रामनाथ कोविंद को लेखक सुमित कुमार मिश्र ने भेंट की 'नवभारत का न्याय दर्शन'
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और लेखक सुमित कुमार मिश्र के बीच 'नवभारत का न्याय दर्शन' पुस्तक पर हुई चर्चा। मुलाकात में वकालत के दिनों की स्मृतियों से 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' तक कई महत्वपूर्ण विषयों पर विमर्श हुआ।

द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 2 सितंबर 2026
भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से एक आत्मीय मुलाकात के दौरान अधिवक्ता-लेखक सुमित कुमार मिश्र ने अपनी नवप्रकाशित पुस्तक ‘नवभारत का न्याय दर्शन’ उन्हें भेंट की। यह भेंटवार्ता न्याय, संविधान और विधि के शासन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित रही, जो पूर्व राष्ट्रपति के सार्वजनिक जीवन से भी गहराई से जुड़े हुए हैं। रामनाथ कोविंद का सार्वजनिक जीवन कानून और न्याय के क्षेत्र से शुरू होकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचा, जो इस मुलाकात को विशेष बनाता है।
मुलाकात के दौरान रामनाथ कोविंद ने अपने वकालत के दिनों की अनेक स्मृतियां साझा कीं। उन्होंने दिल्ली में अपने अधिवक्ता जीवन, दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में किए गए कार्य तथा उस दौर के अपने कानूनी अनुभवों का उल्लेख किया। उनके आधिकारिक जीवनवृत्त के अनुसार, कोविंद ने वर्ष 1971 में दिल्ली बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में अपना नामांकन कराया था। इसके उपरांत, वर्ष 1977 से 1979 तक वे दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार के अधिवक्ता के पद पर कार्यरत रहे। वर्ष 1978 में वे सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड बने और 1980 से 1993 तक सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के स्थायी अधिवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
वकालत से राष्ट्रपति भवन तक की यात्रा
रामनाथ कोविंद की वकालत से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत कर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद, राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने की यात्रा, मुलाकात का एक महत्वपूर्ण विषय रही। एक अधिवक्ता के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन का शुभारंभ करने वाले कोविंद ने आगे चलकर राज्यसभा सदस्य, बिहार के राज्यपाल जैसे गरिमापूर्ण पदों को सुशोभित किया और अंततः भारत के 14वें राष्ट्रपति बने। उन्होंने 25 जुलाई 2017 को राष्ट्रपति पद की शपथ ली और 25 जुलाई 2022 तक इस सर्वोच्च संवैधानिक दायित्व का निर्वहन किया। उनकी इस सार्वजनिक यात्रा को कानून, संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उनके लंबे और गहरे अनुभव के परिचायक के रूप में देखा जाता है।
बिहार से जुड़ी पुरानी स्मृतियां और पुनौराधाम
इस मुलाकात के दौरान रामनाथ कोविंद से जुड़ी बिहार की कुछ पुरानी स्मृतियां भी ताज़ा हुईं। यह ज्ञात है कि जब रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल थे, उस दौरान सुमित कुमार मिश्र की प्रभात झा के साथ उनसे मुलाकातें होती रही थीं। इस संदर्भ में, बातचीत में पुनौराधाम में मां सीता मंदिर निर्माण से जुड़ी पुरानी गतिविधियों और उस दौर की स्मृतियों का भी उल्लेख हुआ। लेखक मिश्र ने प्रभात झा के साथ मिलकर इस विषय को लेकर किए गए प्रयासों तथा कोविंद के मिले सहयोग से जुड़ी बातों को भी याद किया। वर्तमान में पुनौराधाम में मंदिर निर्माण की प्रक्रिया का आगे बढ़ना, उस पुराने संकल्प की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर विमर्श
मुलाकात के दौरान ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के महत्वपूर्ण और सामयिक मुद्दे पर भी विस्तार से चर्चा हुई। यह सर्वविदित है कि संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की संभावनाओं पर विचार करने तथा इस संबंध में सिफारिशें देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता स्वयं रामनाथ कोविंद ने की थी। इस संवेदनशील विषय को लेकर उनके अनुभव और समिति के कार्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर भी दोनों के मध्य गहन बातचीत हुई।
'नवभारत का न्याय दर्शन' का केंद्रीय भाव
लेखक सुमित कुमार मिश्र की पुस्तक ‘नवभारत का न्याय दर्शन’ भारतीय न्याय-व्यवस्था को केवल अदालतों और कानूनी धाराओं तक सीमित रखने के बजाय, उसे भारतीय समाज, संविधान, शासन और राष्ट्र-निर्माण के व्यापक संदर्भ में देखने का एक अभिनव प्रयास करती है। पुस्तक में भारतीय न्याय-परंपरा, संवैधानिक मूल्यों, नागरिक अधिकारों एवं कर्तव्यों, विधि के शासन की महत्ता तथा आम नागरिक तक न्याय की सुलभ पहुंच जैसे मूलभूत विषयों को प्रमुखता से शामिल किया गया है।
पुस्तक और पूर्व राष्ट्रपति के जीवन में वैचारिक साम्य
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पुस्तक भेंट किए जाने का अवसर इसलिए भी विशेष महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि पुस्तक का केंद्रीय विषय और कोविंद का सार्वजनिक जीवन, दोनों ही न्याय, संविधान और विधि के शासन की अवधारणाओं से गहराई से जुड़े हुए हैं। एक ओर, अधिवक्ता के रूप में कोविंद का कानून की बारीकियों से जुड़ा अनुभव और दूसरी ओर, राष्ट्रपति के रूप में संविधान की मर्यादाओं का निर्वहन और संवैधानिक दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन, उनकी यात्रा भारतीय लोकतंत्र में कानून और संविधान की केंद्रीय भूमिका को सशक्त रूप से रेखांकित करती है।
यह उल्लेखनीय है कि वकालत के क्षेत्र से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत कर राष्ट्रपति भवन तक की रामनाथ कोविंद की यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि की कहानी नहीं है, बल्कि यह कानून, संविधान और सार्वजनिक जीवन के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता की एक प्रेरक यात्रा भी है। इसी पृष्ठभूमि में ‘नवभारत का न्याय दर्शन’ जैसी गंभीर और प्रासंगिक पुस्तक का उनके हाथों में भेंट किया जाना, इस मुलाकात को और भी विशेष तथा स्मरणीय बना गया।
