साइबर ठगों का नया पैंतरा: बिना लिंक-ओटीपी के उड़ाए पैसे, फिर दी धमकी
साइबर ठगों ने पैसे उड़ाने का नया तरीका ईजाद किया है। अब वे बिना लिंक क्लिक कराए या ओटीपी मांगे खाते से रकम उड़ा रहे हैं और फिर शिकायत वापस लेने की धमकी दे रहे हैं।

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 17 अगस्त 2026
साइबर अपराध का क्षेत्र लगातार विस्तार ले रहा है और अपराधी अब सीधे बैंक खातों को निशाना बना रहे हैं। हाल के दिनों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें ठग न केवल बिना किसी लिंक पर क्लिक कराए और न ही वन-टाइम पासवर्ड (ओटीपी) मांगे खाते से रकम उड़ाने में सफल हो रहे हैं, बल्कि पीड़ित को शिकायत वापस लेने या पुलिस में न जाने की धमकी देकर मानसिक दबाव भी बना रहे हैं। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि साइबर अपराधी अब केवल वित्तीय नुकसान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पीड़ितों में भय का माहौल बनाकर कानूनी कार्रवाई को रोकने का भी प्रयास कर रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ये अपराधी विभिन्न तकनीकों का सहारा लेते हैं, जिनमें आधार सक्षम भुगतान प्रणाली (एईपीएस) का दुरुपयोग, मैलवेयर का प्रयोग, सिम या डिवाइस क्लोनिंग, और चोरी किए गए बैंकिंग डेटा का इस्तेमाल शामिल हो सकता है। ऐसे अधिकांश मामलों में, खाताधारक को ठगी का अहसास तब होता है जब उनके खाते से पैसा निकल चुका होता है। यह स्थिति पीड़ितों के लिए गहरे सदमे और चिंता का कारण बनती है, खासकर जब उन्हें कानूनी कार्रवाई से रोकने की धमकी भी दी जाती है।
एईपीएस के दुरुपयोग से वित्तीय धोखाधड़ी
आधार सक्षम भुगतान प्रणाली (एईपीएस) एक ऐसी तकनीक है जिसके माध्यम से आधार नंबर और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण का उपयोग करके बैंकिंग लेनदेन संभव होते हैं। यदि साइबर अपराधी किसी व्यक्ति की आवश्यक जानकारी और प्रमाणीकरण प्रक्रिया में सेंध लगाने में कामयाब हो जाते हैं, तो वे अनधिकृत लेनदेन कर सकते हैं। एईपीएस के माध्यम से होने वाली ठगी की खास बात यह है कि इसके लिए पीड़ित को किसी लिंक पर क्लिक करने या अपना ओटीपी साझा करने की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार की धोखाधड़ी सीधे तौर पर ग्राहक की पहचान की पुष्टि के तंत्र को लक्षित करती है।
मैलवेयर और क्लोनिंग के जरिए बढ़ते खतरे
साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक अन्य प्रमुख तकनीक मैलवेयर का उपयोग है। वे पीड़ित के मोबाइल या अन्य डिजिटल उपकरणों में दुर्भावनापूर्ण सॉफ्टवेयर (मैलवेयर) स्थापित करने का प्रयास करते हैं। यह किसी संदिग्ध ऐप को डाउनलोड करने, अनजानी फाइलों को खोलने या अविश्वसनीय वेबसाइटों से सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करने के माध्यम से हो सकता है। एक बार मैलवेयर डिवाइस में स्थापित हो जाने के बाद, यह व्यक्तिगत और वित्तीय जानकारी चुरा सकता है या अनधिकृत लेनदेन को अंजाम दे सकता है। सिम या डिवाइस क्लोनिंग के माध्यम से भी बैंकिंग सेवाओं को निशाना बनाया जा सकता है, जहां अपराधी पीड़ित की पहचान का उपयोग करके नए सिम कार्ड जारी करवा सकते हैं या मौजूदा डिवाइस की कार्यप्रणाली की नकल कर सकते हैं।
ठगी के बाद धमकी देना: एक नया हथकंडा
