निजी अस्पतालों के बेतहाशा खर्च पर संसदीय समिति चिंतित, पारदर्शिता की मांग
संसदीय समिति ने सरकारी और निजी अस्पतालों के इलाज के खर्च में भारी अंतर पर चिंता जताई है। रिपोर्ट में मरीजों की सुरक्षा और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई अहम सिफारिशें की गई हैं।

द क्लिफ न्यूज़ | नई दिल्ली | 13 अगस्त 2026
देश के निजी अस्पतालों में इलाज के अत्यधिक बढ़ते खर्च और अलग-अलग शुल्क लिए जाने की प्रथा पर संसद की स्वास्थ्य संबंधी स्थायी समिति ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। अगस्त 2026 में पेश की गई समिति की एक रिपोर्ट में सरकारी और निजी अस्पतालों के बीच इलाज की लागत में बड़े अंतर को उजागर किया गया है। समिति ने स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने और मरीजों के आर्थिक हितों की सुरक्षा पर विशेष जोर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज और उनके परिवार पहले से ही मानसिक और शारीरिक तनाव से गुजर रहे होते हैं, ऐसे में इलाज के दौरान अस्पष्ट और अप्रत्याशित बिल उनकी परेशानी को और बढ़ा देते हैं।
रिपोर्ट में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार, सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने का औसत खर्च लगभग 6,631 रुपये है, जबकि निजी अस्पतालों में यही औसत खर्च बढ़कर करीब 50,508 रुपये तक पहुंच जाता है। सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच यह बड़ा अंतर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और उसकी वहनीयता पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाता है। समिति ने स्वीकार किया कि निजी अस्पतालों में अत्याधुनिक सुविधाएं, बेहतर बुनियादी ढांचा, विशेषज्ञ डॉक्टर, नर्सिंग सेवाएं और अन्य उन्नत व्यवस्थाएं उपलब्ध होती हैं, लेकिन इन सुविधाओं की कीमत मरीजों पर किस हद तक डाली जा रही है, इसकी निगरानी और पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है।
इलाज की लागत में भारी अंतर
रिपोर्ट में सामान्य प्रसव के खर्च का उदाहरण भी शामिल किया गया है। सरकारी अस्पतालों में सामान्य डिलीवरी का औसत खर्च लगभग 2,299 रुपये आंका गया है, जबकि निजी अस्पतालों में यही प्रक्रिया करीब 37,630 रुपये में पूरी हो सकती है। सामान्य प्रसव जैसी साधारण प्रक्रिया में भी दोनों क्षेत्रों के बीच लागत का यह बड़ा अंतर ध्यान देने योग्य है। समिति का मानना है कि इस तरह के अंतर को केवल अस्पताल की सुविधाओं और सेवा की गुणवत्ता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि शुल्क निर्धारण की प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने की तत्काल आवश्यकता है।
निजी अस्पतालों में इलाज के खर्च का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कमरे के किराए से जुड़ा होता है। समिति ने विशेष रूप से महानगरों के निजी अस्पतालों में कमरे के किराए को लेकर गहरी चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ निजी अस्पतालों में कमरे का किराया आसपास के थ्री-स्टार होटलों के कमरों से भी अधिक हो सकता है। हालांकि अस्पताल का कमरा और होटल का कमरा अपनी-अपनी सेवाओं में भिन्नता रखते हैं, समिति का मत है कि अस्पतालों में कमरे के शुल्क को पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ना मरीजों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालता है।
समिति ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि कमरे की श्रेणी बदलने से इलाज के कुल खर्च में कितना बड़ा अंतर आ जाता है। कई अस्पतालों में मरीज के जनरल वार्ड से प्राइवेट या डीलक्स कमरे में स्थानांतरित होने के बाद इलाज का पैकेज काफी बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में, जब बीमारी, डॉक्टर की प्रक्रिया, दवाएं और चिकित्सकीय उपचार समान ही रहता है, तब भी कुल बिल में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई दे सकता है। समिति ने इस तरह की व्यवस्थाओं को अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है।
स्पष्ट अनुमानित बिलिंग की मांग
मरीजों के लिए सबसे बड़ी दुविधा यह होती है कि इलाज शुरू होने से पहले उन्हें कुल संभावित खर्च का कोई स्पष्ट अनुमान नहीं दिया जाता। अस्पताल में भर्ती होने के बाद जांच, दवाएं, डॉक्टर की फीस, कमरे का किराया, नर्सिंग शुल्क, उपकरण, प्रक्रिया शुल्क और अन्य विभिन्न मदों को जोड़कर अंतिम बिल अक्सर प्रारंभिक अनुमान से काफी अधिक निकलता है। इस समस्या के समाधान के लिए समिति ने सुझाव दिया है कि बड़े या जटिल उपचार शुरू करने से पूर्व, मरीज या उसके परिजनों को संभावित कुल खर्च का एक लिखित अनुमान पत्र प्रदान किया जाना चाहिए।
