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रीढ़ की नलिका में रक्त जमाव: दुर्लभ लेकिन जानलेवा स्पाइनल हेमेटोमा से ऐसे रहें सतर्क

एंटीकोआगुलेंट लेने वालों में अचानक तेज पीठ दर्द, सुन्नपन या कमजोरी स्पाइनल हेमेटोमा का संकेत हो सकती है। समय पर पहचान और उपचार न्यूरोलॉजिकल क्षति...

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रीढ़ की नलिका में रक्त जमाव: दुर्लभ लेकिन जानलेवा स्पाइनल हेमेटोमा से ऐसे रहें सतर्क

द क्लिफ न्यूज़ | 31 अगस्त 2026

रीढ़ की नलिका के भीतर रक्त का असामान्य रूप से जमाव, जिसे स्पाइनल हेमेटोमा कहा जाता है, एक दुर्लभ किंतु गंभीर न्यूरोलॉजिकल आपातस्थिति है। विशेष रूप से रक्त पतला करने वाली दवाएं (एंटीकोआगुलेंट या एंटीप्लेटलेट) लेने वाले मरीजों में अचानक तेज पीठ दर्द के साथ न्यूरोलॉजिकल लक्षणों जैसे कमजोरी, सुन्नपन या पेशाब-पाखाने पर नियंत्रण खोना स्पाइनल हेमेटोमा की आशंका को प्रबल करता है। यदि इस स्थिति का समय पर निदान और उपचार न हो, तो यह रीढ़ की हड्डी या नसों पर दबाव डालकर स्थायी न्यूरोलॉजिकल क्षति, यहां तक कि पैराप्लेजिया (लकवा) का कारण बन सकती है।

स्पाइनल हेमेटोमा किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है, हालांकि इसके कारणों और जोखिम कारकों में आयु के अनुसार भिन्नता देखी जाती है। बच्चों में यह जन्मजात रक्तस्राव संबंधी विकार (जैसे हीमोफीलिया), प्लेटलेट्स की कमी, ल्यूकेमिया, चोट या रक्त वाहिकाओं की जन्मजात विकृतियों से जुड़ा हो सकता है। युवा वयस्कों में चोट, रीढ़ की सर्जरी, रक्त वाहिका संबंधी विकृतियां और एंटीकोआगुलेंट या एंटीप्लेटलेट दवाओं का सेवन प्रमुख कारण हो सकते हैं। मध्य आयु वर्ग के लोगों में, इन दवाओं के अलावा गुर्दे या यकृत की खराबी, उच्च रक्तचाप, चोट और रीढ़ की हड्डी में इंजेक्शन जैसी प्रक्रियाएं जोखिम बढ़ाती हैं। बुजुर्गों में, उम्र के साथ रक्तस्राव का बढ़ता जोखिम, कई दवाओं का सेवन, गुर्दे की कार्यक्षमता में कमी और गिरने जैसी घटनाएं स्थिति को और गंभीर बना सकती हैं। अध्ययनों के अनुसार, लिंग की तुलना में दवाओं का सेवन, रक्तस्राव संबंधी विकार, चोट और अन्य चिकित्सीय स्थितियां अधिक महत्वपूर्ण जोखिम कारक हैं।

दवाओं का पूरा इतिहास है महत्वपूर्ण

चिकित्सकों के लिए मरीजों द्वारा ली जा रही दवाओं का विस्तृत इतिहास जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें प्रत्यक्ष मौखिक एंटीकोआगुलेंट (DOACs) जैसे वॉर्फरिन, एपिक्सैबन, रिवरोक्सैबन, डैबिगैट्रान और एडोक्सैबन के साथ-साथ अनफ्रैक्शनेटेड हेपरिन और एनोक्सापारिन जैसी हेपरिन दवाओं के उपयोग की जानकारी शामिल होनी चाहिए। एस्पिरिन, क्लोपिडोग्रेल या इन दोनों तरह की दवाओं (एंटीकोआगुलेंट और एंटीप्लेटलेट) के संयोजन का सेवन भी चिकित्सक को बताना आवश्यक है। हाल के एक व्यवस्थित समीक्षा में DOACs से जुड़े स्पाइनल एपिड्यूरल हेमेटोमा के मामलों में गर्दन या पीठ में अचानक तेज दर्द के बाद तेजी से बिगड़ने वाले न्यूरोलॉजिकल लक्षणों का उल्लेख किया गया है, जो इस बात पर जोर देता है कि इन दवाओं का सेवन करने वालों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

