तोतों का बसेरा बचाने में इंदौर मेट्रो को ₹400 करोड़ अतिरिक्त खर्च का अंदेशा
इंदौर मेट्रो के रूट में बदलाव कर तोतों के प्राकृतिक आवास को बचाने की कोशिश में परियोजना की लागत ₹400 करोड़ बढ़ सकती है और 3-4 साल की देरी हो सकती है।

द क्लिफ न्यूज़ | इंदौर | 8 अक्टूबर 2026
इंदौर मेट्रो परियोजना, जो वर्तमान में अपनी पहली चरण की वाणिज्यिक सेवाओं के साथ संचालन में है, अब एक गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। शहर के रीगल टॉकीज और रानी सराय क्षेत्रों में स्थित 50-60 साल पुराने पेड़ों पर बसे तोतों के प्राकृतिक आवास को बचाने के प्रयास में मेट्रो के निर्माण कार्यक्रम और लागत पर भारी असर पड़ने की आशंका है। यदि इन पेड़ों को बचाने के लिए मेट्रो स्टेशन के स्थान या परियोजना के रूट में कोई बदलाव किया जाता है, तो परियोजना की लागत में लगभग 400 करोड़ रुपये की वृद्धि हो सकती है और निर्माण कार्य तीन से चार साल तक पिछड़ सकता है।
मेट्रो निर्माण कंपनी ने पेड़ों के संरक्षण के उद्देश्य से स्टेशन के लिए तीन वैकल्पिक स्थानों का परीक्षण किया था, जिनमें रीगल टॉकीज, प्रीतमलाल दुआ सभागृह और गांधी हॉल शामिल थे। हालांकि, विस्तृत तकनीकी और व्यावहारिक पहलुओं के मूल्यांकन के बाद इन विकल्पों को परियोजना के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया। रीगल टॉकीज क्षेत्र में नए स्टेशन के निर्माण के लिए लगभग 5,000 वर्गमीटर निजी भूमि का अधिग्रहण करना आवश्यक होगा, जिसकी प्रक्रिया में ही अनुमानित दो साल लग सकते हैं। इस संभावित बदलाव से न केवल परियोजना की लागत में भारी वृद्धि होगी, बल्कि इसके निर्माण की समय-सीमा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है।
पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास की दुविधा
पर्यावरणविदों ने रानी सराय क्षेत्र के इन पुराने पेड़ों के महत्व पर प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि इन पेड़ों की अहमियत केवल उनकी आयु तक सीमित नहीं है, बल्कि ये तोतों के लिए एक स्थापित प्राकृतिक आवास का काम करते हैं। इन पेड़ों के तनों में तोतों ने अपने घोंसले और बसेरे बनाए हुए हैं, जिन्हें नए पेड़ लगाकर तुरंत विकसित करना संभव नहीं है। इन पुराने पेड़ों के हटाए जाने से पक्षियों का यह स्थापित बसेरा समाप्त हो सकता है।
तोतों के इस महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास के संरक्षण और मेट्रो परियोजना के विकास के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रश्न अब प्रशासन और मेट्रो प्रबंधन के लिए एक बड़ी दुविधा बन गया है। हाल ही में, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीशों ने भी इन पेड़ों और पक्षियों के बसेरे का निरीक्षण करने के लिए मौके का दौरा किया था। यह स्थिति परियोजना की गति, अतिरिक्त वित्तीय बोझ और पक्षियों के अमूल्य प्राकृतिक आवास के संरक्षण के बीच एक प्रभावी समाधान खोजने की आवश्यकता पर बल देती है।
