SC/ST आरक्षण पर 'क्रीमी लेयर' लागू नहीं: केंद्र का सुप्रीम कोर्ट में रुख
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण पर 'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत लागू नहीं होता है। सरकार का तर्क है कि SC/ST आरक्षण का आधार ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव है, न कि आर्थिक स्थिति।

द क्लिफ न्यूज़ | 7 अगस्त 2026
केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण के संबंध में एक महत्वपूर्ण पक्ष उजागर करते हुए सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि इन समुदायों के आरक्षण पर 'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत लागू नहीं होता है। न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में सरकार ने अपना रुख साफ किया कि 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा मुख्य रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण से संबंधित है, जबकि SC और ST समुदायों के लिए आरक्षण का आधार इसके विपरीत है।
सरकार का तर्क है कि SC और ST समुदायों को आरक्षण देने का प्राथमिक उद्देश्य केवल आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करना नहीं है, बल्कि उन सदियों पुरानी सामाजिक असमानताओं, अस्पृश्यता की कुप्रथाओं और ऐतिहासिक वंचनाओं को समाप्त करना है जिनका इन समुदायों ने सामना किया है। यह रुख आरक्षण के मूल उद्देश्यों और संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित है, जिसका लक्ष्य सामाजिक न्याय और समानता स्थापित करना है।
आरक्षण का संवैधानिक आधार और 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में इस बात पर जोर दिया कि भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के भीतर 'क्रीमी लेयर' जैसी किसी विशेष श्रेणी या व्यवस्था का कोई प्रावधान निर्धारित नहीं किया गया है। सरकार का यह भी कहना है कि SC/ST समुदायों की पहचान ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियों, अवसरों की कमी और सामाजिक बहिष्कार के आधार पर की गई है। इसलिए, इन वर्गों के लिए आरक्षण में आय या आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई उप-वर्गीकरण करना संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
सरकार के अनुसार, इन समुदायों का पिछड़ापन केवल आय या संपत्ति से मापा नहीं जा सकता। यह सामाजिक बहिष्कार, ऐतिहासिक अन्याय और समान अवसरों से वंचित रहने का परिणाम है। यही कारण है कि संविधान निर्माताओं ने इनके लिए विशेष प्रावधानों का समावेश किया ताकि उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके और सामाजिक समानता सुनिश्चित की जा सके। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे के माध्यम से, सरकार ने इस बात पर बल दिया कि SC/ST समुदायों को दिया जाने वाला आरक्षण उनकी सामाजिक और शैक्षिक स्थिति को ऊपर उठाने के लिए है, न कि केवल आर्थिक सहायता के लिए। यह एक आवश्यक सुधार है ताकि उन लोगों को न्याय मिल सके जिन्होंने लंबे समय तक उत्पीड़न का सामना किया है।
SC/ST सूची में परिवर्तन का अधिकार और संसद की भूमिका
हलफनामे में केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची में किसी भी प्रकार का बदलाव या आरक्षण की मूल संरचना में संशोधन करने का अधिकार केवल संसद को है। संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत, SC और ST की सूची का निर्धारण राष्ट्रपति की अधिसूचना और संसद द्वारा बनाए जाने वाले कानूनों के माध्यम से होता है। हालांकि राज्य सरकारें इन समुदायों से संबंधित विषयों पर कार्य कर सकती हैं, लेकिन मूल सूची को संशोधित करने या उसमें परिवर्तन करने की शक्ति पूरी तरह से संसद के पास निहित है। इस प्रकार, आरक्षण के दायरे या उसके लाभों को प्रभावित करने वाले किसी भी बड़े निर्णय में संसद की संप्रभुता सर्वोपरि है।
यह स्पष्टीकरण उन विभिन्न अदालती मामलों और जनहित याचिकाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है जो SC/ST सूची में शामिल किए जाने या बाहर किए जाने के संबंध में दायर की जाती हैं। सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि इन सूचियों में संशोधन के लिए एक निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है, जिसमें राजनीतिक और सामाजिक विचार-विमर्श शामिल होता है।
आरक्षण व्यवस्था को लेकर निरंतर बहस और वर्तमान न्यायिक परिप्रेक्ष्य
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब SC/ST आरक्षण में 'क्रीमी लेयर' को लागू करने को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच समय-समय पर बहस और चर्चाएं होती रही हैं। कुछ पक्ष मानते हैं कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे जरूरतमंद और पिछड़े व्यक्तियों तक ही सीमित रहना चाहिए, जिसके लिए आर्थिक आधार पर वर्गीकरण आवश्यक है। वहीं, एक बड़ा वर्ग यह तर्क देता है कि SC/ST आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक समानता और ऐतिहासिक अन्याय का निवारण करना है, और इसमें आर्थिक मापदंड लागू करने से इसके मूल उद्देश्य से भटकाव हो सकता है।
जनवरी 2024 में, सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने नौकरियों में SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति देने या न देने के संबंध में महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर सुनवाई की थी। पीठ ने यह भी संकेत दिया था कि 'क्रीमी लेयर' के मुद्दे को केवल आर्थिक आधार पर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि SC/ST समुदायों का पिछड़ापन उनके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ा है। 1 अगस्त 2024 को, सुप्रीम कोर्ट की सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण को संवैधानिक रूप से अनुमेय माना, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि केवल आर्थिक आधार पर 'क्रीमी लेयर' को बाहर नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि राज्य को पिछड़ेपन की पहचान के लिए प्रत्येक वर्ग की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति पर विचार करना चाहिए। यह निर्णय केंद्र सरकार के वर्तमान रुख को और अधिक मजबूती प्रदान करता है।
केंद्र सरकार का यह रुख, जो सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया है, वर्तमान संवैधानिक ढांचे और हाल की न्यायिक व्याख्याओं के अनुरूप है। सरकार का हलफनामा स्पष्ट करता है कि SC/ST आरक्षण का आधार सामाजिक और ऐतिहासिक वंचना है, न कि केवल आर्थिक स्थिति। यह स्थिति इस तर्क पर आधारित है कि इन समुदायों को ऐतिहासिक रूप से सामाजिक भेदभाव और अवसरों की कमी का सामना करना पड़ा है, जिसे केवल आय या संपत्ति के आधार पर मापा नहीं जा सकता। इसलिए, 'क्रीमी लेयर' का सिद्धांत, जो मुख्य रूप से OBC आरक्षण के संदर्भ में विकसित हुआ है, SC/ST पर सीधे लागू नहीं होता।
अब इस महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और इस पर होने वाले विचार-विमर्श से आरक्षण व्यवस्था की दिशा को लेकर स्थिति और अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है, जिससे वंचित समुदायों के अधिकारों और समावेशिता पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। सरकार का यह कदम आरक्षण नीति के मूल उद्देश्यों को बनाए रखने और न्यायसंगत समाज के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
