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पन्ना में शासकीय भूमि पर अवैध कॉलोनी: रिपोर्टों पर उठे सवाल

पन्ना जिले में जनकपुर की शासकीय भूमि पर अवैध कॉलोनी निर्माण का मामला गर्मा गया है। राजस्व अधिकारियों की विरोधाभासी रिपोर्टों ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर...

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•संवाददाता: डॉ. भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे
पन्ना में शासकीय भूमि पर अवैध कॉलोनी: रिपोर्टों पर उठे सवाल

द क्लिफ न्यूज़ डेस्क | संवाददाता: डॉ. भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे

द क्लिफ न्यूज़ | पन्ना | 29 अक्टूबर 2026

पन्ना जिले के जनकपुर क्षेत्र में शासकीय भूमि पर कथित अवैध कॉलोनी निर्माण को लेकर राजस्व विभाग की रिपोर्टों और उच्चस्तरीय आदेशों के बीच गंभीर विरोधाभास सामने आया है। इस मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता और भूमि पट्टों की वैधानिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामले की शुरुआत 14 दिसंबर 2022 को हुई, जब तत्कालीन कलेक्टर पन्ना ने राजस्व अमले की जांच रिपोर्ट के आधार पर जनकपुर स्थित रकबा क्रमांक 77, 77/1 और 77/2 की भूमि को शासकीय घोषित किया था। इसके साथ ही, इस भूमि पर कथित अवैध कॉलोनी निर्माण के आरोप में अब्दुल सलीम नामक व्यक्ति के विरुद्ध प्रकरण भी दर्ज कराया गया था।

प्रशासनिक जांचों में विरोधाभास

इसके बाद, मार्च 2023 में तत्कालीन कमिश्नर सागर ने कथित तौर पर मौखिक तथ्यों और फर्जी साक्ष्यों के आधार पर कलेक्टर के आदेश को निरस्त कर दिया। इस निर्णय ने मामले को और जटिल बना दिया।

तत्पश्चात, 23 नवंबर 2023 को एसडीएम अशोक अवस्थी द्वारा की गई पुनः जांच में वर्ष 1955-56 के आवंटन को नियमों के विरुद्ध पाया गया। यह रिपोर्ट भी भूमि को शासकीय घोषित करने की ओर इशारा करती थी। हालांकि, इसके बावजूद राजस्व मंडल ने पुनरावलोकन की अनुमति प्रदान नहीं की, जिससे जांच प्रक्रिया पर प्रश्न उठ रहे हैं।

धोखाधड़ी की धाराओं में एफआईआर

इस प्रकरण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस विवेचना के दौरान आरोपी अब्दुल सलीम के विरुद्ध धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराएं 420, 467, 470 और 471 भी जोड़ी गई हैं। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि इन धाराओं का जुड़ना आरोपी को दोषी सिद्ध नहीं करता, बल्कि विवेचना का एक हिस्सा है।

अब मुख्य प्रश्न यह उठता है कि जब विभिन्न स्तरों पर हुई जांचों में भूमि को शासकीय माना गया है, तो उच्चस्तरीय आदेश किन ठोस आधारों पर पारित किए गए? आवेदक ने अब सभी संबंधित राजस्व अभिलेखों और आदेशों की निष्पक्ष एवं गहन समीक्षा की मांग की है। मामले की पूरी स्पष्टता के लिए मूल दस्तावेजों और न्यायिक प्रक्रिया का परीक्षण अनिवार्य है, ताकि प्रशासन की कार्यप्रणाली के प्रति जनता का विश्वास बना रहे।

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