आयुर्वेद दिवस पर योग और आयुर्वेद के महत्व पर प्रकाश
गुना में आयुर्वेद दिवस पर योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि भारत सरकार ने 23 सितंबर को आयुर्वेद दिवस मनाने का निर्णय लिया है। प्राचीन...

गुना | संवाददाता: राजा हतम वेग
द क्लिफ न्यूज़ | गुना | 23 सितंबर 2026
गुना के गायत्री मंदिर में आयुर्वेद दिवस के अवसर पर एक विशेष योग सत्र का आयोजन किया गया। इस दौरान योगाचार्य महेश पाल ने उपस्थित योग साधकों को आयुर्वेद और योग के वैज्ञानिक महत्व से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि धन्वंतरि को भारतीय परंपरा में आयुर्वेद का आद्य प्रवर्तक माना जाता है। इस वर्ष आयुर्वेद दिवस का संदेश 'स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद' रखा गया है।
योगाचार्य महेश पाल ने आधुनिक जीवनशैली पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज की तीव्र गति वाली जीवनशैली ने मनुष्यों को अनेक सुविधाएँ तो प्रदान की हैं, परंतु इसके साथ ही अनियमित दिनचर्या और बढ़ते मानसिक तनाव जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं। इन परिस्थितियों में, भारत की प्राचीन स्वास्थ्य परंपराएँ, जैसे योग और आयुर्वेद, एक नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अपनी प्रासंगिकता साबित कर रही हैं।
आयुर्वेद दिवस का सरकारी निर्णय
यह बताते हुए कि प्राचीन ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में अपनाना कितना महत्वपूर्ण है, योगाचार्य ने कहा कि भारत सरकार ने अब प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को 'आयुर्वेद दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इस निर्णय का उद्देश्य राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयुर्वेद की निरंतरता और प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करना है, ताकि यह प्राचीन चिकित्सा पद्धति अधिक लोगों तक पहुँच सके।
समग्र स्वास्थ्य के लिए योग और आयुर्वेद
योगाचार्य महेश पाल ने जोर देकर कहा कि योग और आयुर्वेद को केवल पारंपरिक उपचार पद्धतियों के रूप में नहीं, बल्कि एक समग्र स्वास्थ्य दृष्टिकोण के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने समझाया कि आसन, प्राणायाम और ध्यान जैसी योग क्रियाएँ तनाव को कम करने में अत्यंत सहायक सिद्ध होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा भी संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि को स्वस्थ जीवनशैली के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में मान्यता दी गई है।
हालांकि, योगाचार्य ने एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी भी प्रकार की बीमारी की स्थिति में, स्व-उपचार का प्रयास करने के बजाय योग्य चिकित्सक की सलाह लेना अनिवार्य है। उन्होंने यह भी सुझाया कि योग और आयुर्वेद को केवल तब अपनाने की बजाय, जब कोई बीमार हो, बल्कि इन्हें दैनिक जीवन की आदतों का एक अभिन्न अंग बनाना चाहिए। उनका मानना था कि स्वास्थ्य केवल बीमारी का अभाव मात्र नहीं है, बल्कि बेहतर और सक्रिय जीवन जीने की क्षमता है। सही मार्गदर्शन और एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ इन प्राचीन पद्धतियों को अपनाने से आज का समाज निश्चित रूप से एक सकारात्मक दिशा प्राप्त कर सकता है।