लक्षणों की पहचान और तत्काल प्रतिक्रिया

स्पाइनल हेमेटोमा का क्लिनिकल क्रम आमतौर पर अचानक तेज पीठ दर्द के साथ शुरू होता है। इसके बाद रेडिकुलर दर्द (तंत्रिका मार्ग में दर्द), संवेदना में बदलाव और पैरों में कमजोरी जैसी समस्याएं उभर सकती हैं। गंभीर मामलों में, मरीज चलने में पूरी तरह असमर्थ हो सकता है, पैराप्लेजिया विकसित हो सकता है, और मूत्राशय या आंत के नियंत्रण में गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये न्यूरोलॉजिकल स्थितियां मिनटों से लेकर घंटों के भीतर तेजी से बिगड़ सकती हैं। इसलिए, ऐसे लक्षणों को सामान्य कमर दर्द, डिस्क की समस्या या उम्र से संबंधित स्पाइनल स्टेनोसिस समझकर घर पर इंतजार करना बेहद जोखिम भरा हो सकता है।

निदान और उपचार की रणनीतियां

स्पाइनल हेमेटोमा के निदान में स्पाइनल एमआरआई (MRI) सबसे महत्वपूर्ण जांच है। एमआरआई हेमेटोमा के स्थान, उसके विस्तार और रीढ़ की हड्डी पर पड़ने वाले दबाव का सटीक आकलन करने में मदद करता है। इसके साथ ही, रक्त की सामान्य जांच (CBC) और प्लेटलेट काउंट, रक्त का थक्का जमने के समय की जांच (PT/INR, APTT) और गुर्दे तथा यकृत की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन भी किया जाता है। मरीज द्वारा ली जा रही एंटीकोआगुलेंट दवा का प्रकार और उसकी अंतिम खुराक का समय उपचार संबंधी निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उपचार के प्रथम चरण में, मरीज द्वारा ली जा रही संबंधित एंटीकोआगुलेंट दवा को चिकित्सकीय निगरानी में रोका जाता है। तत्काल न्यूरोसर्जिकल या स्पाइन विशेषज्ञ की राय लेना आवश्यक है। यदि रक्तस्राव गंभीर हो, तो दवा के प्रकार के आधार पर उसके प्रभाव को उलटने की रणनीतियां अपनाई जाती हैं। उदाहरण के लिए, वॉर्फरिन से जुड़े गंभीर रक्तस्राव में विटामिन K और 4-factor PCC (प्रोथ्रोम्बिन कॉम्प्लेक्स कॉन्सेंट्रेट) का उपयोग किया जा सकता है। डैबिगैट्रान के लिए इदारुसिज़ुमैब और कुछ Factor-Xa inhibitors के लिए एंडेक्सनेट अल्फा या PCC (स्थानीय प्रोटोकॉल के अनुसार) पर विचार किया जा सकता है। हेपरिन के प्रभाव को कम करने के लिए प्रोटामिन का उपयोग भी परिस्थितिजन्य होता है।

सर्जिकल हस्तक्षेप और बेहतर परिणाम

यदि हेमेटोमा के कारण रीढ़ की हड्डी पर गंभीर दबाव पड़ रहा हो या न्यूरोलॉजिकल स्थिति तेजी से बिगड़ रही हो, तो तत्काल सर्जिकल डीकंप्रेसन (दबाव हटाना) और हेमेटोमा (रक्त जमाव) की निकासी की आवश्यकता होती है। हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि हर मरीज के लिए उपचार समान नहीं होता। कुछ चुनिंदा मामलों में, जहां न्यूरोलॉजिकल लक्षण हल्के हों, विशेषज्ञ चिकित्सक की कड़ी निगरानी में गैर-सर्जिकल उपचार पर भी विचार किया जा सकता है। उपलब्ध अध्ययनों ने इस बात की पुष्टि की है कि स्पाइनल हेमेटोमा की शीघ्र पहचान और समय पर हस्तक्षेप से मरीजों के न्यूरोलॉजिकल परिणाम बेहतर होते हैं।

संक्षेप में, सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक संदेश यह है कि जो व्यक्ति एंटीकोआगुलेंट या एंटीप्लेटलेट दवाएं ले रहे हैं, उनमें यदि अचानक तेज पीठ दर्द के साथ नया सुन्नपन, कमजोरी, चलने में परेशानी या मूत्राशय/आंत के नियंत्रण में समस्या उत्पन्न हो, तो इसे स्पाइनल हेमेटोमा जैसी संभावित आपातस्थिति मानना चाहिए। ऐसे मरीज को तत्काल अस्पताल ले जाना चाहिए। इस स्थिति में, समय केवल उपचार का एक तत्व नहीं रह जाता, बल्कि यह मरीज के दीर्घकालिक न्यूरोलॉजिकल परिणाम तय करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक बन जाता है।