पुलिसकर्मियों के परिजन उतरे अदालत, छात्र आंदोलन के मामले वापस लेने का विरोध
दिल्ली में छात्र आंदोलन के दौरान दर्ज मामले वापस लेने की प्रक्रिया पर घायल पुलिसकर्मियों के परिजन और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी आपत्ति जता रहे हैं। उन्होंने अदालत में याचिका दायर कर हस्तक्षेप की मांग की है।

द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 28 जुलाई 2026
राजधानी दिल्ली में छात्र आंदोलन से जुड़े मामलों को वापस लेने की सरकारी मंशा के खिलाफ एक नया विवाद खड़ा हो गया है। ड्यूटी के दौरान हमले में घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजन और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। उनकी मांग है कि पुलिस पर हमले से जुड़े आपराधिक मामलों को वापस न लिया जाए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई पूर्ववत जारी रखी जाए।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रशासन छात्र आंदोलन से जुड़े कुछ मामलों में अभियोजन वापस लेने की प्रक्रिया पर विचार कर रहा है। वहीं, घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों का तर्क है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के क्रम में अपनी जान जोखिम में डालने वाले पुलिसकर्मियों के प्रति यह न्यायोचित नहीं होगा। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में मुकदमा वापस लेना पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीदों को धूमिल कर देगा और सरकारी कर्मचारियों, विशेषकर पुलिस बल, पर भविष्य में हमलों को प्रोत्साहित कर सकता है। इसी चिंता के चलते उन्होंने अदालत में याचिका दायर कर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है।
जंतर-मंतर पर धरने की तैयारी, पुलिस बल का मनोबल बढ़ाने पर जोर
इस मुद्दे पर सेवानिवृत्त पुलिसकर्मियों के विभिन्न संगठनों ने भी सक्रियता दिखाई है। उन्होंने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरना आयोजित करने के लिए प्रशासन से अनुमति मांगी है। इन संगठनों का कहना है कि उनका आंदोलन पूरी तरह से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक होगा, जिसका मुख्य उद्देश्य घायल पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों के प्रति एकजुटता व्यक्त करना और सरकार का ध्यान उनकी गंभीर चिंताओं की ओर आकर्षित करना है।
सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों के अनुसार, पुलिसकर्मी अक्सर कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में काम करते हैं। यदि उन पर हमले के मामलों में दर्ज मुकदमे बिना न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुए वापस लिए जाते हैं, तो इससे पुलिस बल का मनोबल गंभीर रूप से प्रभावित होगा। उनका यह भी तर्क है कि पुलिसकर्मियों को यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि ड्यूटी के दौरान उन पर होने वाले हमलों के विरुद्ध कानून उनके साथ खड़ा रहेगा और दोषियों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
सेवानिवृत्त पुलिस संगठनों ने स्पष्ट किया है कि उनका विरोध किसी विशेष व्यक्ति या समूह के विरुद्ध नहीं है, बल्कि यह कानून के समान और निष्पक्ष अनुपालन के सिद्धांत के समर्थन में है। वे मानते हैं कि किसी भी आपराधिक मामले में कानूनी प्रक्रिया को उसके अंतिम चरण तक पहुंचने दिया जाना चाहिए और अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा सभी पक्षों की दलीलें सुनने के उपरांत ही लिया जाना चाहिए।
कानूनी प्रक्रिया की जटिलताएँ और अदालती हस्तक्षेप की संभावना
मामले को लेकर राजनीतिक और कानूनी हलकों में भी गहन चर्चाएं चल रही हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि किसी भी आपराधिक मुकदमे को वापस लेने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है और यह न्यायालय की अनुमति तथा संबंधित कानूनी प्रावधानों के अधीन होती है। ऐसे मामलों में, अदालत सभी संबंधित पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद ही कोई निर्णय लेती है।
वर्तमान स्थिति में, सभी की निगाहें अदालत की आगामी सुनवाई और सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि जंतर-मंतर पर धरने की अनुमति मिल जाती है, तो आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है। घायल पुलिसकर्मियों के परिजन और सेवानिवृत्त पुलिस संगठन अपने रुख पर अडिग हैं कि उनका उद्देश्य पुलिस बल के सम्मान, उनके मनोबल को बनाए रखने और कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन की मांग को लोकतांत्रिक माध्यमों से उठाना है।
