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इज़राइल चुनाव आयोग ने विदेशी फंडिंग के आरोपों को खारिज किया

इज़राइल के चुनाव आयोग ने हालिया मतदान को प्रभावित करने के लिए अरब-इज़राइली समूहों को विदेशी फंडिंग मिलने के आरोपों को 'निराधार' बताया है।

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इज़राइल चुनाव आयोग ने विदेशी फंडिंग के आरोपों को खारिज किया

चुनाव आयोग का जवाब

द क्लिफ न्यूज़ | 30 अक्टूबर 2026 इज़राइल के चुनाव आयोग ने हालिया मतदान प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के इरादे से अरब-इज़राइली समूहों को विदेशी फंडिंग मिलने के आरोपों को आधिकारिक तौर पर खारिज कर दिया है। प्रधानमंत्री के गठबंधन द्वारा लगाए गए इन आरोपों को आयोग ने 'आधारहीन' करार दिया है।

चुनाव पैनल के बयान ने इन आरोपों का सीधे तौर पर खंडन किया है, जिसमें कहा गया है कि वित्तीय माध्यमों से बाहरी हस्तक्षेप के दावों का समर्थन करने के लिए कोई सबूत नहीं है। यह क्षेत्र में चुनाव की निष्ठा के आसपास चल रही जांच का हिस्सा है।

आयोग का रुख

चुनाव आयोग के इस कड़े रुख का उद्देश्य स्थिति को स्पष्ट करना और चुनावी प्रणाली की निष्पक्षता के बारे में जनता को आश्वस्त करना है। आरोपों को 'आधारहीन' बताते हुए, आयोग ऐसे दावों के सामने निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने की अपनी प्रतिबद्धता पर जोर देता है।

प्रधानमंत्री के गठबंधन ने यह आरोप लगाया था कि महत्वपूर्ण विदेशी धन अरब-इज़राइली समूहों को मतदाता की भावना को प्रभावित करने के विशिष्ट उद्देश्य से पहुंचाया गया था। हालांकि, चुनावी अधिकारियों के अनुसार, इस दावे का कोई पुख्ता सबूत नहीं है।

इज़राइली चुनावों की पृष्ठभूमि

इज़राइल में एक बहुदलीय संसदीय प्रणाली है, जिसमें चुनाव आम तौर पर हर चार साल में होते हैं। राजनीतिक परिदृश्य अक्सर जटिल होता है, जिसमें विभिन्न गठबंधन सरकारें बनाते हैं। बेंजामिन नेतन्याहू दशकों से इज़राइली राजनीति में एक प्रमुख व्यक्ति रहे हैं, जो अक्सर गठबंधन सरकारों का नेतृत्व करते रहे हैं। हाल के चुनावों में गठबंधनों में बदलाव और गहन प्रचार देखा गया है।

चुनावी प्रक्रिया की अखंडता लोकतांत्रिक समाजों का एक आधारशिला है, और विदेशी प्रभाव के किसी भी आरोप को चुनावी निकायों द्वारा गंभीरता से लिया जाता है।

जामिया मिलिया इस्लामिया छात्र विरोध समाप्त

एक अलग घटनाक्रम में, दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों ने 18 दिनों का अपना विरोध प्रदर्शन समाप्त कर दिया है। प्रशासन ने छात्रों की मांगों को स्वीकार कर लिया है, जिसमें छात्र संघ की बहाली के लिए समय-सीमा तय करना शामिल है।

प्रशासन ने विश्वविद्यालय के छात्र संघ संविधान को मंजूरी देने और लागू करने के लिए 15 मई की समय सीमा तय की है। अगले शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के छह सप्ताह के भीतर, या अगस्त के अंत तक छात्र संघ के चुनाव कराने की योजना है।

विश्वविद्यालय 2006 से छात्र संघ चुनाव नहीं करा रहा था, जिसके कारण हालिया विरोध प्रदर्शन शुरू हुए जो 12 अक्टूबर को शुरू हुए थे। पांच छात्रों ने प्रदर्शन के हिस्से के रूप में भूख हड़ताल की थी। इससे पहले, 16 अक्टूबर को, विश्वविद्यालय ने भूख हड़ताल पर बैठे एक छात्र को निष्कासित कर दिया था, दो अन्य को निलंबित कर दिया था, और तीनों पर एक साल के लिए परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि, अब इन अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को रद्द कर दिया गया है।

विश्वविद्यालय ने यह भी पुष्टि की कि सोमवार से सभी पाठ्यक्रमों के लिए व्यक्तिगत कक्षाएं फिर से शुरू होंगी, और अंतिम-सत्र परीक्षाएं ऑफलाइन आयोजित की जाएंगी।

असम में बाल विवाह पर कार्रवाई जारी

इसी बीच, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने घोषणा की कि राज्य में कथित बाल विवाह के खिलाफ हालिया कार्रवाई में 564 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और 481 मामले दर्ज किए गए हैं। यह अभियान इस कुप्रथा के उन्मूलन तक जारी रहेगा।

सितंबर में, मुख्यमंत्री ने कहा था कि पिछले कुछ वर्षों में बाल विवाह के खिलाफ एक अभियान के परिणामस्वरूप 12,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए और 11,000 से अधिक गिरफ्तारियां हुईं। उन्होंने असम के 20 जिलों में बाल विवाह में 81% की गिरावट का भी दावा किया था।

इससे पहले, मई 2025 में, सरमा ने 2026 तक असम को इस प्रथा से पूरी तरह मुक्त करने का लक्ष्य घोषित किया था। राज्य की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने पिछले चार वर्षों में कथित बाल विवाह के खिलाफ कई अभियान शुरू किए हैं।

हजारों महिलाओं ने इस कार्रवाई का विरोध किया है, यह उजागर करते हुए कि गिरफ्तार किए गए पुरुष अक्सर अपने परिवारों के एकमात्र कमाने वाले होते हैं। पुलिस के आंकड़ों से पता चलता है कि मुस्लिम आबादी वाले जिलों में गिरफ्तारियों की संख्या अधिक देखी गई है।

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