अनैतिक दवा मार्केटिंग पर लगाम: सुप्रीम कोर्ट ने बनाई विशेषज्ञ समिति
सुप्रीम कोर्ट ने दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं की समीक्षा हेतु तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति के गठन का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 29 जनवरी 2027 को होगी।

द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 9 अक्टूबर 2026
दवा कंपनियों द्वारा चिकित्सकों को महंगे उपहार, आर्थिक लाभ, विदेशी यात्राएं और अन्य सुविधाएं देकर अपनी दवाओं के प्रचार के लिए प्रभावित करने की प्रथाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 8 अक्टूबर 2026 को गंभीर रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को ऐसी अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं की व्यापक समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति मौजूदा नियमों की प्रभावशीलता, निगरानी व्यवस्था और उल्लंघन पर कार्रवाई के प्रावधानों का परीक्षण कर सरकार को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करेगी। इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी 2027 को निर्धारित की गई है। यह निर्देश दवा उद्योग और चिकित्सा पेशे के बीच संबंधों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मरीजों के हितों के अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FMRAI) की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किया। याचिका में दवा कंपनियों और चिकित्सकों के बीच ऐसे लेन-देन पर प्रभावी नियंत्रण की मांग की गई थी, जिनसे दवाओं के चयन संबंधी चिकित्सकीय निर्णय प्रभावित होने की आशंका रहती है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को तीन सदस्यीय समिति गठित करने के प्रस्ताव से अवगत कराया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि समिति का गठन पहले नहीं हुआ है, तो केंद्र इसे तत्काल दो सप्ताह के भीतर गठित करे।
विशेषज्ञ समिति की जिम्मेदारियां और कार्यक्षेत्र
अदालत के निर्देशानुसार, गठित की जाने वाली विशेषज्ञ समिति को अपनी पहली बैठक के दो महीने के भीतर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करने का प्रयास करना होगा। समिति को संबंधित पक्षों के सुझाव और आपत्तियां सुनने तथा आवश्यकता पड़ने पर तकनीकी एवं चिकित्सा विशेषज्ञों की सहायता लेने की भी छूट दी गई है। इसके बाद, केंद्र सरकार को समिति की सिफारिशों पर विचार करके एक उचित और तर्कसंगत निर्णय लेना होगा। अदालत का उद्देश्य केवल नियमों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि मौजूदा नियमों का वास्तविक और प्रभावी पालन हो। दवाओं का संबंध सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य, जीवन और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा है, इसलिए इस क्षेत्र में जवाबदेही की कमी को केवल व्यावसायिक विवाद मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं पर चिंताएं
दवा कंपनियों द्वारा मार्केटिंग में डॉक्टरों को महंगे उपहार, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, आतिथ्य सुविधाएं, मनोरंजन, सम्मेलन के नाम पर प्रायोजित यात्राएं और अन्य आर्थिक लाभ देने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। ऐसी सुविधाओं के बदले किसी विशेष ब्रांड की दवा लिखने का अप्रत्यक्ष दबाव पैदा हो सकता है। यह चिंता का विषय है कि क्या दवा लिखने का निर्णय मरीज की जरूरत, दवा की उपयोगिता, सुरक्षा और गुणवत्ता पर आधारित है, या फिर व्यावसायिक प्रचार और लाभ पर। हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक चिकित्सक या कंपनी को ऐसे आरोपों के आधार पर तत्काल दोषी न ठहराया जाए; जांच और कार्रवाई साक्ष्य के आधार पर ही होनी चाहिए।
समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब किसी दवा की व्यावसायिक प्राथमिकता, उसकी उपयोगिता, सुरक्षा, गुणवत्ता और मरीज की वास्तविक आवश्यकता पर भारी पड़ने लगती है। चिकित्सक को मरीज की बीमारी, उम्र, अन्य दवाओं के सेवन, संभावित दुष्प्रभावों और मरीज की आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखकर ही उपचार का निर्णय लेना चाहिए। यदि दवा लिखने का निर्णय किसी उपहार या आर्थिक लाभ से प्रभावित होता है, तो यह न केवल चिकित्सा संबंधी स्वतंत्रता को कमजोर करता है, बल्कि मरीज के भरोसे को भी ठेस पहुंचाता है।
