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राहुल गांधी के सनातन पर बयान पर शंकराचार्य की तीखी प्रतिक्रिया

जगद्गुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने राहुल गांधी के मनुस्मृति और सनातन धर्म पर दिए बयानों को अज्ञानतापूर्ण और दुर्भावनापूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि धर्मग्रंथों...

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राहुल गांधी के सनातन पर बयान पर शंकराचार्य की तीखी प्रतिक्रिया

द क्लिफ़ न्यूज़(लेखक- दीपक कुमार त्यागी) | 25 अगस्त 2026

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ‘1008’ ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति और सनातन सांस्कृतिक विचारों को लेकर दिए गए बयानों पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की ये टिप्पणियां उनकी कथित अज्ञानता, सतही समझ और सनातन परंपरा के प्रति दुर्भावनापूर्ण दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। शंकराचार्य ने राजनीतिक लाभ के लिए धर्मशास्त्रों के श्लोकों को उनके मूल संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करने को भारतीय सांस्कृतिक विरासत के साथ अन्याय बताया।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने एक बयान में कहा कि धर्मग्रंथों की व्याख्या करते समय उनके भाषायी, सामाजिक, दार्शनिक और शास्त्रीय संदर्भ को समझना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने राहुल गांधी से अपील की कि वे सनातन धर्मग्रंथों पर टिप्पणी करने से पहले उनका गंभीरता से अध्ययन करें और ऐसे बयानों से बचें, जिनसे समाज में भ्रम की स्थिति पैदा हो।

'रक्षति' शब्द की गलत व्याख्या का खंडन

शंकराचार्य ने राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति के एक श्लोक में प्रयुक्त 'रक्षति' शब्द की व्याख्या पर विशेष आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि 'पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने…' जैसे श्लोकों को केवल स्त्री की परतंत्रता के संदर्भ में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। संस्कृत में 'रक्षति' का मूल अर्थ रक्षा करना, संरक्षण देना और सुरक्षा करना है। इसे स्त्री पर नियंत्रण या अधिकार जमाने के अर्थ में प्रस्तुत करना श्लोक के मूल भाव से कोसों दूर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में माता-पिता, पति और परिवार के अन्य सदस्यों के दायित्वों को सुरक्षा, सम्मान और भरण-पोषण से जोड़कर देखा गया है। किसी भी धार्मिक ग्रंथ के एक वाक्य या श्लोक को उसके व्यापक संदर्भ से अलग करके देखने पर उसके अर्थ की गलत व्याख्या हो सकती है, इसलिए मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों पर चर्चा करते समय शास्त्रीय संदर्भ और मूल भाषा का ज्ञान अनिवार्य है।

सनातन परंपरा में नारी का उच्च स्थान

शंकराचार्य ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारतीय सनातन परंपरा को केवल कुछ चुनिंदा श्लोकों के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता। उन्होंने भारतीय वाङ्मय में नारी को शक्ति, ज्ञान, सृजन और परिवार की आधारशिला के रूप में प्रतिष्ठित करने का उल्लेख किया। उन्होंने वैदिक परंपरा की ऋषिकाओं गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं के बौद्धिक और आध्यात्मिक योगदान के अकाट्य प्रमाण मौजूद हैं। उनके अनुसार, भारतीय संस्कृति में नारी की गरिमा को स्थापित करने वाली अनेक अवधारणाएं और परंपराएं रही हैं। उन्होंने 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' जैसे उद्धरण का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन दृष्टि में नारी के सम्मान को धार्मिक और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। भारतीय सामाजिक चिंतन को केवल अधिकार और वर्चस्व के संघर्ष की दृष्टि से देखने के बजाय दायित्व, संरक्षण, सम्मान और पारस्परिक पूरकता के संदर्भ में भी समझना चाहिए।