साइबर ठगी के मामलों में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ठगी के बाद पीड़ित को धमकी भरे फोन आते हैं। इन कॉल में, अपराधी पीड़ितों से शिकायत वापस लेने, पुलिस में रिपोर्ट न करने, या यदि वे सहयोग नहीं करते हैं तो गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी धमकियों से घबराने के बजाय, पीड़ितों को तुरंत कानूनी और बैंकिंग सहायता लेनी चाहिए। इन धमकियों का उद्देश्य पीड़ितों को डराकर मामले को दबाना और अपनी पहचान उजागर होने से बचाना होता है।
तत्काल कार्रवाई: 1930 पर शिकायत और बैंक को सूचना
यदि आपके बैंक खाते से अनधिकृत लेनदेन हुआ है, तो एक भी पल बर्बाद न करें। तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर अपनी शिकायत दर्ज कराएं। आप नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (www.cybercrime.gov.in) के माध्यम से भी ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं। शुरुआती समय में शिकायत दर्ज कराने से संदिग्ध लेनदेन को रोकने या निकाली गई रकम की आगे की आवाजाही पर कार्रवाई करने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
इसके साथ ही, जैसे ही आपको खाते से रकम निकलने की जानकारी मिले, अपने बैंक के कस्टमर केयर या संबंधित शाखा को तत्काल सूचित करें। अनधिकृत लेनदेन की लिखित शिकायत देना भी अनिवार्य है। बैंक से अनुरोध करें कि वे आपके खाते, डेबिट/क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग, यूपीआई और अन्य संबंधित सेवाओं को तुरंत सुरक्षित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।
धमकी देने वाले नंबरों को ब्लॉक करें और साक्ष्य सुरक्षित रखें
यदि ठग आपको फोन करके शिकायत वापस लेने के लिए दबाव डालते हैं, तो उनसे बहस करने से बचें और अपनी कोई भी निजी या वित्तीय जानकारी साझा न करें। उनके द्वारा किए गए कॉल, भेजे गए मैसेज, व्हाट्सएप चैट और किसी भी अन्य उपलब्ध साक्ष्य को सावधानीपूर्वक सुरक्षित रखें। इसके बाद, ऐसे नंबरों को तुरंत ब्लॉक कर दें। इन धमकियों को भी अपनी पुलिस शिकायत में शामिल करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
पुलिस में लिखित शिकायत का महत्व
पीड़ित को अपने नजदीकी साइबर पुलिस स्टेशन या अपने स्थानीय थाने में एक विस्तृत लिखित शिकायत अवश्य दर्ज करानी चाहिए। शिकायत के साथ, बैंक स्टेटमेंट, लेनदेन की सही तारीख और राशि, संदिग्ध मोबाइल नंबर, कॉल रिकॉर्ड, मैसेज और अन्य सभी डिजिटल साक्ष्य उपलब्ध कराना पुलिस को जांच में सहायता करेगा और कार्रवाई को गति देगा।
सावधानी ही सर्वोत्तम बचाव
साइबर ठगी से बचने का सबसे प्रभावी तरीका सावधानी बरतना है। अपने बैंक खातों में नियमित रूप से लेनदेन की जांच करें और किसी भी अनधिकृत ट्रांजैक्शन को जरा भी नजरअंदाज न करें। अपने मोबाइल फोन में किसी भी अनजान या संदिग्ध ऐप को इंस्टॉल करने से बचें। अपनी बैंकिंग संबंधी कोई भी संवेदनशील जानकारी, जैसे कि पासवर्ड, पिन, ओटीपी या सीवीवी किसी के साथ भी साझा न करें, चाहे वह किसी भी माध्यम से कॉल करे या मैसेज भेजे। किसी भी संदिग्ध कॉल या संदेश पर गोपनीय वित्तीय जानकारी देने से हमेशा बचें।
साइबर ठगी के बाद आने वाली धमकियों से डरकर शिकायत वापस लेना समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि यह अपराधियों को प्रोत्साहित करता है। त्वरित सूचना, बैंक को तत्काल जानकारी देना और पुलिस में प्रभावी शिकायत दर्ज कराना ही ऐसे मामलों में पीड़ित की सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है।
