सूखे तालाब से पोडियम तक: भाला फेंक एथलीट आशीष यादव की प्रेरणादायक यात्रा
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के आशीष यादव ने वर्ल्ड एथलेटिक्स अंडर-20 चैंपियनशिप में भाला फेंक में रजत पदक जीता। लकड़ी के भाले और सूखे तालाब से शुरू उनका सफर प्रेरणादायक है।

द क्लिफ न्यूज़ | 11 अगस्त 2026
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के मवैया गांव के 19 वर्षीय युवा एथलीट आशीष यादव ने वर्ल्ड एथलेटिक्स अंडर-20 चैंपियनशिप में 74.09 मीटर के शानदार थ्रो के साथ भाला फेंक स्पर्धा में रजत पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया है। यह उपलब्धि उन्हें स्टार भालाफेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा के बाद इस प्रतियोगिता में पदक जीतने वाले दूसरे भारतीय एथलीट के रूप में स्थापित करती है। आशीष की सफलता की कहानी सीमित संसाधनों और कड़ी मेहनत से भरी एक प्रेरणादायक यात्रा है, जो किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।
बाधाओं को पार कर हासिल की सफलता
आशीष यादव के गांव और आसपास के क्षेत्रों में भाला फेंक के अभ्यास के लिए कोई उचित खेल मैदान या सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इस कमी ने युवा एथलीट को हतोत्साहित नहीं किया, बल्कि उन्होंने घर से लगभग दो किलोमीटर दूर एक सूखे तालाब को ही अपना प्रशिक्षण स्थल बना लिया। गर्मियों में सूख जाने वाला यह तालाब, बारिश के मौसम में खतरनाक दलदली इलाका बन जाता था, जहाँ बच्चों के कीचड़ में फंसने की घटनाएं भी होती थीं।
शुरुआत में आशीष के पास न तो आधुनिक खेल उपकरण थे और न ही सुरक्षित अभ्यास का माहौल। वह लकड़ी के भाले से अभ्यास करते थे। इन जोखिम भरी परिस्थितियों में अभ्यास करने के कारण उन्हें परिवार से डांट और मार भी खानी पड़ी। इसके बावजूद, उनका खेल के प्रति जुनून इतना प्रबल था कि उन्होंने अभ्यास करना नहीं छोड़ा। उनका मानना था कि कहीं न कहीं से शुरुआत करनी ही होगी। तालाब के पास स्थित शिव मंदिर उन्हें मानसिक संबल प्रदान करता था, और उनका दृढ़ विश्वास था कि भगवान शिव उनकी रक्षा करेंगे। इसी विश्वास ने उन्हें हर दिन अभ्यास के लिए प्रेरित किया।
प्रेरणा के स्रोत और प्रारंभिक संघर्ष
भारतीय स्टार भालाफेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा, आशीष के लिए एक प्रमुख प्रेरणा स्रोत रहे हैं। नीरज की ओलंपिक और विश्व स्तर पर दिलाई गई उपलब्धियों से प्रेरित होकर, आशीष ने भी भाला फेंक में अपना करियर बनाने का सपना देखा। संसाधनों की कमी के बावजूद, उन्होंने इसे अपना लक्ष्य बनाया और सीखने की अपनी तीव्र इच्छा के साथ अथक प्रयास किया।
आशीष ने अपनी किशोरावस्था के शुरुआती वर्षों तक अपने पिता के दूध व्यवसाय में भी हाथ बंटाया। 10 साल की उम्र से, उन्होंने गांव और आसपास के घरों में जाकर दूध निकालने में मदद की। उनके पिता उस दूध को बेचते थे। आशीष बताते हैं कि 17 साल की उम्र तक वह अपने पिता के काम में सहयोग करते रहे। उस समय शायद किसी ने यह कल्पना नहीं की होगी कि दूध बेचने वाले परिवार का यह युवा एक दिन अंतरराष्ट्रीय स्तर की एथलेटिक्स प्रतियोगिता में भारत के लिए पदक जीतेगा।
कोच की नजर और खेल प्राधिकरण का सहयोग
लगभग दो साल पहले, आशीष का चयन इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट और भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के संयुक्त प्रशिक्षण केंद्र में हुआ। उस समय उनका वजन करीब 70 किलोग्राम था और ऊंचाई लगभग 6 फीट 1 इंच थी। शारीरिक रूप से दुबले-पतले होने के कारण उन्हें शुरुआत में अंडरवेट माना गया। हालांकि, कोच अरविंद कुमार ने उनकी छिपी हुई प्रतिभा, तकनीक, शारीरिक बनावट और भाला फेंकने की क्षमता में एक भविष्य के बड़े खिलाड़ी की झलक देखी।
कोच के मार्गदर्शन में, आशीष को बेहतर प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और आवश्यक खेल सुविधाएं मिलने लगीं। इन उन्नत संसाधनों के साथ, उनकी मेहनत और समर्पण ने रंग दिखाना शुरू किया और उनके प्रदर्शन में लगातार सुधार हुआ।
भविष्य की राह और प्रेरणा का नया प्रतीक
वर्ल्ड एथलेटिक्स अंडर-20 चैंपियनशिप में जीता गया रजत पदक आशीष के लिए अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का प्रतीक है। नीरज चोपड़ा को आदर्श मानकर भाला फेंकने का सपना देखने वाले आशीष, अब भारतीय एथलेटिक्स की युवा पीढ़ी के लिए स्वयं एक प्रेरणास्रोत बन गए हैं।
वह युवा जो कभी गांव में अभ्यास के लिए एक उचित जगह तक नहीं ढूंढ पाता था, जिसने जोखिम भरे सूखे तालाब को अपना खेल का मैदान बनाया, और जिसने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाते हुए भी अपने खेल के सपने को जीवित रखा, उसने अब यह साबित कर दिया है कि संसाधनों की कमी प्रतिभा के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती, यदि जुनून और मेहनत साथ हो। आशीष यादव की यह संघर्ष से सफलता तक की यात्रा भारतीय भाला फेंक के भविष्य के लिए एक नई उम्मीद जगाती है।