भाजपा को मनुस्मृति समर्थक बताना भ्रामक

शंकराचार्य ने राहुल गांधी के उस राजनीतिक आरोप का भी खंडन किया, जिसमें भाजपा को मनुस्मृति समर्थक बताया जाता है। उन्होंने इसे पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि स्वतंत्र भारत की शासन व्यवस्था पूरी तरह संविधान के अनुसार संचालित होती है और देश के कानून व प्रशासन का आधार भारतीय संविधान है। उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक दल को मनुस्मृति से जोड़कर प्रस्तुत करना राजनीतिक विमर्श को धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भों में अनावश्यक रूप से उलझाने का प्रयास है। राजनीतिक दलों की नीतियों और संवैधानिक व्यवस्था का मूल्यांकन संविधान, कानून और उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों के आधार पर होना चाहिए, न कि मनगढ़ंत साहित्यिक आरोपों पर। उन्होंने आगाह किया कि धर्मशास्त्रों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि प्राचीन ग्रंथों की अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और शास्त्रीय परंपरा होती है। उनके अंशों को वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में बिना समुचित व्याख्या के प्रस्तुत करने से गलत संदेश जा सकता है।

बार-बार बयान देने पर जताई चिंता

शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों को लेकर बार-बार दिए जा रहे बयान सनातन परंपरा के प्रति उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं। उन्होंने कहा कि संसद और सार्वजनिक मंचों पर धर्मग्रंथों के संबंध में टिप्पणी करते समय जिम्मेदारी और गहन अध्ययन दोनों आवश्यक हैं। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन किसी धर्म की मूल परंपराओं और ग्रंथों के बारे में टिप्पणी करते समय तथ्यों और शास्त्रीय प्रमाणों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। असहमति को भी तथ्य और तर्क के आधार पर व्यक्त किया जाना चाहिए।

'हिन्दू धर्म से बहिष्कृत' का दावा दोहराया

शंकराचार्य ने कहा कि मनुस्मृति और धर्मशास्त्रों को लेकर राहुल गांधी की कथित बार-बार की गई टिप्पणियों के कारण उन्होंने पूर्व में उन्हें 'हिन्दू धर्म से बहिष्कृत' घोषित किया था। उन्होंने अपने इस पूर्व कथन को दोहराते हुए राहुल गांधी को धर्मशास्त्रों के संबंध में बयानबाजी में संयम बरतने की चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि सनातन धर्मग्रंथों को लेकर बिना पूर्ण शास्त्रीय अध्ययन के टिप्पणी करने से धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं और समाज में अनावश्यक विवाद पैदा होता है। उन्होंने राहुल गांधी और कांग्रेस से अपेक्षा की कि वे धर्मशास्त्रों के विषय में अधिक जिम्मेदार और तथ्यपरक दृष्टिकोण अपनाएं।

वैचारिक विरोध जारी रखने की चेतावनी

शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि यदि राहुल गांधी और कांग्रेस की ओर से सनातन धर्म, मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों के संबंध में इसी प्रकार की टिप्पणियां जारी रहती हैं, तो सनातन समाज और प्रबुद्ध वर्ग इसका वैचारिक और मुखर विरोध करता रहेगा। उन्होंने कहा कि किसी भी धार्मिक परंपरा की आलोचना से पहले उसके मूल ग्रंथों, भाष्य, परंपरा और ऐतिहासिक संदर्भ का गहन अध्ययन होना चाहिए। केवल राजनीतिक भाषणों के माध्यम से धर्मशास्त्रों का अर्थ निर्धारित करना सर्वथा अनुचित है। शंकराचार्य ने अंत में राहुल गांधी से कहा कि वे मनुस्मृति और सनातन परंपरा से जुड़े विषयों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय शास्त्रीय अध्ययन और प्रमाण के आधार पर समझें। उन्होंने भारतीय सनातन परंपरा की व्यापकता को रेखांकित करते हुए कहा कि उसे किसी एक श्लोक अथवा राजनीतिक विमर्श के सीमित दायरे में नहीं बांधा जा सकता।