना आवश्यक है। India News - The Indian Express +1

 

नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने इस मामले में विभागीय जवाबदेही पर जोर दिया है। उनके अनुसार, अनियमितताओं की गंभीरता के आधार पर अधिकारियों के विरुद्ध अलग-अलग स्तर की कार्रवाई की गई है। इनमें सेवा से बर्खास्तगी, वेतनवृद्धि रोकना, पदावनति और आर्थिक वसूली जैसी कार्रवाइयां शामिल हैं। विभाग का दावा है कि डिजिटल निगरानी और अनियमितताओं की पहचान की प्रक्रिया लगातार जारी है। The New Indian Express +1

 

इस मामले का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। विपक्ष ने सरकारी खरीद में सामने आई विसंगतियों को लेकर सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं। वहीं, नगरीय विकास एवं आवास राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी ने जांच और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की बात कही है। विभागीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की सार्वजनिक प्रतिक्रिया को लेकर भी राजनीतिक सवाल उठे हैं। ऐसे में सरकार के लिए आवश्यक है कि जांच को केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित न रखकर उसके निष्कर्ष पारदर्शी तरीके से सामने लाए। Nai Dunia +1

 

लोकायुक्त जांच में आगे आपराधिक प्रकरण दर्ज करने का प्रश्न साक्ष्यों पर निर्भर करेगा। विभागीय लापरवाही, वित्तीय नियमों का उल्लंघन और भ्रष्टाचार के आपराधिक आरोप अलग-अलग कानूनी विषय हैं। इसलिए किसी अधिकारी या आपूर्तिकर्ता के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने से पहले संबंधित अपराध के आवश्यक तत्वों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण जरूरी होगा। लोकायुक्त जांच शुरू होने की पुष्टि प्रकाशित समाचारों से होती है, लेकिन इस पूरे मामले में एफआईआर दर्ज होने या उसकी निश्चित तारीख की स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं है। Jagran +1

 

भविष्य में ऐसी अनियमितताओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रत्येक नगरीय निकाय में खरीद से पहले बाजार दरों का तुलनात्मक परीक्षण, बड़ी खरीद पर स्वतंत्र तकनीकी अनुमोदन, आपूर्ति का भौतिक सत्यापन और भुगतान से पहले डिजिटल ऑडिट अनिवार्य किया जाना चाहिए। साथ ही असामान्य दरों वाली खरीद पर स्वतः चेतावनी देने वाली प्रणाली विकसित की जा सकती है। इससे सरकारी खरीद में पारदर्शिता बढ़ेगी और अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी।

 

मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों की यह जांच केवल कुछ अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग की विश्वसनीयता से जुड़ी बड़ी परीक्षा है। सात अधिकारियों की बर्खास्तगी और करोड़ों रुपये की वसूली प्रशासनिक कार्रवाई का संकेत अवश्य है, लेकिन वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब प्रत्येक संदिग्ध खरीद का तथ्यात्मक परीक्षण हो, दोषियों की जिम्मेदारी निर्धारित की जाए, प्रमाणित आर्थिक नुकसान की वसूली हो और निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक कार्रवाई से संरक्षण मिले।

 

लोकायुक्त की जांच का उद्देश्य केवल कथित भ्रष्टाचार का खुलासा करना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को सुधारना भी होना चाहिए जिसमें सरकारी खरीद की कीमतों में असाधारण अंतर संभव हुआ। जनता के धन की सुरक्षा, निष्पक्ष जांच, प्रभावी वसूली और भविष्य की खरीद में पारदर्शिता सुनिश्चित करना ही इस पूरे प्रकरण में शासन की वास्तविक जवाबदेही की कसौटी होगी।

 

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