शल्यक्रिया के बाद तंत्रिका चोट: खिंचाव के कारण होने वाले पक्षाघात का जोखिम और प्रबंधन
शल्यक्रिया के दौरान या बाद में अत्यधिक खिंचाव से तंत्रिका क्षति हो सकती है, जिससे पक्षाघात, संवेदी हानि और अन्य गंभीर जटिलताएं उत्पन्न हो सकती...

द क्लिफ न्यूज़ | 24 अगस्त 2026
शल्यक्रिया के उपरांत उत्पन्न होने वाला तंत्रिका पक्षाघात, विशेष रूप से खिंचाव से जनित तंत्रिका चोट, चिकित्सा जगत के लिए एक चिंता का विषय बनी हुई है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब शल्यक्रिया के दौरान या उसके पश्चात किसी अंग को असामान्य रूप से लंबा खींचा जाता है, या किसी विशेष स्थिति में लंबे समय तक रखा जाता है, जिससे तंत्रिका पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। इस प्रकार की चोट न केवल तंत्रिका के सामान्य कार्यों को बाधित करती है, बल्कि गंभीर मामलों में स्थायी विकलांगता का कारण भी बन सकती है।
शल्यक्रिया के दौरान तंत्रिका पर पड़ने वाले अत्यधिक खिंचाव से तंत्रिका के भीतर रक्त संचार बाधित हो जाता है। इससे तंत्रिका कोशिकाओं में इस्किमिया (ऑक्सीजन की कमी) उत्पन्न होता है, जो तंत्रिका चालन (नर्व कंडक्शन) को रोकता है। अत्यधिक गंभीर स्थितियों में, यह अक्षीय क्षति (एक्शन डैमेज) का रूप ले लेता है, जिससे तंत्रिका की संरचनात्मक अखंडता भंग हो जाती है। इस चोट की गंभीरता न्यूराप्रेक्सिया से लेकर न्यूरोटमेसिस तक भिन्न हो सकती है।
तंत्रिका क्षति के प्रकार और गंभीरता
खिंचाव से होने वाली तंत्रिका क्षति को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है, जो इसकी गंभीरता और ठीक होने की संभावना को दर्शाती हैं।
न्यूराप्रेक्सिया: यह चोट का सबसे हल्का रूप है, जिसमें तंत्रिका चालन अस्थायी रूप से बाधित होता है। इसमें तंत्रिका की संरचनात्मक अखंडता बनी रहती है, और अधिकांश मामलों में, रोगी पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं।
एक्सोनोटमेसिस: इस स्थिति में, तंत्रिका का अक्षीय (एक्जोन) ढांचा क्षतिग्रस्त हो जाता है, लेकिन तंत्रिका के चारों ओर मौजूद संयोजी ऊतक अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते हैं। यह स्थिति समय के साथ अक्षीय पुनर्जनन (एक्जोनल रीजनरेशन) के माध्यम से सुधार की संभावना प्रदान करती है, यद्यपि इसमें अधिक समय लग सकता है।
न्यूरोटमेसिस: यह तंत्रिका क्षति का सबसे गंभीर रूप है, जिसमें तंत्रिका पूरी तरह से खंडित हो जाती है। ऐसे मामलों में, तंत्रिका के स्वतः सुधार की संभावना बहुत कम होती है, और अक्सर इसे ठीक करने के लिए शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़ती है।
ऊपरी अंग की शल्यक्रियाओं में जोखिम
ऊपरी अंग से संबंधित शल्यक्रियाओं, विशेष रूप से कंधे की सर्जरी, में ब्रेकियल प्लेक्सस (कंधे का तंत्रिका जाल) खिंचाव-जनित चोटों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होता है। लंबे समय तक ट्रेंडेलनबर्ग या पार्श्व स्थिति (लैटरल पोजीशन) में रोगी को रखना, या बांह को अत्यधिक अपहरण (एबडक्शन) की स्थिति में ले जाना, ब्रेकियल प्लेक्सस पर खिंचाव डाल सकता है। इसके परिणामस्वरूप रोगी को कमजोरी और संवेदी हानि का अनुभव हो सकता है।
