प्रो. संजय द्विवेदी: डिजिटल नागरिक बनें, नेटिजन नहीं; AI के युग में मीडिया साक्षरता अनिवार्य
पूर्व आईआईएमसी महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि युवाओं को तकनीक का गुलाम नहीं, स्वामी बनना चाहिए। उन्होंने डिजिटल मीडिया के उपयोग, AI की चुनौतियों और मानवीय संवेदनाओं के महत्व पर जोर दिया।

द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 7 सितंबर 2026
भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने युवाओं से 'नेटिजन' बनने से पहले 'सिटिजन' बनने का आह्वान किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि डिजिटल माध्यम मनुष्य के लिए उपयोगी साधन हैं, लेकिन इन्हें जीवन का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए। युवाओं को तकनीक का उपयोग ज्ञान-सृजन, संवाद, शिक्षा, रोजगार और अवसरों के विस्तार के लिए करना चाहिए, न कि इसका गुलाम बनना चाहिए।
प्रो. द्विवेदी, जो साहित्य, कला और संस्कृति के संवर्धन के लिए गठित संस्था ‘साहित्यायन’ द्वारा आयोजित प्रथम व्याख्यानमाला को ऑनलाइन संबोधित कर रहे थे, ने कहा कि डिजिटल माध्यमों पर बढ़ती निर्भरता के बीच मौलिक चिंतन, मानवीय संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी को सुरक्षित रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ‘डिजिटल मीडिया और युवा जीवन-दृष्टि’ विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि यह 'वर्नाकुलर, वॉइस और वीडियो' का युग है, और डिजिटल क्रांति ने भारतीय भाषाओं के लिए अभूतपूर्व संभावनाएं पैदा की हैं।
भारतीय भाषाओं के लिए नई राहें
प्रो. द्विवेदी ने रेखांकित किया कि डिजिटल माध्यमों ने भाषा और लिपि की कई बाधाओं को समाप्त कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय भाषाओं का साहित्य, सिनेमा, रंगमंच, कला और सांस्कृतिक ज्ञान आज वैश्विक पटल पर आसानी से उपलब्ध है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि प्रत्येक वायरल सूचना सत्य नहीं होती, और किसी भी संदेश, समाचार या वीडियो को साझा करने से पहले उसके स्रोत, संदर्भ, सत्यता और विश्वसनीयता की जांच करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जिम्मेदार डिजिटल नागरिकता की आवश्यकता
युवाओं को केवल डिजिटल उपभोक्ता बनने के बजाय जिम्मेदार डिजिटल नागरिक बनने की आवश्यकता पर जोर देते हुए, प्रो. द्विवेदी ने 'मीडिया साक्षरता' की महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने एक संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली नारा दिया: “बुरा मत टाइप करो, बुरा मत लाइक करो और बुरा मत शेयर करो।” उन्होंने चेतावनी दी कि बिना सत्यापन के सामग्री प्रसारित करने की प्रवृत्ति व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हानिकारक हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ गहरी जिम्मेदारी भी जुड़ी है। असहमति व्यक्त करना एक अधिकार है, लेकिन किसी का अपमान करना, घृणा फैलाना, उत्पीड़न करना और भ्रामक सूचना प्रसारित करना उचित डिजिटल व्यवहार नहीं है। उन्होंने डिजिटल दुनिया में निजता को एक महत्वपूर्ण नागरिक मूल्य बताया।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और उसकी चुनौतियाँ
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की संभावनाओं और चुनौतियों पर चर्चा करते हुए, प्रो. द्विवेदी ने कहा कि AI ने शिक्षा, अनुवाद, भाषा-परिष्कार, कंटेंट निर्माण, वॉइस रिकॉग्निशन, विज्ञापन और संचार जैसे क्षेत्रों में नए अवसर खोले हैं। हालांकि, इसके साथ ही मनुष्य की मौलिकता, आलोचनात्मक चिंतन और रचनात्मक श्रम के सामने गंभीर चुनौतियाँ भी खड़ी हुई हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि मशीनों पर अत्यधिक निर्भरता मनुष्य की चिंतन-क्षमता को कमजोर कर सकती है।
डीपफेक और कृत्रिम रूप से निर्मित सामग्री के खतरों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने कहा कि AI के युग में सूचना की जाँच पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई है। किसी व्यक्ति की आवाज, तस्वीर अथवा वीडियो को कृत्रिम रूप से बदलकर समाज को भ्रमित किया जा सकता है। इसलिए, उन्होंने सुझाव दिया कि विद्यालय से लेकर उच्च शिक्षा तक मीडिया एवं सूचना साक्षरता को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
रचनात्मकता का आधार: मानवीय संवेदना
मानवीय संवेदना को रचनात्मकता का मूल आधार बताते हुए, प्रो. द्विवेदी ने प्रसिद्ध शायर अकबर इलाहाबादी का एक शेर उद्धृत किया: “दर्द को दिल में जगह दो अकबर, इल्म से शायरी नहीं होती।” उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रेष्ठ तकनीक, भाषा और उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद, रचना तब तक प्रभावशाली नहीं बन सकती, जब तक उसमें मनुष्य के दुख, संघर्ष और संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति न हो। उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि बहुभाषिकता भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक शक्ति और गौरव है।
'साहित्यायन' का उद्देश्य और भविष्य की योजनाएं
कार्यक्रम के आरंभ में, पीजीडीएवी कॉलेज (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और ‘साहित्यायन’ के संरक्षक व मार्गदर्शक प्रो. हरीश अरोड़ा ने स्वागत वक्तव्य दिया। उन्होंने बताया कि ‘साहित्यायन’ का उद्देश्य केवल साहित्य या भाषा तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि यह संस्था भाषा, साहित्य, कला और संस्कृति को समन्वित रूप से आगे बढ़ाते हुए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों और समाज के बीच संवाद स्थापित करेगी। उन्होंने यह भी सूचित किया कि संस्था ऑनलाइन कार्यक्रमों के साथ-साथ भविष्य में प्रत्यक्ष कार्यक्रमों का भी आयोजन करेगी।
कार्यक्रम का संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी अविरल अभिलाष मिश्र ने किया। आयोजन समिति में डॉ. प्रभाकर कुमार, दिनेश कौशिक, साक्षी, हंसराज, सहदेव सिंह, नितेश कुमार पांडेय, हरीश चौधरी, राजेंद्र पाल, रेशमी कुमारी, प्रवीण त्रिपाठी, विश्वानी मिश्रा, शुभम शास्त्री और लव कुमार पांडेय जैसे सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
