सीहोर: डाबरी जंगल में हजारों सागौन पेड़ों की कटाई पर ग्रामीणों में आक्रोश
सीहोर के डाबरी जंगल में हजारों सागौन पेड़ों की अवैध कटाई और वनभूमि पर कब्जे के आरोप से ग्रामीणों में रोष है। वे निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

द क्लिफ न्यूज़ | सीहोर | 14 अगस्त 2026
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में स्थित डाबरी जंगल और इसके आसपास के वन क्षेत्रों में हजारों सागौन पेड़ों की कथित अवैध कटाई तथा वनभूमि पर अतिक्रमण की घटनाओं ने वन संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। स्थानीय ग्रामीणों द्वारा लगाए गए इन आरोपों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं और क्षेत्र में आक्रोश का माहौल है।
ग्रामीणों का दावा है कि डाबरी के घने जंगलों में बड़े पैमाने पर सागौन के पेड़ों को काटा गया है, जिससे जंगल का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। कई स्थानों पर जहां पहले सघन वन हुआ करता था, अब पेड़ों की संख्या में भारी कमी देखी जा रही है। यह स्थिति न केवल वन संपदा के लिए चिंताजनक है, बल्कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन पर भी नकारात्मक प्रभाव डालने की आशंका है।
पेड़ों की कटाई और वनभूमि पर कब्जे की शिकायतें
स्थानीय निवासियों के अनुसार, जंगल के कई हिस्सों में अवैध कटाई की गतिविधियां लंबे समय से जारी हैं। पेड़ों की निरंतर कटाई के साथ-साथ, वन भूमि पर भी धीरे-धीरे कब्जे की जा रही हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का काटा जाना और वनभूमि का अतिक्रमण बिना स्थानीय वन अमले की जानकारी या मिलीभगत के संभव नहीं है। उन्होंने वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों की संभावित संलिप्तता या लापरवाही की ओर इशारा करते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
ग्रामीणों ने इस बात पर जोर दिया कि जंगलों की सुरक्षा केवल कागजों पर की जाने वाली निगरानी से संभव नहीं है। वन क्षेत्रों में नियमित गश्त, संवेदनशील इलाकों की प्रभावी निगरानी और अवैध कटाई की घटनाओं पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है। उनका मानना है कि अक्सर पेड़ कटाई के बाद ही मामला संज्ञान में आता है, तब तक वन संपदा को काफी नुकसान हो चुका होता है, जिसकी भरपाई करना कठिन हो जाता है।
सागौन की महत्ता और पर्यावरणीय चिंताएं
सागौन मध्य प्रदेश की एक अत्यंत मूल्यवान वन संपदा है, जो न केवल आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है। बड़े और घने पेड़ों की कटाई से न केवल कीमती लकड़ी का नुकसान होता है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम भी होते हैं। इनमें मिट्टी के कटाव में वृद्धि, जैव विविधता में कमी, जल संरक्षण की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव और वन्यजीवों के आवास का विनाश जैसी गंभीर पर्यावरणीय समस्याएं शामिल हैं।
वनभूमि पर अवैध कब्जे की बढ़ती शिकायतें इस मुद्दे को और अधिक गंभीर बना देती हैं। यदि वन क्षेत्र की भूमि को अवैध रूप से साफ करके खेती, निर्माण या किसी अन्य गतिविधि के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, तो यह धीरे-धीरे वन क्षेत्र के सिकुड़ने का कारण बन सकता है। ऐसे मामलों में केवल पेड़ काटने वालों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होती, बल्कि यह जांचना भी आवश्यक है कि वनभूमि का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है और इसके पीछे कोई सुनियोजित या संगठित गतिविधि तो नहीं है।
ग्रामीणों की मांगें और आगे की राह
स्थानीय लोगों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि डाबरी वन क्षेत्र का विस्तृत और वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए। इस सर्वेक्षण में काटे गए पेड़ों की सटीक संख्या, प्रभावित वन क्षेत्र का विस्तार, वनभूमि पर संभावित अतिक्रमण और पूर्व में दर्ज की गई शिकायतों के रिकॉर्ड को शामिल किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, पुराने वन मानचित्रों की तुलना वर्तमान स्थिति से करके यह पता लगाया जाना चाहिए कि वन आवरण में कितनी कमी आई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए, ग्रामीण समुदाय की एक प्रमुख मांग यह भी है कि इस जांच को केवल स्थानीय स्तर तक सीमित न रखा जाए। यदि जांच के दौरान किसी वन कर्मचारी या अधिकारी की संलिप्तता सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करते हुए कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, उन लोगों के खिलाफ भी कानूनी शिकंजा कसा जाना चाहिए जो इन अवैध गतिविधियों में सीधे तौर पर शामिल हैं।
डाबरी के जंगलों से उठ रही यह आवाज केवल कुछ पेड़ों की कटाई का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की बहुमूल्य वन संपदा की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। यदि ग्रामीणों के आरोप सही साबित होते हैं, तो हजारों पेड़ों की यह कथित कटाई एक बड़ी पर्यावरणीय क्षति का संकेत होगी। ऐसे परिदृश्य में, एक पारदर्शी, निष्पक्ष जांच, दोषियों की पहचान और वन क्षेत्र की प्रभावी सुरक्षा ही इस विवाद का स्थायी समाधान प्रदान कर सकती है।
