सहकारिता विभाग में पदोन्नति परीक्षा पर उठे सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग
मध्य प्रदेश के सहकारिता विभाग में पदोन्नति परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक और गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। कर्मचारी संघर्ष मोर्चा ने निष्पक्ष जांच की मांग की है।

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 28 जुलाई 2026
मध्य प्रदेश के सहकारिता विभाग में हाल ही में संपन्न हुई विभागीय पदोन्नति परीक्षा को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। कर्मचारी संघर्ष मोर्चा ने विभाग के प्रमुख सचिव को एक ज्ञापन सौंपकर आरोप लगाया है कि परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हुआ, गोपनीय प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई और नियम विरुद्ध तरीके से पदोन्नति दी गई। संगठन ने इस पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की है, अन्यथा इसे प्रदेश के बहुचर्चित व्यापमं घोटाले के समानांतर 'मिनी व्यापमं' करार देने की चेतावनी दी है।
मोर्चा के पदाधिकारियों का दावा है कि विभाग में 100 से अधिक बाबुओं को सहकारिता निरीक्षक के पद पर पदोन्नत करने के लिए आयोजित की गई इस परीक्षा में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। शिकायत के अनुसार, परीक्षा का प्रश्नपत्र एपेक्स बैंक में कार्यरत एक सहायक आयुक्त द्वारा तैयार करवाया गया था, जिसका स्तर आठवीं से दसवीं कक्षा के प्रश्नपत्र जैसा बताया गया है। यह अपने आप में परीक्षा की गुणवत्ता और उसके आयोजन की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है।
प्रश्नपत्र लीक और संदिग्ध अंक वितरण का आरोप
कर्मचारी संघर्ष मोर्चा ने अपने ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया है कि परीक्षा आयोजित होने से लगभग तीन से चार दिन पूर्व ही प्रश्नपत्र कुछ चुनिंदा परीक्षार्थियों तक पहुंच गया था। इसी का परिणाम है कि अधिकांश अभ्यर्थियों को इस परीक्षा में 100 में से 99 अंक प्राप्त हुए, जो किसी भी सामान्य परीक्षा प्रक्रिया में संभव नहीं लगता और सीधे तौर पर संदेह पैदा करता है। मोर्चा ने स्थापना शाखा के अधीक्षक की भूमिका पर भी संदेह जताया है और उन्हें पूरे प्रकरण का सूत्रधार बताया है।
गोपनीय प्रक्रिया की गहन जांच की मांग
संगठन ने मांग की है कि विभागीय पदोन्नति की पूरी गोपनीय प्रक्रिया की गहराई से जांच की जाए। इसके लिए परीक्षा से जुड़े सभी गोपनीय अभिलेखों, परीक्षार्थियों के वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (सीआर) और अन्य संबंधित दस्तावेजों की जांच सीसीटीवी फुटेज के आधार पर करने का सुझाव दिया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कहीं भी रिकॉर्ड में किसी प्रकार की छेड़छाड़ या फेरबदल न किया गया हो, जिससे अनियमितताओं को छुपाया जा सके।
इस मांग के पीछे का मुख्य कारण यह है कि कर्मचारी संघर्ष मोर्चा को संदेह है कि पदोन्नति सूची तैयार करने में कदाचार हुआ है। आरोप है कि जिन कर्मचारियों को पदोन्नत किया गया है, वे संभवतः निर्धारित योग्यता या प्रक्रिया का पालन नहीं करते थे। इसलिए, वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (सीआर) जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि क्या प्रदर्शन और रिकॉर्ड के आधार पर ही चयन हुआ है, या फिर इसमें बाहरी हस्तक्षेप शामिल है। सीसीटीवी फुटेज की मांग इसलिए की गई है ताकि यह सत्यापित किया जा सके कि रिकॉर्ड को सार्वजनिक रूप से या गुप्त रूप से एक्सेस करते समय कोई अनधिकृत गतिविधि तो नहीं हुई।
'मिनी व्यापमं' की चेतावनी और पारदर्शिता पर सवाल
कर्मचारी संघर्ष मोर्चा का कहना है कि यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला प्रदेश के इतिहास में एक बड़े घोटाले, व्यापमं की तर्ज पर 'मिनी व्यापमं' का रूप ले सकता है। ऐसे में न केवल सहकारिता विभाग की पदोन्नति प्रक्रिया की विश्वसनीयता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी, बल्कि विभाग के कर्मचारियों का व्यवस्था पर से भरोसा भी उठ जाएगा। संगठन ने जोर देकर कहा है कि इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या उच्चस्तरीय समिति द्वारा ही कराई जानी चाहिए, ताकि सत्य सामने आ सके और दोषियों को सजा मिले।
यह चेतावनी इस बात को रेखांकित करती है कि कर्मचारी वर्ग अब इस तरह की अनियमितताओं को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। व्यापमं घोटाला, जिसने मध्य प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था, आज भी कई लोगों की स्मृति में ताजा है। इसी पृष्ठभूमि में, सहकारिता विभाग में पदोन्नति परीक्षा को लेकर लगे आरोप 'मिनी व्यापमं' की आशंका को जन्म देते हैं। यदि जांच एजेंसियां आरोपों की सत्यता की पुष्टि करती हैं, तो यह न केवल विभाग की छवि को धूमिल करेगा, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र पर प्रश्नचिह्न लगाएगा।
इस पूरे मामले में विभागीय पारदर्शिता की कमी स्पष्ट रूप से झलकती है। जिस तरह से प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया, परीक्षा का स्तर और अंक वितरण को लेकर सवाल उठाए गए हैं, वे बताते हैं कि कहीं न कहीं सिस्टम में खामियां हैं। कर्मचारियों की मांग है कि भविष्य में ऐसी परीक्षाएं अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी हों, जिसमें किसी भी प्रकार की धांधली या पक्षपात की गुंजाइश न रहे। इसके लिए, कर्मचारी संघर्ष मोर्चा ने न केवल जांच की मांग की है, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सुधारात्मक उपायों की भी अपेक्षा की है।
फिलहाल, सहकारिता विभाग की ओर से इन गंभीर आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है। विभागीय प्रशासन का मौन इस मामले को और अधिक संवेदनशील बना रहा है। कर्मचारियों और आम जनता की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या विभाग इन आरोपों को गंभीरता से लेता है और कब तक निष्पक्ष जांच की कार्रवाई शुरू करता है। इस घटनाक्रम ने निश्चित रूप से सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली और उसकी पारदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
