वंदे मातरम: शर्मिला टैगोर ने छह छंदों पर विवाद को छेड़ा नया विमर्श
राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के छह अंतरों के गायन पर छिड़ी बहस के बीच दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने कहा है कि शुरुआती दो छंद ही सहज हैं, जबकि बाद के छंद एकेश्वरवादी आस्था वालों के लिए कठिन हो सकते हैं।

द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026
राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह अंतरों के आधिकारिक कार्यक्रमों में गायन को लेकर शुरू हुई बहस ने अब राजनीतिक गलियारों से निकलकर फिल्म और सांस्कृतिक जगत में भी दस्तक दे दी है। दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने इस विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि गीत के शुरुआती दो छंद ही अपेक्षाकृत सहज हैं, जबकि इसके बाद के छंद उन लोगों के लिए कठिन हो सकते हैं जो केवल एक ईश्वर में विश्वास रखने वाली धार्मिक परंपरा से आते हैं। उनके इस बयान ने ‘वंदे मातरम’ के पूर्ण पाठ, धार्मिक भावनाओं और राष्ट्रवादी प्रतीकों को लेकर चल रही बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है।
विवाद की जड़ में सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के पूरे छह अंतरों को गाने से जुड़ा नया प्रोटोकॉल है। स्वतंत्रता दिवस और अन्य आधिकारिक आयोजनों में राष्ट्रगीत के निर्धारित स्वरूप को लेकर सरकार की ओर से जोर दिए जाने के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या पूरे गीत का गायन सभी धार्मिक और सामाजिक समुदायों के लिए समान रूप से सहज है।
कांग्रेस मुख्यालय का कार्यक्रम बना राजनीतिक मुद्दा
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय में ‘वंदे मातरम’ के छह अंतरों के गायन को लेकर भी राजनीतिक विवाद सामने आया। भाजपा और कांग्रेस के बीच इस मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। भाजपा ने इसे राष्ट्रगीत के सम्मान से जोड़कर देखा, वहीं कांग्रेस और उसके समर्थक पक्षों ने गीत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संदर्भों को लेकर अलग-अलग तर्क प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं हुईं। हालांकि, इस संबंध में सामने आए दावों और राजनीतिक आरोपों को लेकर अलग-अलग पक्षों की अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं। यही कारण है कि विवाद केवल कार्यक्रम में गीत के गायन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कांग्रेस और भाजपा के बीच एक व्यापक वैचारिक बहस का हिस्सा बन गया।
शर्मिला टैगोर ने धार्मिक संवेदनशीलता की ओर खींचा ध्यान
शर्मिला टैगोर की टिप्पणी ने इस बहस को एक अलग आयाम दिया है। उनका कहना है कि ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंदों की स्वीकार्यता व्यापक है, लेकिन बाद के छंदों में आने वाले धार्मिक प्रतीकों और देवी-स्वरूप की कल्पना के कारण एकेश्वरवादी आस्था रखने वाले लोगों के लिए पूरे गीत का गायन सहज नहीं हो सकता।
उनकी टिप्पणी का मूल प्रश्न यह है कि राष्ट्र के प्रति सम्मान और किसी धार्मिक प्रतीक या आस्था को स्वीकार करने के बीच अंतर किया जाना चाहिए। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो ‘वंदे मातरम’ का सम्मान राष्ट्रीय भावना का विषय हो सकता है, लेकिन इसके प्रत्येक अंतरे के गायन को लेकर व्यक्तिगत धार्मिक विश्वासों की संवेदनशीलता भी अपनी जगह महत्वपूर्ण है।
शुरुआती दो छंदों पर व्यापक सहमति
‘वंदे मातरम’ की सार्वजनिक और आधिकारिक प्रस्तुतियों में लंबे समय से इसके शुरुआती हिस्से का इस्तेमाल अधिक दिखाई देता है। इन पंक्तियों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, समृद्धि और वंदना का भाव प्रमुख रूप से सामने आता है। यही हिस्सा स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले गीत के रूप में व्यापक रूप से लोकप्रिय हुआ।
