विकास के नाम पर जंगल उजाड़ने का आरोप: उमंग सिंघार ने बाघ संरक्षण पर उठाए सवाल
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मप्र में बाघ संरक्षण पर उठाए सवाल। उन्होंने विकास परियोजनाओं और भ्रष्टाचार के गठजोड़ से जंगल उजाड़े जाने का आरोप लगाते हुए पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की है।

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 28 जुलाई 2026
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर, मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्य में बाघ संरक्षण की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि विकास परियोजनाओं और कथित भ्रष्टाचार के गठजोड़ के कारण बाघों के प्राकृतिक आवास और जंगल उजाड़े जा रहे हैं। सिंघार ने प्रश्न उठाया है कि क्या केवल बाघों की संख्या बढ़ाना ही संरक्षण है, या उनके आवासों और प्राकृतिक गलियारों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि मध्य प्रदेश स्वयं को "टाइगर स्टेट" कहने पर गर्व करता है, लेकिन सरकार द्वारा प्रचारित संरक्षण की उपलब्धियों के पीछे की सच्चाई कुछ और है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आवास को नष्ट करके बाघों का संरक्षण संभव नहीं है। सिंघार ने विशेष रूप से केन-बेतवा लिंक परियोजना, भोपाल के पश्चिमी बाईपास, विभिन्न सड़क और रेल परियोजनाओं तथा वन क्षेत्रों में बढ़ते भूमि कारोबार को बाघ संरक्षण के लिए गंभीर खतरे के रूप में इंगित किया है।
विकास परियोजनाओं पर गंभीर सवाल
उमंग सिंघार ने विशेष रूप से केन-बेतवा लिंक परियोजना पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व के एक महत्वपूर्ण हिस्से के डूबने की आशंका है, जिससे लाखों पेड़ों की कटाई होगी, हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र का नुकसान होगा और बाघों सहित अनेक वन्यजीवों के आवास पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय की एक समिति ने भी केन बेसिन में अतिरिक्त जल की अवधारणा पर सवाल उठाए हैं, और कई स्वतंत्र पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी परियोजना के विभिन्न पहलुओं पर चिंता व्यक्त की है। सिंघार ने आरोप लगाया कि सरकार इन चिंताओं का उत्तर देने के बजाय उन्हें केवल औपचारिक प्रक्रियाओं तक सीमित कर रही है, जो मामले की गंभीरता को नजरअंदाज करने जैसा है।
इसी प्रकार, भोपाल के पश्चिमी बाईपास परियोजना को लेकर भी उन्होंने गंभीर सवाल उठाए हैं। यह परियोजना उस वन्यजीव गलियारे से जुड़ी है, जिसे विशेषज्ञ शहरी बाघों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस परियोजना के प्रस्तावित मार्ग के आसपास कुछ अधिकारियों द्वारा पहले जमीन खरीदी गई और बाद में परियोजना के कारण उसकी कीमतों में भारी वृद्धि हुई। सिंघार ने कहा कि इस तरह के आरोपों की सत्यता का निर्धारण केवल स्वतंत्र जांच से ही संभव है, लेकिन सरकार का मौन धारण करना चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि ऐसे आरोप शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं, क्योंकि विकास का उद्देश्य कुछ लोगों की संपत्ति का मूल्य बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज का संतुलित विकास होना चाहिए।
पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग
नेता प्रतिपक्ष ने प्रशासनिक जवाबदेही पर भी जोर दिया। उन्होंने पूछा कि यदि किसी परियोजना के कारण बाघ गलियारे प्रभावित होते हैं, तो विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते? यदि परियोजनाओं के संरेखण (alignment) बदले जाते हैं, तो उनके कारणों को जनता के सामने क्यों नहीं रखा जाता? उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में पारदर्शिता कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता है।
सिंघार ने मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व को पुनर्जीवित करने की संरक्षण की कहानी की सराहना की, लेकिन उसी सरकार द्वारा ऐसी परियोजनाओं को आगे बढ़ाना, जिनसे बाघों के आवास और प्राकृतिक गलियारे प्रभावित होने की आशंका है, एक गंभीर विरोधाभास बताया। उन्होंने कई अन्य परियोजनाओं जैसे दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे (पश्चिमी कॉरिडोर), कान्हा–पेंच–बांधवगढ़–पन्ना टाइगर कॉरिडोर सड़क, NH-45 (हिरन–सिंदूर खंड) और कटनी–सिंगरौली रेलवे लाइन पर भी चिंता व्यक्त की, जो वन्यजीवों के आवागमन और जीवन के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। NH-45 पर पिछले दो वर्षों में 237 वन्यजीव-वाहन टक्करों और 94 वन्यजीवों की मौत तथा कटनी–सिंगरौली रेलवे लाइन पर वर्ष 2010 से अब तक 39 से अधिक वन्यजीवों की मौत के आंकड़े उन्होंने प्रस्तुत किए।
सरकार से तीन प्रमुख मांगें
उमंग सिंघार ने सरकार से तीन प्रमुख मांगें रखीं। उन्होंने केन-बेतवा परियोजना, भोपाल पश्चिमी बाईपास और अन्य संवेदनशील परियोजनाओं से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों तथा भूमि सौदों के आरोपों की स्वतंत्र व समयबद्ध जांच कराने की मांग की। दूसरे, उन्होंने कहा कि बाघ गलियारों से जुड़ी सभी परियोजनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन, संरेखण और निर्णय प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए। तीसरे, यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है, तो दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि बाघ संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि सड़क, रेल, सिंचाई, नगरीय विकास और राजस्व विभागों की भी समान जिम्मेदारी है कि विकास योजनाएं प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर तैयार हों। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक लापरवाही, समन्वय की कमी या निजी हितों के आरोपों के बीच प्रभावी संरक्षण संभव नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर, सिंघार ने यह तय करने का आह्वान किया कि विकास की हर परियोजना पारदर्शिता, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और जनहित की कसौटी पर खरी उतरे। उन्होंने कहा कि अपनी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर बाघ संरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता। बाघ केवल जंगल की शान नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र की जीवनरेखा हैं, और उनके जंगल सुरक्षित नहीं रहेंगे तो हमारी नदियां, जल स्रोत, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी खतरे में पड़ जाएगा।