C5-C6 स्तर पर ऊपरी धड़ की चोटों में डेल्टॉइड (कंधे की मांसपेशी) और बाइसेप्स (भुजा की मांसपेशी) की कमजोरी देखी जा सकती है। एक्सिलरी तंत्रिका (जो डेल्टॉइड को नियंत्रित करती है) में चोट लगने पर कंधे के बाहरी हिस्से में संवेदनशीलता कम हो सकती है। रेडियल तंत्रिका की क्षति से कलाई और उंगलियों का लटकना (जिसे 'ड्रूप' भी कहते हैं) आम है। अलनार तंत्रिका की चोट से चौथी और पांचवीं उंगलियों में सुन्नपन और हाथ की छोटी मांसपेशियों की कमजोरी हो सकती है। मीडियन तंत्रिका की चोट के लक्षण अंगूठे के आधार पर थिनार मांसपेशियों की कमजोरी और अंगूठे, तर्जनी और मध्यमा उंगलियों में संवेदी लक्षण के रूप में प्रकट होते हैं।
निचले अंग की शल्यक्रियाओं में जटिलताएं
निचले अंग में, कॉमन फिबुलर तंत्रिका (जो घुटने के पास स्थित होती है) अत्यधिक जोखिम में रहती है। यह फिबुलर गर्दन के पास अपेक्षाकृत सतही होती है। घुटने की सर्जरी, गंभीर विकृतियों का सुधार, रिट्रैक्टर का अनुचित दबाव, या लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहने से इस तंत्रिका को नुकसान पहुँच सकता है। इसकी चोट का सबसे आम लक्षण 'फुट ड्रॉप' है, जिसमें रोगी को पैर को ऊपर उठाने में कठिनाई होती है, और पैर बाहर की ओर मुड़ने (इवर्जन) की क्षमता भी कम हो जाती है।
कूल्हे की सर्जरी, विशेष रूप से टोटल हिप रिप्लेसमेंट (कुल कूल्हा प्रत्यारोपण) में, शियाटिक तंत्रिका या उसके पेरोनियल विभाजन की चोट एक महत्वपूर्ण और संभावित रूप से गंभीर जटिलता है। अत्यधिक अंग लंबा करना (स्ट्रेचिंग), कठिन रिडक्शन प्रक्रिया, पुनरीक्षण सर्जरी (revision surgery), पूर्व शल्यक्रिया के निशान, और एसिटाबुलर (कूल्हे के सॉकेट) की विकृति इस जोखिम को बढ़ा सकती है। फीमोरल तंत्रिका की चोट से क्वाड्रिसेप्स (जांघ की सामने की मांसपेशी) की कमजोरी और घुटने को सीधा करने में कमी आती है। ऑब्ट्यूरेटर तंत्रिका प्रभावित होने पर जांघ की अंदरूनी मांसपेशियों (एडक्टर) में कमजोरी देखी जा सकती है।
निदान और प्रबंधन
शल्यक्रिया से पूर्व और पश्चात की विस्तृत न्यूरोलॉजिकल जांच अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें प्रत्येक प्रमुख तंत्रिका के मोटर शक्ति (मांसपेशियों की ताकत), संवेदनशीलता (सेंसरी फंक्शन), पल्स (नाड़ी) और संवहनी स्थिति (वैस्कुलर स्टेटस) का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन शामिल है। दर्द, सूजन, कम्पार्टमेंट सिंड्रोम (मांसपेशियों में दबाव बढ़ना) और अंग की स्थिति का आकलन भी आवश्यक है।
यदि ऑपरेशन के बाद कोई नया तंत्रिका संबंधी विकार सामने आता है, तो पहला कदम संभावित खिंचाव या संपीड़न के कारण को हटाना और अंग की स्थिति को सामान्य करना होता है। साथ ही, संवहनी स्थिति का भी तत्काल आकलन किया जाना चाहिए। तंत्रिका संबंधी निष्कर्षों का विस्तृत और तत्काल दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए।
यदि संरचनात्मक संपीड़न (structural compression) का संदेह हो, तो अल्ट्रासाउंड या एमआरआई जैसी इमेजिंग तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। चोट की सीमा और पूर्वानुमान का बेहतर आकलन करने के लिए इलेक्ट्रोमायोग्राफी (ईएमजी) और नर्व कंडक्शन स्टडी (एनसीएस) जैसे तंत्रिका अध्ययन उचित समय पर किए जाने चाहिए।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि हर शल्यक्रिया-पश्चात तंत्रिका विकार को सीधे शल्य चिकित्सा के कारण हुई प्रत्यक्ष तंत्रिका क्षति नहीं माना जा सकता। खिंचावजनित न्यूरोपैथी, संपीड़न, इस्किमिया, पोजीशनिंग के कारण हुई चोट, पूर्व-मौजूदा न्यूरोपैथी (जैसे मधुमेह के कारण), और प्रत्यक्ष आघात सहित सभी संभावित कारणों का व्यवस्थित रूप से मूल्यांकन और दस्तावेजीकरण करना चिकित्सकीय-कानूनी दृष्टिकोण से आवश्यक है।
