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रीढ़ का संक्रमण: ट्यूमर जैसा दिख सकता है, बुजुर्गों में पीठ दर्द को न करें नजरअंदाज

रीढ़ की हड्डी का संक्रमण कई बार इमेजिंग में ट्यूमर जैसा दिख सकता है, जिससे निदान चुनौतीपूर्ण हो जाता है। देर से पहचान गंभीर न्यूरोलॉजिकल जटिलताओं का कारण बन सकती है।

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रीढ़ का संक्रमण: ट्यूमर जैसा दिख सकता है, बुजुर्गों में पीठ दर्द को न करें नजरअंदाज

द क्लिफ न्यूज़ | 5 सितंबर 2026

रीढ़ की हड्डी में होने वाला संक्रमण, खासकर जब यह कशेरुकाओं (vertebrae) को नुकसान पहुंचाता है, ढहने का कारण बनता है, और आसपास के ऊतकों में द्रव्यमान (mass) बना लेता है, तो यह कई बार इमेजिंग तकनीकों में रीढ़ के ट्यूमर या कैंसर के मेटास्टेसिस (metastasis) के समान दिखाई दे सकता है। इस स्थिति में, संक्रमण और ट्यूमर के बीच अंतर करना स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। दोनों ही स्थितियों में रात में बढ़ने वाला दर्द और तंत्रिका संबंधी लक्षण (neurological symptoms) दिखाई दे सकते हैं, जिससे केवल इमेजिंग के आधार पर कैंसर का निष्कर्ष निकालना अनुचित हो जाता है।

अलग-अलग आयु समूहों में रीढ़ के संक्रमण के प्रमुख कारणों में भिन्नता देखी जाती है। बच्चों में, पायोजेनिक स्पोंडाइलोडिसाइटिस (pyogenic spondylodicitis), स्पाइनल टीबी (spinal TB) और ब्रुसेलोसिस (brucellosis) प्रमुख जिम्मेदारियां हैं। कभी-कभी फंगल संक्रमण भी एक कारण हो सकता है। हालांकि बच्चों में बुखार हमेशा मौजूद नहीं होता, लेकिन चिड़चिड़ापन, चलने से इनकार, पीठ दर्द, लंगड़ाकर चलना और रीढ़ की गतिविधियों में कमी जैसे संकेत गंभीर समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं। युवा वयस्कों में, पायोजेनिक संक्रमण, टीबी स्पाइन (पॉट डिजीज) और ब्रुसेलोसिस पर ध्यान देना आवश्यक है। इन आयु समूहों में एपिड्यूरल एब्सेस (epidural abscess) का जोखिम भी बना रहता है। लगातार पीठ दर्द, बढ़ा हुआ ESR या CRP (सूजन मार्कर) और तंत्रिका संबंधी लक्षण बीमारी के सूचक हो सकते हैं।

बुजुर्गों में विशेष ध्यान की आवश्यकता

40 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्तियों में, पायोजेनिक स्पोंडाइलोडिसाइटिस, टीबी, एपिड्यूरल एब्सेस और सर्जरी के बाद होने वाले संक्रमण को महत्वपूर्ण कारणों में गिना जाता है। विशेष रूप से डायबिटीज या कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले व्यक्तियों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है। बुजुर्गों में वर्टेब्रल ऑस्टियोमाइलाइटिस (vertebral osteomyelitis), डिस्काइटिस (discitis) और एपिड्यूरल एब्सेस प्रमुख संभावनाएं हैं। इस आयु वर्ग में, लगातार बढ़ता हुआ पीठ दर्द या कमजोरी भी संक्रमण का संकेत हो सकती है, और बुखार का न होना संक्रमण को खारिज नहीं करता।

संक्रमण और ट्यूमर दोनों ही कशेरुकाओं को कमजोर कर उन्हें नष्ट कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप कशेरुकाएं ढह सकती हैं और उनके आसपास या एपिड्यूरल स्पेस में सॉफ्ट-टिश्यू मास या कलेक्शन बन सकता है। यह स्पाइनल कैनाल के संकुचन का कारण बन सकता है, जिससे नसों या स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव पड़ता है। नतीजतन, गंभीर दर्द, कमजोरी, सुन्नपन और अन्य तंत्रिका संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जो मरीज के जीवन की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करती हैं।

