रायसेन: 325 स्कूलों के प्रस्ताव पर सिर्फ 9 को बजट, बच्चे पेड़ के नीचे पढ़ने को मजबूर
रायसेन जिले में सरकारी स्कूलों की बदहाली शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रही है। 325 स्कूलों के भवन मरम्मत या निर्माण के प्रस्तावों पर शासन से केवल 9 को बजट मिला है, जबकि कई स्कूल भवनहीन हैं या जर्जर हालत में हैं।

द क्लिफ न्यूज़ | रायसेन | 9 अगस्त 2026
रायसेन जिले में सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति शिक्षा के अधिकार के दावों की सच्चाई को उजागर कर रही है। बारिश के मौसम ने व्यवस्था की पोल खोल दी है, जहां कई स्कूलों के जर्जर भवनों से पानी टपक रहा है, पर्याप्त कमरे नहीं हैं और कुछ स्कूल तो भवनविहीन होने के कारण खुले आसमान के नीचे या वैकल्पिक स्थानों पर संचालित हो रहे हैं। जिला शिक्षा केंद्र द्वारा 325 स्कूलों के भवनों की मरम्मत या नए निर्माण के लिए भेजे गए प्रस्तावों में से शासन द्वारा केवल 9 स्कूलों के लिए बजट स्वीकृत किया गया है। इस स्थिति का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके स्कूलों के छात्र-छात्राएं भी पेड़ों के नीचे या खुले मैदान में पढ़ने को मजबूर हैं।
जिले में सरकारी स्कूलों की अव्यवस्था का आलम यह है कि 51 से अधिक स्कूल भवन जर्जर हो चुके हैं, जबकि 25 से ज्यादा ऐसे स्कूल हैं जिनके पास अपना भवन तक नहीं है। बारिश के दिनों में यह समस्या और विकट हो जाती है, जब छतों से पानी टपकने लगता है। ऐसी स्थिति में बच्चों को या तो कक्षाओं से बाहर निकालना पड़ता है या फिर उनकी छुट्टी करनी पड़ती है, जिससे उनकी पढ़ाई बाधित होती है। इसके अतिरिक्त, कमरों की भारी कमी के चलते कई विद्यालयों में छात्रों को खुले मैदान, पेड़ों के नीचे या बरामदों में बिठाकर पढ़ाया जा रहा है। यह न केवल शैक्षणिक गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं भी उत्पन्न कर रहा है।
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिक्षक के स्कूल में दो कमरों में 102 बच्चे
सालेगढ़ का प्राथमिक स्कूल, जो कभी अपने नवाचारों और उत्कृष्ट शैक्षणिक गतिविधियों के लिए जिले में एक मॉडल स्कूल के रूप में जाना जाता था, आज स्वयं बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। वर्ष 2020 में भारत सरकार के इस्पात मंत्रालय द्वारा इस स्कूल पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई गई थी। यहां पदस्थ शिक्षक, नीरज सक्सेना, जिन्हें वर्ष 2022 में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, के सामने भी अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। स्कूल में छात्रों के लिए केवल दो छोटे कमरे हैं, जिनकी कुल क्षमता लगभग 40 बच्चों की है। जबकि स्कूल में वर्तमान में 102 विद्यार्थी नामांकित हैं। इस भारी अंतर के कारण, सामान्य दिनों में भी कई बच्चों को खुले मैदान या पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ना पड़ता है। बारिश के मौसम में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। शिक्षक नीरज सक्सेना ने बताया कि यदि स्कूल को केवल दो अतिरिक्त कक्ष मिल जाएं, तो बच्चों को बेहतर और सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण मिल सकता है। उन्होंने इस संबंध में कई बार मांगें उठाई हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है।
चार साल से जर्जर स्कूल, दालान में लग रही कक्षाएं
जन शिक्षा केंद्र ईंटखेड़ी के अंतर्गत आने वाला उमरई टोला का प्राथमिक स्कूल भी सरकारी स्कूलों की बदहाली का एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। स्कूल का भवन पिछले लगभग चार वर्षों से जर्जर अवस्था में है। भवन की स्थिति इतनी खराब है कि इसमें बच्चों को बिठाकर पढ़ाना जोखिम भरा माना जा रहा है। स्कूल के शिक्षक, तरण जाटव, को हर साल छात्रों के लिए वैकल्पिक स्थान खोजने की चुनौती का सामना करना पड़ता है। वर्तमान में, स्कूल की कक्षाएं गांव के अतीक खां के पुराने मकान की दालान में संचालित हो रही हैं, जहां लगभग 24 बच्चे पढ़ रहे हैं। शिक्षक के अनुसार, नए स्कूल भवन के निर्माण के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को कई बार आवेदन भेजे गए हैं, लेकिन अभी तक बजट स्वीकृत नहीं हुआ है। बारिश के दिनों में दालान में पढ़ाने में भी कई तरह की असुविधाएं उत्पन्न होती हैं, जो सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को बाधित करती हैं।
325 प्रस्तावों पर मात्र 9 की स्वीकृति, चिंताजनक स्थिति
जिले के सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से जिला शिक्षा केंद्र ने 325 स्कूल भवनों के मरम्मत या नए निर्माण के लिए विस्तृत प्रस्ताव भेजे थे। इन प्रस्तावों में जर्जर भवनों की मरम्मत, अतिरिक्त कक्षों का निर्माण और भवनविहीन स्कूलों के लिए नए भवनों की आवश्यकताएं शामिल थीं। हालांकि, शासन स्तर से फिलहाल केवल 9 स्कूलों के लिए राशि स्वीकृत होने के कारण, बाकी विद्यालयों की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। यह स्थिति इस महत्वपूर्ण सवाल को जन्म देती है कि जिन स्कूलों के भवन लंबे समय से जर्जर हैं या जहां बच्चों के लिए पर्याप्त कमरे तक उपलब्ध नहीं हैं, वहां सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था कैसे सुनिश्चित की जा सकती है।
बारिश के मौसम ने स्कूलों की वास्तविक दुर्दशा को सबके सामने ला दिया है। कहीं छतों से पानी टपक रहा है, तो कहीं बच्चे पेड़ों के नीचे बैठने को मजबूर हैं। कुछ स्थानों पर तो ग्रामीण के मकान की दालान में कक्षाएं लगाई जा रही हैं। जिन बच्चों को सुरक्षित और बेहतर वातावरण में शिक्षा देने की जिम्मेदारी व्यवस्था की है, वे आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब जिले में सैकड़ों स्कूल भवनों की आवश्यकता और मरम्मत के प्रस्ताव तैयार हैं, तब उनमें से मात्र नौ स्कूलों को बजट मिलने से बाकी विद्यालयों की समस्याओं का समाधान कब होगा। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिक्षक के स्कूल की स्थिति, जहां 102 बच्चों के लिए केवल दो कमरे हैं, सरकारी स्कूलों में अधोसंरचना की वास्तविक तस्वीर को भयावह रूप से दर्शाती है।
ऐसे में, यह अत्यंत आवश्यक है कि जर्जर और भवनविहीन स्कूलों का प्राथमिकता के आधार पर आकलन किया जाए और उनके लिए अविलंब बजट उपलब्ध कराया जाए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि बच्चों की शिक्षा मौसम की मार या भवनों की कमी का शिकार न हो और उन्हें एक सुरक्षित व अनुकूल वातावरण में सीखने का अवसर प्राप्त हो सके।
