विलायती बबूल: नरसिंहगढ़ में लाखों के खर्च से पहले वैज्ञानिक नियंत्रण की पहल
दूसरे राज्यों में करोड़ों के खर्च के अनुभव के बाद, IRE Jungle Team ने नरसिंहगढ़ में विलायती बबूल के फैलाव को रोकने के लिए वैज्ञानिक सर्वेक्षण, चरणबद्ध उन्मूलन और देशज जैव विविधता पुनर्स्थापन का प्रस्ताव दिया है।

द क्लिफ न्यूज़ | नरसिंहगढ़ | 18 अगस्त 2026
नरसिंहगढ़ तहसील क्षेत्र में विलायती बबूल (Prosopis juliflora) नामक आक्रामक प्रजाति के बढ़ते प्रसार को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। IRE Jungle Team ने प्रशासन के समक्ष इस समस्या के वैज्ञानिक और दीर्घकालीन समाधान के लिए एक विस्तृत प्रस्ताव प्रस्तुत किया है, जिसमें वैज्ञानिक सर्वेक्षण, चरणबद्ध उन्मूलन और स्थानीय जैव विविधता के पुनर्स्थापन पर जोर दिया गया है। यह कदम अन्य राज्यों में इस प्रजाति के नियंत्रण पर हुए भारी खर्चों और पर्यावरणीय चुनौतियों के अनुभवों के आलोक में उठाया गया है।
मंगलवार को IRE Jungle Team के सदस्यों ने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) अजय प्रताप पटेल को एक निवेदन पत्र सौंपा। इसके साथ ही, वन विभाग के एसडीओ दिनेश यादव और नरसिंहगढ़ वन परिक्षेत्र के रेंजर कार्यालय में भी प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, ताकि आवश्यक कार्रवाई की जा सके। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए, टीम ने कलेक्टर राजगढ़ और डीएफओ राजगढ़ को भी ई-मेल के माध्यम से सूचित कर दिया है। इसके अतिरिक्त, मुख्य वन संरक्षक (CCF) और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF), मध्य प्रदेश को ई-मेल भेजकर राज्य स्तर पर इस मुद्दे पर संज्ञान लेने और आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करने का अनुरोध किया गया है।
अन्य राज्यों के महंगे अनुभव देते हैं चेतावनी
IRE Jungle Team ने अपने प्रस्ताव में देश के विभिन्न हिस्सों में Prosopis juliflora के व्यापक प्रसार के बाद किए जा रहे नियंत्रण और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन (ecological restoration) कार्यों का विस्तृत उल्लेख किया है। टीम का तर्क है कि किसी भी आक्रामक प्रजाति को उसके शुरुआती चरण में ही नियंत्रित करना, उसके बड़े पैमाने पर फैल जाने के बाद करोड़ों रुपये खर्च करके उसे हटाने और पारिस्थितिक तंत्र को फिर से स्थापित करने की तुलना में कहीं अधिक व्यावहारिक और आर्थिक रूप से किफायती है।
इस संदर्भ में तमिलनाडु का उदाहरण प्रमुखता से सामने आता है, जहाँ Prosopis juliflora के अनियंत्रित प्रसार को नियंत्रित करने के लिए लंबे समय से अभियान चलाए जा रहे हैं। हालिया न्यायिक निर्देशों में इस प्रजाति के उन्मूलन, इसकी पुनः वृद्धि को रोकने और प्रभावित क्षेत्रों में देशज प्रजातियों के पुनर्स्थापन पर विशेष बल दिया गया है। वर्ष 2026 में, तमिलनाडु सरकार ने जलस्रोतों से Prosopis को हटाने के लिए ₹5.55 करोड़ की राशि स्वीकृत की थी, जिसमें प्रथम वर्ष के संचालन के लिए लगभग ₹1.81 करोड़ का अनुमानित व्यय शामिल था।
टीम के अनुसार, यह अनुभव यह स्पष्ट करता है कि आक्रामक प्रजातियों के बड़े पैमाने पर फैलने के बाद, केवल उन्हें हटाना ही पर्याप्त नहीं होता। इसके पश्चात, पारिस्थितिक तंत्र के पुनर्स्थापन, नियमित निगरानी और रखरखाव पर भी लंबे समय तक महत्वपूर्ण संसाधन खर्च करने पड़ते हैं।
दिल्ली रिज भी है उदाहरण
इसी प्रकार, दिल्ली के Ridge क्षेत्र में भी Prosopis juliflora सहित अन्य आक्रामक वनस्पति को नियंत्रित करने और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन के लिए व्यापक योजनाएं बनाई गई हैं। दक्षिणी रिज के लगभग 132 हेक्टेयर क्षेत्र से आक्रामक वनस्पति को हटाने के लिए लगभग ₹1.09 करोड़ की अनुमानित लागत वाली परियोजना प्रस्तावित की गई थी। इसके अलावा, सेंट्रल रिज के लगभग 423 हेक्टेयर क्षेत्र में जैव विविधता पुनर्स्थापन के लिए लगभग ₹12.21 करोड़ की पांच वर्षीय योजना को भी सामने रखा गया है।
IRE Jungle Team का मानना है कि ऐसे उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि आक्रामक प्रजातियों के अत्यधिक प्रसार के बाद, न केवल उनके नियंत्रण पर भारी लागत आती है, बल्कि प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को पुनः स्थापित करने में भी काफी समय और संसाधनों का निवेश करना पड़ता है।