विवाद का बड़ा हिस्सा बाद के छंदों को लेकर है, जिनमें धार्मिक प्रतीकों और देवी के स्वरूप से जुड़े बिंब दिखाई देते हैं। इसी कारण कुछ लोग पूरे गीत के बजाय उसके शुरुआती हिस्से को सार्वजनिक और राष्ट्रीय आयोजनों के लिए अधिक उपयुक्त मानते रहे हैं।
राष्ट्रगीत का सम्मान और धार्मिक आस्था: एक जटिल प्रश्न
वर्तमान विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। ‘वंदे मातरम’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस गीत ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके कारण इसके प्रति सम्मान को लेकर एक व्यापक भावनात्मक जुड़ाव रहा है।
दूसरी ओर, भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए यह तर्क भी सामने आता है कि किसी नागरिक की धार्मिक आस्था को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय कार्यक्रमों में उसकी भागीदारी को लेकर संवेदनशीलता बरती जानी चाहिए। इसी बिंदु पर राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
राजनीतिक दलों के बीच बढ़ी बयानबाजी
भाजपा इस मुद्दे को राष्ट्रगीत के सम्मान और राष्ट्रीय गौरव से जोड़कर देख रही है। पार्टी नेताओं और समर्थकों की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि स्वतंत्रता आंदोलन के एक महत्वपूर्ण प्रतीक रहे ‘वंदे मातरम’ को लेकर आपत्ति क्यों होनी चाहिए।
वहीं कांग्रेस की ओर से यह संकेत दिया जाता रहा है कि राष्ट्रगीत के सम्मान के साथ-साथ देश की विविध धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक संदर्भों को भी समझना जरूरी है। पार्टी के भीतर भी इस विषय पर अलग-अलग विचार सामने आते रहे हैं। इस तरह ‘वंदे मातरम’ का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया है, जिसने स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसर पर राजनीतिक दलों को एक-दूसरे पर निशाना साधने का अवसर भी दिया है।
बॉलीवुड की प्रतिक्रिया से बहस को मिला नया मोड़
शर्मिला टैगोर का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह भारतीय सिनेमा की एक प्रतिष्ठित हस्ती हैं जिनकी सार्वजनिक टिप्पणियों को व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में देखा जाता है। उनके बयान के बाद यह बहस केवल राजनीतिक दलों तक सीमित रहने के बजाय कला, संस्कृति और समाज के बीच भी चर्चा का विषय बन सकती है। उनकी टिप्पणी को एक पक्ष धार्मिक संवेदनशीलता के संदर्भ में देख रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राष्ट्रगीत के व्यापक स्वरूप पर प्रश्न के रूप में देख सकता है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में भी ऐसे बयानों के बाद पक्ष-विपक्ष में प्रतिक्रियाएं सामने आना स्वाभाविक है।
इतिहास, आस्था और राष्ट्रभावना के बीच संतुलन की चुनौती
‘वंदे मातरम’ पर मौजूदा विवाद वास्तव में तीन अलग-अलग संवेदनाओं के बीच संतुलन का प्रश्न है—स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, राष्ट्र के प्रति सम्मान और नागरिकों की धार्मिक आस्था। भारत में राष्ट्रवादी प्रतीकों का इतिहास बेहद गहरा है, और ‘वंदे मातरम’ इसी इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए इसके सम्मान को लेकर भावनाएं स्वाभाविक हैं। लेकिन भारत की बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक संरचना में यह भी जरूरी है कि किसी राष्ट्रीय प्रतीक की व्याख्या करते समय अलग-अलग समुदायों की संवेदनशीलताओं को समझा जाए।
शर्मिला टैगोर के बयान ने इसी पुराने प्रश्न को नए सिरे से सामने ला दिया है—क्या राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति का एक ही तरीका होना चाहिए या राष्ट्रीय सम्मान के साथ व्यक्तिगत आस्था और संवैधानिक स्वतंत्रता के लिए भी पर्याप्त स्थान होना चाहिए? फिलहाल ‘वंदे मातरम’ को लेकर राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस जारी है।