डोलो-650 मामला और नियामक की आवश्यकता
इस बहस के संदर्भ में, डोलो-650 दवा का मामला भी चर्चा में आया था, जिसने दवा कंपनियों के प्रचार खर्च और चिकित्सकों को दिए जाने वाले लाभ के संभावित प्रभाव की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता को रेखांकित किया। अगस्त 2022 में, याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया था कि इस दवा का निर्माण करने वाली कंपनी ने डॉक्टरों को दवा लिखने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से लगभग 1,000 करोड़ रुपये के उपहार बांटे थे। यह आरोप न्यायालय में प्रस्तुत दलीलों का हिस्सा था, और इसे किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष या सिद्ध अपराध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस उदाहरण ने दवा उद्योग में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर किया।
दवा उद्योग में अनुसंधान, चिकित्सकीय प्रशिक्षण, नई दवाओं की जानकारी का प्रसार और वैज्ञानिक सम्मेलनों की अपनी एक वैध भूमिका है। लेकिन इन महत्वपूर्ण गतिविधियों और व्यक्तिगत लाभ पहुंचाने वाली मार्केटिंग प्रथाओं के बीच एक स्पष्ट रेखा का खींचा जाना आवश्यक है। पारदर्शी नियमों के माध्यम से उपयोगी वैज्ञानिक सहयोग को जारी रखा जा सकता है और साथ ही अनुचित प्रोत्साहनों पर प्रभावी रूप से रोक भी लगाई जा सकती है।
यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्यूटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज (UCPMP) 2024
केंद्र सरकार ने दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्यूटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज (UCPMP), 2024 लागू किया है। यह संहिता 12 मार्च 2024 को जारी की गई थी और इसमें चिकित्सकों तथा दवा कंपनियों के बीच संपर्क के लिए नैतिक मानकों को निर्धारित किया गया है। इस संहिता के तहत, कंपनियों को डॉक्टरों और उनके परिवारों को उपहार, मौद्रिक लाभ तथा अनुचित आतिथ्य सुविधाएं देने से प्रतिबंधित किया गया है। यह संहिता कंपनियों की जवाबदेही, अनुपालन संबंधी स्व-घोषणा और चिकित्सा शिक्षा से जुड़े आयोजनों के खर्च के खुलासे पर भी जोर देती है।
हालांकि, मूल प्रश्न यह उठता है कि इस संहिता के उल्लंघन की शिकायतों पर कितनी तेजी से कार्रवाई होती है और नियम तोड़ने वाली कंपनियों के खिलाफ कितनी प्रभावी जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है। वर्तमान व्यवस्था में, दवा कंपनियों के स्तर पर नैतिकता संबंधी समितियां शिकायतों की जांच करती हैं और अपील के लिए औषध विभाग के स्तर पर एक व्यवस्था मौजूद है। लेकिन स्वैच्छिक अनुपालन, उद्योग के अपने संस्थागत तंत्र और बाध्यकारी सरकारी नियंत्रण के बीच के अंतर को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी संदर्भ में मौजूदा व्यवस्था की पर्याप्तता तथा उसे अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर विचार करने के लिए कहा है।
संभावित प्रभाव और भविष्य की राह
यदि विशेषज्ञ समिति नियमों को अधिक प्रभावी कानूनी आधार देने की सिफारिश करती है, तो सरकार को यह तय करना होगा कि उल्लंघन की जांच कौन करेगा, दंड किस प्रकार निर्धारित होंगे और शिकायतकर्ता को न्याय पाने के लिए कितनी सरल प्रक्रिया उपलब्ध होगी। साथ ही, संबंधित कंपनियों और चिकित्सकों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना भी अनिवार्य होगा।
अनैतिक मार्केटिंग का संभावित असर केवल चिकित्सकीय निर्णयों तक सीमित नहीं रहता। यदि मरीज को किसी महंगे ब्रांड की दवा लिखी जाती है, जबकि उसी सक्रिय औषधीय घटक, उपयुक्त खुराक और गुणवत्ता वाली एक कम कीमत की दवा भी उपलब्ध है, तो उसका उपचार खर्च अनावश्यक रूप से बढ़ सकता है। हालांकि, हर महंगी दवा को अनावश्यक और हर सस्ती दवा को समान रूप से उपयुक्त मानना भी गलत है। दवा का चयन उसकी गुणवत्ता, प्रभावशीलता, सुरक्षा और मरीज की विशिष्ट आवश्यकता के अनुसार ही होना चाहिए।
अक्टूबर 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, अदालत के समक्ष कैंसर की एक दवा का उदाहरण प्रस्तुत किया गया था, जिसका अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) लगभग 27,000 रुपये बताया गया, जबकि खुदरा विक्रेताओं को उसकी आपूर्ति लगभग 2,700 से 3,000 रुपये में होने की बात कही गई। यह लगभग नौ से दस गुना का अंतर था। यद्यपि यह एक विशिष्ट दवा से संबंधित उदाहरण है और पूरे दवा बाजार का औसत मूल्य-अंतर नहीं, फिर भी यह दवाओं के मूल्य निर्धारण, पारदर्शिता और मरीजों की आर्थिक क्षमता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाता है।
