पीएम के 'दिमागी नक्सली' बयान पर अधिवक्ता की आपत्ति, बोले- कसौटी क्या?
प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में 'दिमागी नक्सली' शब्द के इस्तेमाल पर भाजपा संस्थापक सदस्य डॉ. मुरलीधर सिंह शास्त्री ने आपत्ति जताई है। उन्होंने सवाल उठाया है कि 'दिमागी नक्सली' कौन है, इसका निर्धारण कैसे होगा।

द क्लिफ न्यूज़ | लखनऊ | 22 अगस्त 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 15 अगस्त 2026 को लाल किले से अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में 'दिमागी नक्सली' शब्द के प्रयोग को लेकर एक प्रमुख अधिवक्ता ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शुमार और लखनऊ पीठ के अधिवक्ता डॉ. मुरलीधर सिंह शास्त्री ने प्रधानमंत्री के इस बयान को 'असंगत और हास्यास्पद' करार देते हुए सवाल उठाया है कि ऐसी शब्दावली का उपयोग क्यों किया गया और 'दिमागी नक्सली' होने की कसौटी क्या होगी।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस का संबोधन न केवल देश, बल्कि विश्व स्तर पर ध्यान आकर्षित करता है। ऐसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसर पर 'दिमागी नक्सली' जैसे शब्दों का इस्तेमाल व्यापक विमर्श का विषय बनना स्वाभाविक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी राजनीतिक पद की चाहत नहीं रखते, बल्कि एक अधिवक्ता और भाजपा के एक पुराने सदस्य के नाते अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
भाषण की अवधि से अधिक शब्दावली महत्वपूर्ण
प्रधानमंत्री के 2026 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन की तुलना पिछले वर्ष (2025) के भाषण से करते हुए डॉ. शास्त्री ने कहा कि इस बार का भाषण लगभग 75 मिनट का था, जो पिछले वर्ष के लगभग 103 मिनट के भाषण से करीब 28 मिनट छोटा था। हालांकि, उन्होंने भाषण की अवधि से अधिक उसके विषय-वस्तु और प्रयुक्त शब्दावली को अधिक महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, लाल किले से दिया गया भाषण केवल राजनीतिक वक्तव्य नहीं होता, बल्कि यह देश की दिशा, सरकारी नीतियों, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और भविष्य की योजनाओं का व्यापक संदेश देता है। ऐसे में, भाषण में उन विषयों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो देश की आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय दिशा को स्पष्ट करें।
विचार-विमर्श और 'दिमागी नक्सलवाद' पर प्रश्न
डॉ. शास्त्री ने मनोविज्ञान और विचार निर्माण की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज विचारों के टकराव और विमर्श से आगे बढ़ता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि विचारों को रखना, प्रश्न पूछना या किसी विषय पर अलग दृष्टिकोण रखना 'दिमागी नक्सलवाद' के दायरे में आएगा, तो समाज का एक बड़ा हिस्सा इस श्रेणी में आ सकता है। उन्होंने डिजिटल माध्यमों के बढ़ते उपयोग का उदाहरण देते हुए कहा कि आज करोड़ों लोग मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे वे विभिन्न विचारों से परिचित होते हैं। ऐसे में, किसी विचारधारा या मानसिकता को 'दिमागी नक्सली' कहकर संबोधित करने की अवधारणा को स्पष्ट करना आवश्यक है। यह तय कौन करेगा कि 'दिमागी नक्सली' कौन है?
उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा स्वयं एक वैचारिक संगठन है, जहां बहस की परंपरा रही है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विचारों का होना, उनसे असहमति और नीतियों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए, शब्दों के चयन में विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है।
व्यक्तिगत दुर्भावना से नहीं, नागरिक के नाते आपत्ति
डॉ. शास्त्री ने जोर देकर कहा कि उनकी आपत्ति व्यक्तिगत या राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित नहीं है। उन्होंने स्वयं को भाजपा का संस्थापक सदस्य बताते हुए कहा कि उनकी आपत्ति किसी दल के विरोध में नहीं, बल्कि एक नागरिक और अधिवक्ता के रूप में है। प्रधानमंत्री के पद और स्वतंत्रता दिवस के अवसर की गरिमा को देखते हुए, भाषण की भाषा और विषय दोनों पर गंभीर विचार-विमर्श होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से बचना चाहिए जिनकी अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं या जिनसे समाज के विभिन्न वर्गों में भ्रम अथवा असहमति पैदा हो।
उन्होंने कहा कि वह 'दिमागी नक्सली' शब्द को स्वीकार नहीं करते और अन्य लोगों से भी अपील की कि वे अनावश्यक टिप्पणी या विवाद बढ़ाने के बजाय इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। उन्होंने यह सवाल उठाया कि यदि बड़ी संख्या में लोगों को किसी मानसिकता के आधार पर 'दिमागी नक्सली' कहा जा सकता है, तो ऐसी पहचान तय करने की कसौटी क्या होगी। लोकतंत्र में असहमति को स्थान मिलना चाहिए और विचारों के मतभेद को देशविरोध या उग्र विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है।
राष्ट्रीय विकास और भविष्य की योजनाओं पर जोर
अपने वक्तव्य के अंत में, डॉ. शास्त्री ने कहा कि प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस संबोधन का उद्देश्य देश को दिशा देना और नागरिकों में राष्ट्रीय भावना को मजबूत करना होना चाहिए। इस अवसर पर सरकार की उपलब्धियों, आगामी योजनाओं, आर्थिक विकास, राष्ट्रीय एकता और भारत के भविष्य की एक व्यापक तस्वीर प्रस्तुत की जानी चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री और उनकी भाषण तैयार करने वाली टीम से इस शब्दावली पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया, इसे राष्ट्रीय अवसर की गरिमा से जोड़ते हुए कहा कि शब्दों का चयन व्यापक सामाजिक प्रभाव को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। उन्होंने अपने संदेश को 'जय हिंद, जय भारत। जय अधिवक्ता समाज।' के साथ समाप्त किया।
