पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप साबित, संसद में रिपोर्ट पेश
सरकारी आवास से नकदी मिलने के मामले में गठित संसदीय जांच समिति ने दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को साबित माना है। रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश की गई।

द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 12 अगस्त 2026
दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से नकदी मिलने के गंभीर मामले में गठित संसदीय जांच समिति ने उनके विरुद्ध लगाए गए तीनों आरोपों को सही ठहराया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों में पेश की गई। रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा पर नकदी के स्रोत और स्वामित्व को लेकर संतोषजनक जवाब न देने, घटनास्थल से जुड़े साक्ष्यों के संरक्षण में गंभीर लापरवाही बरतने तथा अपने बचाव में दिए गए स्पष्टीकरण को असंतोषजनक पाए जाने का उल्लेख है।
जांच समिति ने गवाहों के बयानों, उपलब्ध दस्तावेजों और भौतिक साक्ष्यों का गहन परीक्षण करने के उपरांत यह निष्कर्ष निकाला है। समिति की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस वर्मा यह स्पष्ट नहीं कर सके कि उनके सरकारी आवास के स्टोर रूम में इतनी बड़ी मात्रा में नकदी कैसे पहुंची, इसका वास्तविक मालिक कौन था और यह वहां क्यों रखी गई थी। नकदी के स्रोत और स्वामित्व संबंधी सवालों पर उनके द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं पाया गया, जिस आधार पर पहला आरोप साबित माना गया।
आग लगने की घटना से सामने आया था नकदी का मामला
यह पूरा प्रकरण 14 मार्च 2025 की रात को तब सामने आया जब नई दिल्ली के तुगलक क्रेसेंट स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने के लिए मौके पर पहुंचे दमकलकर्मियों को आवास के स्टोर रूम में बड़ी संख्या में 500-500 रुपये के जले और अधजले नोटों के बंडल बिखरे मिले थे। घटना की सूचना मिलते ही यह मामला न्यायिक प्रशासन और सुप्रीम कोर्ट के स्तर तक पहुंचा, जिसके बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ आंतरिक जांच प्रक्रिया आरंभ हुई। इसी के परिणामस्वरूप उनका दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरण भी किया गया था।
साक्ष्यों के संरक्षण में गंभीर लापरवाही का आरोप
संसदीय समिति ने दूसरे आरोप के तहत घटनास्थल पर मौजूद साक्ष्यों के संरक्षण में गंभीर चूक को रेखांकित किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आग बुझाने के बाद स्टोर रूम को तत्काल कानूनी प्रक्रिया के तहत सील नहीं किया गया। जांच में यह भी सामने आया कि रात में ही स्टोर रूम की सफाई की गई और जली हुई व क्षतिग्रस्त सामग्री को हटाया गया, जिससे कमरे की मूल स्थिति परिवर्तित हो गई। समिति के अनुसार, कानूनी सीलिंग और विस्तृत निरीक्षण से पूर्व घटनास्थल में बदलाव होने के कारण महत्वपूर्ण साक्ष्यों के संरक्षण में कमी आई। हालांकि समिति ने यह निष्कर्ष नहीं निकाला कि गायब हुए नोट जस्टिस वर्मा ने स्वयं हटाए थे, परंतु साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में हुई लापरवाही को गंभीर माना गया।
जस्टिस वर्मा का स्पष्टीकरण असंतोषजनक
जांच समिति ने जस्टिस वर्मा द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों की भी गहन जांच की, विशेष रूप से 22 मार्च 2025 को दिए गए उनके बयान पर ध्यान केंद्रित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, शुरू में जस्टिस वर्मा ने नकदी की जानकारी होने से इनकार किया था, बाद में उन्होंने अलग-अलग संभावनाओं और साजिश की आशंकाओं का भी जिक्र किया। हालांकि, समिति ने पाया कि इन दावों के समर्थन में पर्याप्त ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। जस्टिस वर्मा स्वयं भी समिति के समक्ष गवाही के लिए उपस्थित नहीं हुए और न ही उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों या कर्मचारियों को गवाह के तौर पर पेश किया। गवाहों के बयानों और दस्तावेजी साक्ष्यों की तुलना में उनके जवाबों में अपेक्षित स्पष्टता और पारदर्शिता का अभाव पाया गया, जिस कारण तीसरे आरोप को भी साबित माना गया।
दो खंडों में पेश की गई रिपोर्ट
जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट दो खंडों में तैयार की, जिसमें जांच के दौरान प्राप्त सभी दस्तावेज, गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों का विस्तृत उल्लेख है। रिपोर्ट में तीनों आरोपों पर अलग-अलग निष्कर्ष दिए गए हैं और जांच पूरी करने के बाद संबंधित रिकॉर्ड एवं साक्ष्यों को आगे की कार्रवाई हेतु सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर दिया गया है।
सांसदों के हस्ताक्षर और इस्तीफे के बावजूद जारी रही जांच
मामले के सामने आने के बाद, जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसके जवाब में 12 अगस्त 2025 को लोकसभा अध्यक्ष ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था। हालांकि, संसदीय कदाचार प्रक्रिया के बीच, 9 अप्रैल 2026 को जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। इसके बावजूद, समिति ने अपनी जांच प्रक्रिया को पूरा किया और उसकी रिपोर्ट को संसद में पेश किया। इस्तीफे के बाद भी रिपोर्ट पेश होने का यह घटनाक्रम संवैधानिक और न्यायिक जवाबदेही के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
न्यायिक जवाबदेही पर बड़ी बहस
जांच समिति की रिपोर्ट में तीनों आरोपों को साबित माने जाने के बाद, अब आगे की कार्रवाई संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया के तहत तय की जाएगी। सरकार द्वारा इस मामले में आगे की कार्रवाई पर विचार किए जाने की संभावना है। जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के पश्चात भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण बना हुआ है कि क्या किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस्तीफे की स्थिति में संसद की कार्रवाई किस हद तक जारी रह सकती है। इस प्रकरण ने न्यायपालिका में जवाबदेही, न्यायिक पद की गरिमा और संवैधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता को लेकर एक व्यापक बहस को जन्म दिया है।
घटनाक्रम एक नजर में:
14 मार्च 2025: जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग; स्टोर रूम में नकदी मिली।
मार्च 2025: आंतरिक जांच शुरू; स्पष्टीकरण मांगा गया।
28 मार्च 2025: जस्टिस वर्मा का दिल्ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट तबादला।
मई 2025: आंतरिक जांच के बाद कार्रवाई की सिफारिश।
जुलाई 2025: 200+ सांसदों ने हटाने की प्रक्रिया शुरू करने हेतु हस्ताक्षर किए।
12 अगस्त 2025: लोकसभा अध्यक्ष द्वारा तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन।
9 अप्रैल 2026: जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपा।
12 अगस्त 2026: संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट संसद में पेश; तीनों आरोप साबित।
पूर्व न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का प्रकरण अब केवल सरकारी आवास से नकदी मिलने के आरोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह न्यायपालिका की जवाबदेही, संस्थागत पारदर्शिता और न्यायिक पद की विश्वसनीयता जैसे बड़े सवालों से जुड़ गया है। संसद में रिपोर्ट पेश होने के बाद, अब सभी की निगाहें आगे होने वाली संवैधानिक और संसदीय कार्रवाई पर टिकी हैं।
