सीजेपी और सरकार में SC के आदेश पर तकरार, आंदोलन की चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रदर्शनकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई, लेकिन एफआईआर वापसी की मांग पर सीजेपी और सरकार के बीच गतिरोध जारी है।

द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 29 जुलाई 2026
हालिया छात्र-युवा आंदोलनों के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी एक अंतरिम आदेश के संदर्भ में सीजेपी ने अदालत के सीमित हस्तक्षेप पर गंभीर असहमति व्यक्त की है। पार्टी का आरोप है कि इस आदेश से सरकार को पुराने मुकदमे जारी रखने और आंदोलन के दौरान किए गए वादों से पीछे हटने का अवसर मिल गया है। सीजेपी ने स्पष्ट किया है कि यदि सभी मामलों की वापसी और सरकार से लिखित गारंटी नहीं मिली, तो वे देशव्यापी आंदोलन को एक नए चरण में पुनः आरंभ करेंगे।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में कहा है कि सीजेपी के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों में शामिल ऐसे छात्रों और युवाओं के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई (कोअर्सिव एक्शन) नहीं की जाएगी, जिनका पहले कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि पात्र युवाओं की रिहाई सुनिश्चित की जाए। हालांकि, न्यायालय ने पुलिस को मामलों की निष्पक्ष जांच जारी रखने, सीसीटीवी फुटेज एवं अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने तथा कानून के अनुसार जांच पूरी करने की अनुमति प्रदान की है।
एफआईआर वापसी को लेकर गतिरोध
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के इसी बिंदु पर सीजेपी की मुख्य आपत्ति केंद्रित है। पार्टी का कहना है कि न्यायालय ने वर्तमान में दर्ज एफआईआर को रद्द करने अथवा स्वतः वापस लेने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार, जांच के बहाने इन मुकदमों को जारी रख सकती है। सीजेपी के प्रमुख प्रवक्ताओं, जिनमें सौरव दास भी शामिल हैं, ने इस फैसले पर निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि यह आंदोलनकारियों को पूर्ण न्याय प्रदान नहीं करता और सरकार को अपने वादों से मुकरने का मार्ग प्रशस्त करता है।
सीजेपी का दावा है कि 25 जुलाई को आंदोलन समाप्त होने से पूर्व सरकार द्वारा यह भरोसा दिलाया गया था कि प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज किए गए सभी मुकदमे वापस ले लिए जाएंगे। पार्टी अब इस मौखिक आश्वासन को लिखित रूप में लागू करने की मांग कर रही है। सीजेपी का तर्क है कि केवल मौखिक भरोसे के आधार पर ही आंदोलन समाप्त करवाया गया था, परन्तु अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकार अपने वादे से पीछे हट रही है।
सरकार का रुख और कानूनी प्रक्रिया
वहीं, दूसरी ओर सरकारी पक्ष और पुलिस प्रशासन का कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। हालांकि, जिन व्यक्तियों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, हिंसा फैलाने या पुलिसकर्मियों पर हमला करने जैसे गंभीर आरोप हैं, उनके विरुद्ध दर्ज मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई अवश्य जारी रहेगी। अधिकारियों का यह भी कहना है कि ऐसे सभी मामलों की जांच अत्यंत निष्पक्षता से पूरी की जाएगी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही आगे की कानूनी प्रक्रिया निर्धारित की जाएगी।
आंदोलन की पुनः शुरुआत की चेतावनी
सीजेपी ने सरकार के इस रुख को सिरे से खारिज कर दिया है। पार्टी ने साफ चेतावनी दी है कि यदि सभी एफआईआर वापस नहीं ली गईं और आंदोलन के दौरान किए गए वादों की लिखित गारंटी प्रदान नहीं की गई, तो संगठन देशव्यापी स्तर पर एक नए चरण का आंदोलन आरंभ करेगा। पार्टी का यह भी आरोप है कि छात्रों और युवाओं को न्याय दिलाने हेतु उनका संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है और वे इस लड़ाई को जारी रखेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है। प्रमुख विपक्षी दल सरकार से अपने द्वारा किए गए आश्वासनों को पूरा करने की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार की ओर से बार-बार कानून-व्यवस्था बनाए रखने और हिंसा से जुड़े मामलों में कार्रवाई जारी रखने की बात दोहराई जा रही है। ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बावजूद, छात्र आंदोलन और उससे जुड़े कानूनी एवं राजनीतिक विवादों का फिलहाल समाप्त होने के आसार कम ही दिख रहे हैं।