इस व्यवस्था के लागू होने से मरीजों और उनके परिवारों को उपचार के आर्थिक पहलुओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी। यदि उपचार के दौरान किसी भी कारण से अनुमानित खर्च में महत्वपूर्ण बदलाव आता है, तो इसकी सूचना तुरंत मरीज या उसके परिजनों को दी जानी चाहिए। इससे अस्पताल और मरीज के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों की संभावना भी काफी हद तक कम हो सकती है।
किराए की सीमा और दवाओं पर मार्जिन
समिति ने महानगरों में निजी अस्पतालों के कमरे के किराए को लेकर एक महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया है। इसके अनुसार, अस्पतालों में कमरों का बुनियादी किराया संबंधित क्षेत्र में स्थित थ्री-स्टार होटलों के औसत किराए से अधिक नहीं होना चाहिए। इस सुझाव का मुख्य उद्देश्य अस्पतालों में कमरे के शुल्क को एक तर्कसंगत सीमा के भीतर रखना और मरीजों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ को कम करना है।
हालांकि, अस्पतालों में कमरे के किराए को निर्धारित करने में कई जटिल कारक शामिल होते हैं। अस्पताल का बुनियादी ढांचा, अत्याधुनिक मेडिकल उपकरण, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, आपातकालीन सेवाएं, संक्रमण नियंत्रण प्रणाली, ऑक्सीजन आपूर्ति और अन्य आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं होटलों से काफी भिन्न होती हैं। ऐसे में, किसी भी कैपिंग (सीमा निर्धारण) व्यवस्था को लागू करने से पहले इन सभी पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श आवश्यक होगा। फिर भी, समिति का यह सुझाव स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि अस्पतालों में कमरे के किराए को लेकर एक स्पष्ट नियामक व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
समिति ने दवाओं और मेडिकल उपकरणों की कीमतों को लेकर भी महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अस्पतालों द्वारा दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की खरीद लागत तथा मरीज से वसूली जाने वाली अंतिम कीमत के बीच 20 प्रतिशत से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। इसका प्रमुख उद्देश्य अस्पतालों द्वारा दवाओं और उपकरणों पर अत्यधिक लाभ मार्जिन को सीमित करना है।
अस्पताल में भर्ती मरीज अक्सर ऐसी स्थिति में होता है कि वह डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाओं और अस्पताल द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री की बाजार में अन्य दुकानों से आसानी से तुलना नहीं कर पाता। आपातकालीन परिस्थितियों में, परिवार के पास विकल्पों की संख्या अक्सर सीमित हो जाती है। ऐसे में, दवाओं और उपकरणों की कीमतों में अत्यधिक अंतर मरीज के लिए एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकता है। समिति का यह सुझाव इसी समस्या को नियंत्रित करने की दिशा में एक प्रभावी कदम के रूप में देखा जा रहा है।
वित्तीय सलाहकार और बिलिंग में पारदर्शिता
रिपोर्ट में अस्पतालों में वित्तीय सलाहकारों की नियुक्ति का सुझाव भी दिया गया है। ऐसे सलाहकार मरीजों और उनके परिजनों को इलाज की अनुमानित लागत, बीमा कवर, उपलब्ध वित्तीय विकल्प और अस्पताल के जटिल बिल को समझने में सहायता प्रदान कर सकते हैं। विशेष रूप से गंभीर बीमारियों या लंबे समय तक चलने वाले उपचारों में, परिवारों को न केवल चिकित्सा निर्णय लेने होते हैं, बल्कि महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णय भी लेने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में, एक स्वतंत्र और स्पष्ट वित्तीय मार्गदर्शन प्रणाली अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है।
स्वास्थ्य बीमा होने के बावजूद, कई मरीजों को इलाज के दौरान अपनी जेब से बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। बीमा पॉलिसी में शामिल और बाहर रखी गई सेवाएं, कमरे की सीमा, सह-भुगतान, गैर-कवर्ड वस्तुएं और अन्य जटिल शर्तें मरीजों के लिए अक्सर भ्रम का कारण बनती हैं। वित्तीय सलाहकार इन सभी जानकारियों को सरल भाषा में समझाने में मदद कर सकते हैं। इससे मरीज उपचार शुरू करने से पहले अपनी वित्तीय स्थिति के अनुसार अधिक सूचित निर्णय ले सकेगा।
निजी अस्पतालों द्वारा लिए जाने वाले खर्च में अंतर केवल बड़े महानगरों तक सीमित समस्या नहीं है। देश के अन्य शहरों और कस्बों में भी निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता बढ़ी है। सरकारी अस्पतालों में अधिक भीड़, विशेषज्ञ सेवाओं की सीमित उपलब्धता या लंबी प्रतीक्षा अवधि के कारण कई परिवार निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। ऐसे में, निजी स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत सीधे तौर पर परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है। मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए गंभीर बीमारियों का इलाज अक्सर वर्षों की बचत को समाप्त कर सकता है। कैंसर, हृदय रोग, गंभीर दुर्घटनाएं, किडनी संबंधी बीमारियां या लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने जैसी स्थितियां खर्च को तेजी से बढ़ा सकती हैं। इसलिए, उपचार की शुरुआत से पहले संभावित लागत की स्पष्ट जानकारी और बिलिंग में पूर्ण पारदर्शिता मरीज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