भारत जैसे देश में, जहां आज भी अनेक परिवार इलाज का खर्च अपनी जेब से वहन करते हैं, अनावश्यक रूप से महंगी दवाएं खरीदना उनके घरेलू बजट पर भारी पड़ सकता है। इसलिए डॉक्टरों की स्वतंत्रता, दवाओं की उचित कीमत और मरीजों को विभिन्न विकल्पों की जानकारी मिलना, ये सभी एक-दूसरे से जुड़े विषय हैं। मरीजों को जहां चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त हो, वहां कम कीमत वाले गुणवत्तापूर्ण विकल्पों के बारे में जानकारी मिलनी चाहिए।
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) और दवा प्रचार
इस मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) यानी रोगाणुरोधी दवाओं के प्रति प्रतिरोध की गंभीर समस्या है। जब बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीव दवाओं के प्रभाव से बचने की क्षमता विकसित कर लेते हैं, तो संक्रमण का इलाज अत्यंत कठिन हो सकता है। एंटीबायोटिक दवाओं का अनावश्यक उपयोग, गलत दवा का चुनाव, अनुचित खुराक और उपचार संबंधी निर्देशों का पालन न करना इस समस्या को बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं।
यह सच है कि एंटीबायोटिक के अनुचित उपयोग को सीधे किसी एक मार्केटिंग प्रथा का परिणाम नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसके कई अन्य कारण भी हैं। इनमें बिना उचित चिकित्सकीय सलाह के दवा लेना, संक्रमण की गलत पहचान, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच और संक्रमण नियंत्रण में कमियां शामिल हैं। फिर भी, यदि केवल प्रचार के दबाव में अनावश्यक एंटीबायोटिक दवाएं लिखी जाती हैं, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। इसलिए, दवा प्रचार में वैज्ञानिक प्रमाणों की अनिवार्यता, दुष्प्रभावों की सही जानकारी का प्रसार और तर्कसंगत दवा-निर्धारण को प्राथमिकता देना अत्यावश्यक है।
आगे की राह और अदालती प्रक्रिया
विशेषज्ञ समिति के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे नियम सुझाने की होगी, जो केवल कागज पर प्रभावी दिखने के बजाय व्यवहार में भी लागू किए जा सकें। इसके लिए कंपनियों के प्रचार खर्च का सार्वजनिक खुलासा, उपहार और आतिथ्य पर स्पष्ट और सख्त प्रतिबंध, शिकायतों की समयबद्ध जांच तथा उल्लंघन पर उचित और प्रभावी दंड जैसे उपायों पर गहन विचार किया जा सकता है। ये संभावित नीतिगत उपाय हैं, लेकिन अंतिम सिफारिशें समिति और सरकार के निर्णय पर ही निर्भर करेंगी।
समिति को यह भी देखना चाहिए कि डॉक्टरों को नई दवाओं की वैज्ञानिक जानकारी देने वाले वैध कार्यक्रमों और व्यक्तिगत लाभ पहुंचाने वाली गतिविधियों के बीच एक स्पष्ट और अकाट्य अंतर कैसे स्थापित किया जाए। दवा कंपनियों के अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार को बढ़ावा देना निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन व्यावसायिक हित कभी भी मरीज की सुरक्षा और चिकित्सकीय स्वतंत्रता से ऊपर नहीं होने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को समिति गठित करने, उसकी सिफारिशों पर विचार करने और अनुपालन संबंधी हलफनामा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। 29 जनवरी 2027 को होने वाली अगली सुनवाई में केंद्र सरकार की कार्रवाई और प्रगति पर विचार किया जाएगा। इस अवधि में समिति द्वारा सुझाई गई सिफारिशें और सरकार द्वारा लिया जाने वाला निर्णय दवा उद्योग के नियमन की भावी दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
अंततः, किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि मरीज को सही समय पर सुरक्षित, प्रभावी और आर्थिक रूप से वहनीय उपचार मिलता है या नहीं। दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच एक पारदर्शी और नैतिक संबंध चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता के लिए अनिवार्य हैं। यदि प्रस्तावित समिति के सुझावों से नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित होता है, तो इससे न केवल मरीजों के अधिकारों की रक्षा होगी, बल्कि अनावश्यक खर्च में कमी आएगी और वैज्ञानिक आधार पर उपचार को बढ़ावा मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल केंद्र सरकार के लिए मौजूदा व्यवस्था की कमियों को दूर करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।
