प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण पर सवाल: MP कृषि विभाग के अधिकारियों के चयन पर उठे प्रशासनिक और वित्तीय मुद्दे
मध्य प्रदेश कृषि विभाग द्वारा बेंगलुरु में प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण के लिए अधिकारियों के चयन और खर्च पर सवाल उठाए जा रहे हैं। निकट सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारियों को शामिल किए जाने से प्रशिक्षण की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।

संवाददाता: राजीव त्रिपाठी
द क्लिफ न्यूज़ | 16 सितंबर 2026
मध्य प्रदेश कृषि विभाग में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अधिकारियों को बेंगलुरु में प्रशिक्षण देने की योजना पर प्रशासनिक और वित्तीय सवाल खड़े हो गए हैं। प्रशिक्षण के लिए अधिकारियों के चयन की प्रक्रिया, उनकी वर्तमान जिम्मेदारियों और सेवानिवृत्ति की निकटता को लेकर विभाग की मंशा पर सवाल उठाए जा रहे हैं। विभाग द्वारा 16 सितंबर से शुरू होकर नवंबर के पहले पखवाड़े तक विभिन्न बैचों में आयोजित की जाने वाली इस तीन दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण का उद्देश्य प्राकृतिक खेती के ज्ञान को अधिकारियों तक पहुंचाना है, जिसमें योग और ध्यान के सत्र भी शामिल हैं।
यह प्रशिक्षण श्री अन्नाम इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी, बेंगलुरु द्वारा आयोजित किया जाएगा। प्रारंभिक योजना के अनुसार 75 अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाना था, लेकिन बाद में यह संख्या घटकर 58 हो गई। इन अधिकारियों में अपर संचालक, उप संचालक, सहायक संचालक और स्टेट कोऑर्डिनेटर स्तर के अधिकारी शामिल हैं।
सेवानिवृत्ति के करीब अधिकारियों के चयन पर चिंता
प्रशिक्षण सूची में कुछ ऐसे अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं जिनकी सेवानिवृत्ति की तारीखें बेहद नजदीक हैं। उदाहरण के लिए, सहायक संचालक सविता श्रीवास्तव, जिनका नाम 16 से 18 सितंबर के बैच में है, 30 सितंबर को सेवानिवृत्त होने वाली हैं। इसी प्रकार, अपर संचालक जीपी प्रजापति, जो मुख्यमंत्री मॉनिटर से संबंधित कार्य देखते हैं और 25 से 27 सितंबर के बैच में हैं, 31 दिसंबर को सेवानिवृत्त होंगे। इस स्थिति में, यह सवाल उठता है कि इन अधिकारियों द्वारा प्राप्त प्रशिक्षण ज्ञान का विभाग कितनी अवधि तक उपयोग कर पाएगा, खासकर जब उनकी सेवा अवधि कुछ ही सप्ताह या महीने शेष हो।
हालांकि, यह तर्क दिया जा सकता है कि सेवानिवृत्ति के करीब होने का मतलब यह नहीं है कि ऐसे अधिकारियों को प्रशिक्षण से बाहर रखा जाए। उनके पास महत्वपूर्ण प्रशासनिक अनुभव होता है और वे नीतिगत स्तर पर प्रशिक्षण से प्राप्त जानकारी का प्रभावी उपयोग कर सकते हैं। परंतु, इसके लिए यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि प्रशिक्षण के बाद उनकी क्या भूमिका और जिम्मेदारी होगी।
विभिन्न जिम्मेदारियों वाले अधिकारियों को प्रशिक्षण में शामिल करना
प्रशिक्षण सूची में ऐसे अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं जिनकी वर्तमान जिम्मेदारियां सीधे तौर पर प्राकृतिक खेती के जमीनी स्तर के विस्तार से संबंधित नहीं हैं। उदाहरण के लिए, संचालनालय में कार्यालय प्रमुख डीएल कोरी स्थापना संबंधी कार्य देखते हैं। उप संचालक डॉ. मनीषा जायसवाल बजट और योजना से संबंधित कार्यों में संलग्न हैं। सहायक संचालक एफएल इवने विभागीय जांच और दुष्यंत कुमार धाकड़ कानूनी मामलों से जुड़े कार्य देखते हैं। इनके अतिरिक्त, 25 से 27 सितंबर वाले बैच में स्थापना, आरटीआई और सूचना संबंधी कार्यों से जुड़े अधिकारी भी शामिल हैं। यह स्थिति प्रशिक्षण के लिए अधिकारियों के चयन के आधार को अस्पष्ट करती है।
यह महत्वपूर्ण है कि विभाग यह स्पष्ट करे कि अधिकारियों के चयन का मुख्य मानदंड क्या था। क्या प्राथमिकता केवल कृषि तकनीकी कार्य से जुड़े अधिकारियों को दी गई है, या इसका उद्देश्य वरिष्ठ अधिकारियों को प्राकृतिक खेती की नीतियों और प्रशासनिक व्यवस्था से परिचित कराना है? यदि नीति निर्माण और निगरानी इसका लक्ष्य है, तो चयन प्रक्रिया उसी आधार पर होनी चाहिए। यदि किसानों तक तकनीक पहुंचाना उद्देश्य है, तो मैदानी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की भागीदारी अधिक प्रासंगिक होगी।
सरकारी खर्च और प्रशिक्षण की उपयोगिता
