सबरीमाला: SC बेंच ने महिलाओं के धार्मिक अधिकारों, हिंदू धर्म की बहुलता पर बहस सुनी
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े याचिकाओं पर अंतिम...
मुख्य बातें
क्या हुआ: सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू की।
क्यों महत्वपूर्ण: यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के बीच संतुलन की जांच करता है, जिससे संवैधानिक सुरक्षा को फिर से परिभाषित किया जा सकता है।
क्या बदलाव: इस फैसले से भारत में विभिन्न धर्मों के धार्मिक प्रथाओं और महिलाओं के अधिकारों पर असर पड़ सकता है।
कौन प्रभावित: महिलाएं, धार्मिक संप्रदाय, और सभी नागरिक जो संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित हैं।
सबरीमाला मामले पर फिर से विचार
सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला मामले पर फिर से विचार कर रहा है, इसके साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता से संबंधित अन्य याचिकाएं भी हैं। पांच जजों की बेंच ने सितंबर 2018 में मासिक धर्म की उम्र वाली महिलाओं के सबरीमाला अयप्पा मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध हटा दिया था।
हालांकि, 2019 में, एक अन्य बेंच ने इस मुद्दे को एक बड़ी बेंच को भेज दिया, जिससे विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को भी शामिल किया गया।
हिंदू धर्म की बहुलता पर केंद्र का रुख
केंद्र सरकार 'धार्मिक संप्रदाय' या 'आवश्यक धार्मिक प्रथाओं' की कठोर परिभाषा के खिलाफ है। केंद्र के अनुसार, ऐसी परिभाषाएं हिंदू धर्म की अंतर्निहित बहुलता को "संकुचित" कर देंगी।
श्री. मेहता ने कहा, "हिंदू धर्म को एक संकीर्ण या एकल परिभाषा में संकुचित करने का कोई भी प्रयास सैद्धांतिक रूप से त्रुटिपूर्ण और संवैधानिक रूप से असुरक्षित होगा।"
धार्मिक स्वतंत्रता पर बहस
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि अदालतें 'धार्मिक संप्रदायों' और 'आवश्यक धार्मिक प्रथाओं' को संकीर्ण रूप से परिभाषित नहीं कर सकती हैं। उन्होंने भारत में धर्मों की बहुलता और प्रत्येक धर्म के भीतर आंतरिक विविधता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा की प्रस्तावना स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि में की जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान मुख्य टिप्पणियाँ
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने धर्म के प्रचार और जबरन धर्मांतरण के बीच अंतर को देखा। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि भारत ने हमेशा महिलाओं को न केवल समान रूप से बल्कि उच्च स्थान पर माना है, और महिला देवताओं की पूजा का उल्लेख किया।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांत आयरिश संविधान से लिए गए थे।
'धार्मिक संप्रदाय' की परिभाषा
अदालत संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत 'धार्मिक संप्रदाय' को परिभाषित करने के लिए संघर्ष कर रही है। तुषार मेहता ने 'धार्मिक संप्रदायों' को परिभाषित करने के लिए अमेरिकी सिद्धांतों को अंधाधुंध स्वीकार करने के खिलाफ तर्क दिया, और भारत की अनूठी धार्मिक संरचना पर जोर दिया।
उन्होंने शिरडी, तिरुपति बालाजी, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह और निजामुद्दीन औलिया दरगाह जैसे उदाहरणों का हवाला दिया, जहाँ सभी धर्मों के लोग आते हैं।
समीक्षा की समय-सीमा और दायरा
सुप्रीम कोर्ट का लक्ष्य अप्रैल के अंत तक मामले को समाप्त करना है। याचिकाकर्ता 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक अपने तर्क पेश करेंगे, जबकि विरोधी तर्क 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक निर्धारित हैं।
जवाबी प्रस्तुतियाँ 21 अप्रैल को निर्धारित हैं, इसके बाद 22 अप्रैल को न्याय मित्र द्वारा समापन प्रस्तुतियाँ होंगी।
सबरीमाला फैसले की वर्तमान स्थिति
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने स्पष्ट किया कि सबरीमाला फैसला लागू रहेगा। नौ जजों की बेंच के समक्ष वर्तमान समीक्षा केवल अनुच्छेद 25 और 26 से संबंधित कानून के प्रश्नों को संबोधित करेगी।
आगे क्या देखना है
अदालत धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे और आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की परिभाषा निर्धारित करने के लिए विभिन्न पक्षों के तर्कों को सुनना जारी रखेगी। इस मामले का परिणाम आने वाले वर्षों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित करने वाले मिसाल कायम कर सकता है।