संक्रमण के संकेत और जोखिम कारक

बुखार, कंपकंपी, तेजी से बढ़ने वाला दर्द, ESR या CRP का बढ़ना और कभी-कभी श्वेत रक्त कोशिकाओं (WBC) की संख्या में वृद्धि संक्रमण की ओर संकेत कर सकते हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि WBC की संख्या सामान्य भी रह सकती है। डायबिटीज, इम्यूनोसप्रेशन (immunosuppression), हाल की सर्जरी या कोई अन्य मेडिकल प्रोसीजर, बैक्टेरेमिया (bacteremia), मूत्र पथ संक्रमण (UTI), त्वचा या दांतों का संक्रमण जैसे कारक संक्रमण के महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करते हैं। पैरावर्टेब्रल (paravertebral) या एपिड्यूरल एब्सेस का पाया जाना संक्रमण की संभावना को गंभीरता से देखने के लिए पर्याप्त है।

भारत में टीबी स्पाइन की महत्ता

भारत जैसे देश में, स्पाइनल टीबी (जिसे पॉट डिजीज भी कहते हैं) पर विशेष ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। यह बीमारी धीरे-धीरे विकसित होती है और अक्सर वजन कम होना, रात में पसीना आना, रात का दर्द और कशेरुकाओं का विनाश जैसे लक्षण प्रस्तुत करती है, जो कैंसर जैसा चित्र बना सकते हैं। इसलिए, वजन कम होना और वर्टेब्रल डैमेज का अर्थ हमेशा कैंसर नहीं होता। टीबी और अन्य संक्रमणों की संभावना को भी जांच के दायरे में लाना अनिवार्य है।

निदान और इमेजिंग तकनीकें

कंट्रास्ट के साथ एमआरआई (MRI) स्पाइन संक्रमण के आकलन में एक महत्वपूर्ण जांच साबित होती है। यह डिस्काइटिस, ऑस्टियोमाइलाइटिस, एपिड्यूरल एब्सेस, पैरावर्टेब्रल कलेक्शन और तंत्रिका संपीड़न (nerve compression) का पता लगाने में सहायक है। जांच के दौरान सीबीसी (CBC), ईएसआर (ESR), सीआरपी (CRP) और किडनी व लिवर फंक्शन टेस्ट किए जा सकते हैं। यदि संभव हो, तो एंटीबायोटिक उपचार शुरू करने से पहले रक्त के दो सेट कल्चर (blood culture) लिए जाते हैं। टीबी के संदेह की स्थिति में, उपयुक्त माइक्रोबायोलॉजिकल जांच जैसे NAAT/CBNAAT या Xpert, तथा आवश्यकता पड़ने पर ऊतक या एस्पिरेट (aspirate) की हिस्टोपैथोलॉजी (histopathology) और कल्चर भी अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं।

तत्काल चिकित्सा मूल्यांकन की आवश्यकता

यदि इमेजिंग में कशेरुका का विनाशकारी घाव (destructive lesion) या एपिड्यूरल मास दिखाई देता है और निदान स्पष्ट नहीं है, तो संक्रमण और ट्यूमर दोनों की संभावना पर विचार करना चाहिए। कई मामलों में, लंबे समय तक एंटीमाइक्रोबियल उपचार या निश्चित कैंसर उपचार शुरू करने से पहले ऊतक निदान (tissue diagnosis) और कल्चर प्राप्त करना आवश्यक हो सकता है। नई कमजोरी, सैडल एनेस्थीसिया (saddle anesthesia), पेशाब का रुकना या असंयम (incontinence), तथा तेजी से बढ़ती तंत्रिका संबंधी कमी एक स्पाइनल इमरजेंसी (spinal emergency) का संकेत हो सकती है। ऐसे मरीजों में तत्काल एमआरआई (MRI) और स्पाइन या न्यूरोसर्जिकल विशेषज्ञ का मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है। स्थिति की गंभीरता के अनुसार, एंटीमाइक्रोबियल उपचार और सर्जिकल ड्रेनेज (surgical drainage) या डीकंप्रेशन (decompression) की तत्काल आवश्यकता पड़ सकती है।

गंभीर पीठ दर्द और कशेरुका के घाव जो स्पष्ट रूप से 'घातक' दिखते हों, ऐसे मरीजों में एक महत्वपूर्ण सवाल स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा पूछा जाना चाहिए: "क्या यह संक्रमण हो सकता है?" इसी तरह, संदिग्ध टीबी या अन्य संक्रमण के अपेक्षित उपचार से मरीज को सुधार न होने की स्थिति में, ट्यूमर की संभावना पर दोबारा विचार करके उचित ऊतक निदान कराना महत्वपूर्ण है। समय पर सही पहचान गंभीर न्यूरोलॉजिकल जटिलताओं से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, जिससे मरीज को बेहतर स्वास्थ्य परिणाम प्राप्त हो सकें।