रेशम कीट पालन से ज्योतिबाई आत्मनिर्भर, एक एकड़ खेती से पाई शानदार आय
नर्मदापुरम की ज्योतिबाई ने शासकीय सहयोग से रेशम उत्पादन कर एक लाख से अधिक की आय अर्जित की है। वे अब ग्रामीण महिलाओं के लिए...

द क्लिफ न्यूज़ डेस्क | संवाददाता: मुकेश भदौरिया
द क्लिफ न्यूज़ | नर्मदापुरम | 25 सितंबर 2026
नर्मदापुरम जिले के ग्राम पलियापिपरिया की निवासी ज्योतिबाई ने रेशम कीट पालन और शहतूत की खेती को अपनाकर न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की एक नई मिसाल कायम की है। आदिवासी समुदाय से आने वाली ज्योतिबाई ने अपने गांव में ही रहकर स्वावलंबन की राह चुनी। यह कार्य स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार को बढ़ावा देने की सरकारी योजनाओं की सफलता को दर्शाता है, जो ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
उनकी इस सफल यात्रा की शुरुआत वर्ष 2010-11 में हुई, जब स्वावलंबन योजना के अंतर्गत उन्हें शासकीय रेशम केंद्र पलियापिपरिया से एक एकड़ भूमि पर शहतूत के पौधे लगाने का अवसर प्राप्त हुआ। इस दौरान, रेशम विभाग ने उन्हें निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन और उन्नत किस्म के बीज प्रदान किए। विभाग से मिले प्रोत्साहन और आधुनिक तकनीकों के सफल उपयोग से ककून उत्पादन की गुणवत्ता में लगातार सुधार हुआ। यह प्रारंभिक चरण, सरकारी सहायता और लाभार्थी के समर्पण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसने भविष्य की सफलता की नींव रखी।
एक एकड़ भूमि पर शहतूत उगाकर की शानदार आय
ज्योतिबाई ने अपनी लगन और मेहनत के बल पर वर्तमान में अपनी एक एकड़ शहतूत की खेती और रेशम कीट पालन से कुल 1,72,872 रुपये की आय अर्जित करने में सफलता पाई है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि सीमित भूमि पर भी सघन कृषि और संबद्ध गतिविधियों से अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने अपने उत्पादित ककून को बाजार में बेचकर अच्छे दाम प्राप्त किए, जो गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और बाजार प्रबंधन का परिणाम है। यह आय उनके परिवार के लिए आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनी है, जिसने उनके जीवन स्तर में सुधार किया है।
शहतूत की खेती रेशम कीट पालन का आधार है, और ज्योतिबाई ने इस पहलू पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने उन्नत किस्म के शहतूत के पौधों का चयन किया, जिनकी पत्तियां रेशम कीटों के लिए पौष्टिक होती हैं। समय पर सिंचाई, उर्वरक प्रबंधन और खरपतवार नियंत्रण जैसी कृषि पद्धतियों को अपनाकर उन्होंने शहतूत की पैदावार को बढ़ाया। इसके साथ ही, उन्होंने रेशम कीट पालन की आधुनिक विधियों को भी अपनाया, जिसमें कीटों के स्वास्थ्य की देखभाल, सही तापमान और आर्द्रता बनाए रखना शामिल है। यह एकीकृत दृष्टिकोण उन्हें उच्च गुणवत्ता वाले ककून का उत्पादन करने में मदद करता है।
ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत
ज्योतिबाई का मानना है कि रेशम पालन ने उन्हें केवल आर्थिक मजबूती ही प्रदान नहीं की, बल्कि अपने ही गांव में एक सम्मानजनक स्वरोजगार का अवसर भी दिया है। वे आज अन्य ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वावलंबन का प्रतीक बन चुकी हैं। उनकी सफलता की कहानी दूसरों को भी प्रेरित कर रही है कि वे भी अपनी उपलब्ध भूमि और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर आत्मनिर्भर बन सकती हैं। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे शुरुआत में कुछ कठिनाइयां आईं, लेकिन दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास से उन्होंने इन पर काबू पाया।
सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और व्यक्तिगत दृढ़ संकल्प के मेल से एक सामान्य ग्रामीण महिला ने किस प्रकार अपनी और अपने परिवार की तकदीर बदली है, यह उनकी सफलता की कहानी इसका जीता-जागता प्रमाण है। रेशम विभाग ने भी भविष्य में ऐसे प्रयासों को निरंतर प्रोत्साहित करने की बात कही है। विभाग द्वारा संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रम और वित्तीय सहायता योजनाएं ज्योतिबाई जैसी महिलाओं को और अधिक सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। ग्राम पलियापिपरिया अब उन क्षेत्रों में गिना जाने लगा है जहां महिलाएं आर्थिक रूप से सक्रिय होकर समाज में योगदान दे रही हैं।