इस प्रशिक्षण पर होने वाले सरकारी खर्च को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बेंगलुरु में आवासीय प्रशिक्षण के लिए एकल एसी कमरे का खर्च लगभग 30,000 रुपये प्रतिदिन, डबल कमरे का 25,000 रुपये और साझा व्यवस्था का 15,000 रुपये प्रतिदिन बताया जा रहा है। इसके अलावा, अधिकारियों की यात्रा, दैनिक भत्ता और अन्य विविध खर्च भी इसमें शामिल होंगे। कुल सरकारी व्यय की राशि का स्पष्ट ब्यौरा सामने आना आवश्यक है, ताकि जनता को इस निवेश की जानकारी मिल सके।
सरकारी धन से आयोजित प्रशिक्षण की सफलता केवल प्रशिक्षण पूर्ण होने से नहीं मापी जा सकती। प्रशिक्षण के बाद प्राप्त ज्ञान का विभागीय कार्यों में कितना प्रभावी उपयोग हुआ, यह अधिक महत्वपूर्ण है। यदि प्रशिक्षित अधिकारी अपने जिलों में लौटकर प्राकृतिक खेती के लिए मास्टर ट्रेनर तैयार करते हैं, किसानों के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करते हैं, प्रदर्शन प्लॉट विकसित करते हैं और विभागीय योजनाओं की निगरानी करते हैं, तो ही इस प्रशिक्षण का दीर्घकालिक प्रभाव सुनिश्चित होगा।
नीतिगत स्तर पर वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका
वरिष्ठ अधिकारियों को प्रशिक्षण देने के पीछे एक अलग प्रशासनिक तर्क भी हो सकता है। वे विभागीय नीतियों, बजट आवंटन, योजनाओं के निर्माण और निगरानी जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यदि वे प्राकृतिक खेती की तकनीक, उसके आर्थिक लाभ और प्रशासनिक पहलुओं को समझते हैं, तो वे विभाग के लिए भविष्य की कार्ययोजनाएँ तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे अधिकारी अपने अनुभव का उपयोग करके अधीनस्थ कर्मचारियों को बेहतर मार्गदर्शन भी दे सकते हैं।
एक अन्य संभावित व्यवस्था 'पोस्ट-रिटायरमेंट कंसल्टेंसी' की हो सकती है, जिसमें विशेषज्ञ अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद सलाहकार या प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किया जाता है। यदि प्रशिक्षण लेने वाले अधिकारियों के लिए ऐसी कोई भविष्य की भूमिका प्रस्तावित है, तो यह प्रशिक्षण की उपयोगिता को काफी हद तक बढ़ा सकता है। हालांकि, ऐसी व्यवस्था के लिए स्पष्ट सरकारी निर्णय या आदेश का होना अनिवार्य है।
स्पष्टता की आवश्यकता
कृषि विभाग के संचालक उमाशंकर भार्गव के अनुसार, प्रशिक्षण में मुख्यालय के साथ-साथ जिलों के अधिकारी भी शामिल हैं और संबंधित अधिकारियों की सेवानिवृत्ति में अभी पर्याप्त समय है। हालांकि, प्रशिक्षण सूची में कुछ अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की तारीखें नजदीक दिख रही हैं। इसलिए, विभाग को सूची में दर्ज तारीखों और अधिकारियों की वास्तविक सेवा स्थिति को स्पष्ट करना चाहिए ताकि भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।
इस पूरे मामले का केंद्रीय प्रश्न यह नहीं है कि कोई अधिकारी वरिष्ठ है या सेवानिवृत्ति के करीब है, बल्कि यह है कि प्रशिक्षण का वास्तविक उद्देश्य क्या है और प्रशिक्षण के बाद प्राप्त ज्ञान का संस्थागत स्तर पर उपयोग कैसे सुनिश्चित किया जाएगा। यदि प्रशिक्षण के बाद स्पष्ट जिम्मेदारियाँ तय की जाती हैं और अधिकारी अपने अनुभव तथा प्रशिक्षण को अन्य कर्मचारियों और किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाते हैं, तो सीमित सेवा अवधि के बावजूद भी इसका लाभ मिल सकता है।
इसके विपरीत, यदि प्रशिक्षण के लिए अधिकारियों का चयन बिना पारदर्शी मानदंडों के किया गया हो, मैदानी स्तर पर कार्य करने वाले अधिकारियों को दरकिनार किया गया हो, और प्रशिक्षण के बाद कोई ठोस कार्ययोजना न हो, तो सरकारी खर्च की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। विभाग से तीन प्रमुख बिंदुओं पर तत्काल स्पष्टता अपेक्षित है: पहला, अधिकारियों के चयन का मानदंड क्या है; दूसरा, प्रत्येक अधिकारी पर कितना सरकारी व्यय प्रस्तावित या वास्तविक है; और तीसरा, प्रशिक्षण के बाद अधिकारियों को प्राकृतिक खेती से संबंधित क्या जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। सेवानिवृत्ति के करीब बताए जा रहे अधिकारियों की सेवा अवधि की वास्तविक स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए।
प्राकृतिक खेती का अंतिम लक्ष्य किसानों तक व्यावहारिक ज्ञान पहुंचाना है। इसलिए, बेंगलुरु में आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण की सफलता का पैमाना केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्रों की संख्या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि लौटने के बाद कितने किसानों तक यह व्यावहारिक ज्ञान पहुंचा और मध्य प्रदेश की कृषि व्यवस्था में इसका कितना स्थायी और सकारात्मक उपयोग हुआ। सरकारी खर्च से होने वाले किसी भी प्रशिक्षण का वास्तविक मूल्यांकन इसी कसौटी पर किया जाना चाहिए।
