10 माह से कांजी हाउस में 49 भैंसें, निगम पर ₹16 लाख से अधिक का बोझ
भोपाल नगर निगम के कांजी हाउस में 10 महीने से बंद 49 भैंसों पर 16 लाख से अधिक खर्च हो चुका है। अदालत में मामला लंबित होने से निगम निर्णय लेने में असमर्थ है।

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 8 अक्टूबर 2026
भोपाल नगर निगम एक अनूठी दुविधा का सामना कर रहा है, जहां ईंटखेड़ी पुलिस द्वारा जनवरी 2026 में जब्त की गई 49 भैंसें पिछले लगभग दस महीनों से अरवलिया स्थित कांजी हाउस में बंद हैं। इन पशुओं के रखरखाव पर निगम अब तक 16 लाख रुपये से अधिक का भारी-भरकम खर्च कर चुका है। अदालत में मामला विचाराधीन होने और पशु मालिकों द्वारा आवश्यक स्वामित्व संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत न कर पाने के कारण, इन भैंसों की देखरेख की पूरी जिम्मेदारी नगर निगम पर आ गई है।
यह स्थिति भोपाल नगर निगम के लिए एक बड़ी वित्तीय और प्रशासनिक चुनौती बन गई है। जनवरी 2026 में ईंटखेड़ी पुलिस ने पशुओं के अवैध परिवहन के आरोप में इन 49 भैंसों को जब्त किया था। इसके बाद से, ये पशु अरवलिया स्थित कांजी हाउस में रखे गए हैं, जिनकी देखभाल का सारा खर्च नगर निगम वहन कर रहा है। प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार, यह खर्च अब तक 16 लाख रुपये से अधिक हो चुका है, और यह राशि निरंतर बढ़ रही है।
इन दस महीनों के दौरान, कांजी हाउस में रहने के दौरान 9 भैंसों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि 4 नए बछड़ों का जन्म हुआ है। इससे जब्त किए गए पशुओं की कुल संख्या और उनकी देखभाल से जुड़ी स्थिति में भी बदलाव आया है। यह अप्रत्याशित वृद्धि और मृत्यु दर निगम के लिए एक अतिरिक्त चिंता का विषय है, क्योंकि यह न केवल पशु कल्याण के मुद्दों को उठाता है, बल्कि प्रबंधन की जटिलताओं को भी बढ़ाता है।
अदालती प्रक्रिया में देरी का असर
नगर निगम के अधिकारियों के अनुसार, सबसे बड़ी बाधा यह है कि अदालत में मामला विचाराधीन होने के कारण वे इन पशुओं के संबंध में कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पा रहे हैं। कानून के अनुसार, जब तक अदालत का कोई अंतिम आदेश नहीं आ जाता, तब तक जब्त किए गए पशुओं का निपटान या उन्हें वापस सौंपने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। यह कानूनी विलंब नगर निगम को अनिश्चित काल तक इन पशुओं के भरण-पोषण के लिए बाध्य कर रहा है।
इसके अतिरिक्त, पशु मालिकों की ओर से आवश्यक स्वामित्व संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत न कर पाना भी एक महत्वपूर्ण कारण है कि भैंसों को वापस सौंपने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी है। बिना उचित दस्तावेज़ीकरण के, निगम किसी भी व्यक्ति को इन पशुओं को वापस नहीं सौंप सकता, भले ही वे उनका दावा करें। यह स्थिति भैंसों को कांजी हाउस में फंसाए रखती है, जबकि निगम पर वित्तीय बोझ बढ़ता जाता है।
आगे की राह और खर्च की भरपाई की मांग
इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए, नगर निगम अब इन भैंसों को वापस ईंटखेड़ी पुलिस को सौंपने की तैयारी कर रहा है। यह कदम आगे की कानूनी या प्रशासनिक प्रक्रिया के लिए एक प्रारंभिक बिंदु के रूप में देखा जा रहा है। इसके साथ ही, निगम द्वारा इन भैंसों के चारे और रखरखाव पर पिछले दस महीनों में किए गए व्यय की भरपाई पुलिस से कराने की मांग करने की भी योजना है।
निगम का तर्क है कि पशुओं को जब्त करने वाली एजेंसी पुलिस है, और इसलिए, जब तक मामले का समाधान नहीं हो जाता, तब तक इस खर्च का वहन भी पुलिस विभाग द्वारा किया जाना चाहिए। यह पूरा मामला कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक जब्त किए गए पशुओं की देखभाल और उससे जुड़े वित्तीय दायित्वों के सवाल को उजागर करता है। यह घटना प्रशासनिक मशीनरी और न्यायिक प्रणाली के बीच समन्वय की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालती है, ताकि ऐसे मामलों में फंसे निर्दोष पशुओं और उन पर होने वाले सरकारी खर्च को कम किया जा सके।