बारिश का मौसम नियंत्रण के लिए बेहतर अवसर
IRE Jungle के संस्थापक पुनीत उपाध्याय ने बताया कि विलायती बबूल के प्रभावी नियंत्रण के लिए बारिश का मौसम एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान कर सकता है। उन्होंने कहा कि मिट्टी में पर्याप्त नमी होने के कारण, छोटे और मध्यम आकार के पौधों को उनकी जड़ों सहित उखाड़ना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।
उपाध्याय ने आगे कहा कि यदि वैज्ञानिक सर्वेक्षण के साथ-साथ समय रहते अभियान शुरू किया जाए और उपयुक्त क्षेत्रों में पौधों को जड़ों सहित हटाया जाए, तो मशीनरी और श्रम की आवश्यकता को काफी कम किया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बड़े और घने क्षेत्रों के लिए, स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार वैज्ञानिक निष्कासन विधियों (scientific removal methods) का निर्धारण करना आवश्यक होगा।
पुनीत उपाध्याय ने इस बात पर जोर दिया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य केवल विलायती बबूल को हटाना मात्र नहीं है, बल्कि उसके स्थान पर देशज पारिस्थितिकी तंत्र को पुनः स्थापित करना है, ताकि हटाए गए क्षेत्रों में भविष्य में आक्रामक प्रजातियों का दोबारा प्रसार न हो सके।
'लैंटाना की तरह बड़ी समस्या न बने'
पर्यावरण कार्यकर्ता राम गुप्ता ने भी विलायती बबूल के शुरुआती स्तर पर नियंत्रण की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस समस्या पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में इसका प्रसार एक विकराल चुनौती बन सकता है।
राम गुप्ता ने कहा, “विलायती बबूल को जल्द से जल्द नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा यह लैंटाना की तरह ही आने वाले समय में एक बड़ी मुसीबत बनकर सामने आ सकता है।” गुप्ता के अनुसार, लैंटाना के व्यापक प्रसार से देश के कई क्षेत्रों में उत्पन्न हुई समस्याओं से सबक लेते हुए, आक्रामक प्रजातियों के मामले में रोकथाम और प्रारंभिक नियंत्रण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
केवल हटाना नहीं, पारिस्थितिकी तंत्र लौटाना लक्ष्य
IRE Jungle Team ने स्पष्ट किया कि उनकी इस पहल का उद्देश्य केवल विलायती बबूल के पेड़ों को काटना नहीं है। यदि Prosopis को हटाने के बाद भूमि को खाली छोड़ दिया गया, तो वहां दोबारा आक्रामक वनस्पति के उगने की प्रबल संभावना बनी रह सकती है।
इसलिए, टीम ने प्रस्ताव दिया है कि हटाए गए क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप देशज वृक्षों, झाड़ियों और घास की प्रजातियों के प्राकृतिक पुनर्जनन को प्राथमिकता दी जाए। यदि आवश्यक हो, तो वैज्ञानिक वृक्षारोपण (scientific plantation) भी कराया जाए। इसके अतिरिक्त, उन्मूलन के बाद कम से कम 3 से 5 वर्षों तक नियमित निगरानी की आवश्यकता बताई गई है, ताकि दोबारा उगने वाले Prosopis को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।
नरसिंहगढ़ बन सकता है अनुकरणीय मॉडल
IRE Jungle Team ने इस पूरी पहल को केवल एक निष्कासन अभियान तक सीमित न रखते हुए, इसे “आक्रामक प्रजाति प्रबंधन एवं देशज जैव विविधता पुनर्स्थापन मॉडल” (Invasive Species Management & Native Biodiversity Restoration Model) के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया है।
प्रस्ताव के अनुसार, यदि नरसिंहगढ़ में यह पायलट प्रोजेक्ट सफल होता है, तो इसी मॉडल को तहसील के अन्य प्रभावित क्षेत्रों और भविष्य में जिले के अन्य हिस्सों में भी लागू किया जा सकता है।
प्रस्तावित कार्यप्रणाली
टीम द्वारा प्रस्तावित कार्यप्रणाली में निम्नलिखित चरण शामिल हैं:
- वैज्ञानिक सर्वेक्षण
- प्राथमिकता निर्धारण
- पायलट प्रोजेक्ट का क्रियान्वयन
- वैज्ञानिक उन्मूलन
- देशज पुनर्स्थापन
- 3-5 वर्ष की नियमित निगरानी
- चरणबद्ध विस्तार
IRE Jungle Team ने प्रशासन से संबंधित विभागों और विषय-विशेषज्ञों की एक संयुक्त टीम गठित कर प्रारंभिक सर्वेक्षण एवं कार्य योजना तैयार करने की प्रक्रिया को शीघ्रता से शुरू करने का अनुरोध किया है। टीम का मानना है कि समय रहते उठाया गया एक छोटा और वैज्ञानिक कदम, भविष्य में बड़े पर्यावरणीय नुकसान के साथ-साथ भारी सार्वजनिक व्यय को भी रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