समिति की चिंता का एक प्रमुख पहलू यह भी है कि मरीज को अस्पताल की सेवाओं और उनसे जुड़े शुल्कों की पूरी जानकारी होनी चाहिए। अस्पतालों में विभिन्न सेवाओं के लिए निर्धारित शुल्क स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किए जा सकते हैं। साथ ही, मरीज को यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कमरे के किराए में कौन-कौन सी सेवाएं शामिल हैं और किन अतिरिक्त सेवाओं के लिए भुगतान करना होगा। इसी प्रकार, अस्पताल से छुट्टी के समय मरीज को एक विस्तृत और आसानी से समझने योग्य बिल प्रदान किया जाना चाहिए। बिल में दवाओं, जांचों, डॉक्टर की फीस, कमरे के शुल्क, प्रक्रिया शुल्क और अन्य सेवाओं का अलग-अलग विवरण होना चाहिए। इससे मरीज यह समझ पाएगा कि कुल राशि किन-किन मदों पर व्यय हुई है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में पारदर्शिता को बढ़ाने के उद्देश्य से, अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था को डिजिटल और मानकीकृत करने पर भी विचार किया जा सकता है। यदि विभिन्न अस्पतालों में समान सेवाओं के लिए शुल्क की तुलना करना आसान हो, तो मरीज अपने उपचार के विकल्पों पर अधिक जानकारी के साथ निर्णय ले सकेंगे।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि निजी अस्पताल स्वास्थ्य प्रणाली का एक अभिन्न अंग हैं और वे अत्याधुनिक तकनीक तथा विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करते हैं। इसलिए, उद्देश्य केवल निजी अस्पतालों पर अनुचित नियंत्रण लगाना नहीं होना चाहिए, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना होना चाहिए जिसमें अस्पतालों को उचित लागत पर गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध कराने का अवसर मिले और साथ ही मरीजों को अनुचित शुल्कों से सुरक्षा भी प्राप्त हो सके।
समिति की सिफारिशों के प्रभावी कार्यान्वयन की स्थिति में, अस्पतालों को अपनी शुल्क संरचना, बिलिंग व्यवस्था और मरीजों को प्रदान की जाने वाली वित्तीय जानकारी में महत्वपूर्ण बदलाव करने पड़ सकते हैं। इसके लिए केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर स्पष्ट नियमों, प्रभावी निगरानी तंत्र और एक सुदृढ़ शिकायत निवारण व्यवस्था की आवश्यकता होगी। मरीजों के लिए भी यह आवश्यक है कि वे इलाज शुरू कराने से पूर्व उपलब्ध विकल्पों, अनुमानित खर्च और अपने बीमा कवरेज की पूरी जानकारी प्राप्त करें। हालांकि आपातकालीन स्थितियों में यह हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन नियोजित उपचारों में परिवार को अस्पताल से लिखित अनुमान मांगने और बिल की जानकारी को समझने का पूरा अधिकार होना चाहिए।
संसदीय समिति की इस रिपोर्ट ने निजी स्वास्थ्य सेवाओं में लागत के भारी अंतर को पुनः एक बार राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सरकारी और निजी अस्पतालों के बीच भर्ती होने और सामान्य प्रसव जैसे उपचारों की लागत में इतना बड़ा अंतर यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता और पारदर्शिता पर एक व्यापक राष्ट्रीय नीति की तत्काल आवश्यकता है। अंततः, स्वास्थ्य सेवा केवल एक व्यावसायिक सेवा नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन और सुरक्षा से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। अस्पतालों को अपनी सुविधाओं और विशेषज्ञ सेवाओं के लिए उचित शुल्क लेने का अधिकार अवश्य है, लेकिन मरीज को इलाज के नाम पर अनिश्चित और अत्यधिक आर्थिक बोझ से बचाना भी व्यवस्था की एक प्राथमिक जिम्मेदारी है। कमरे के किराए की सीमा निर्धारण, अनुमानित उपचार लागत की लिखित जानकारी, दवाओं और उपकरणों पर सीमित मार्जिन तथा वित्तीय सलाहकार जैसी सिफारिशें इसी दिशा में महत्वपूर्ण और ठोस कदम साबित हो सकती हैं। यदि इन सुझावों को प्रभावी निगरानी और स्पष्ट नियमों के साथ लागू किया जाता है, तो मरीजों को इलाज शुरू होने से पहले अपने संभावित खर्च का बेहतर अंदाजा मिल सकेगा और अस्पताल की बिलिंग व्यवस्था में भी पारदर्शिता आ सकती है। इससे न केवल स्वास्थ्य सेवाओं में मरीजों का विश्वास मजबूत होगा, बल्कि इलाज को अधिक वहनीय और जवाबदेह बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति होगी।
