नर्मदापुरम में महिलाओं ने संतान सप्तमी मनाई, दीर्घायु की कामना
भाद्रपद मास की सप्तमी पर नर्मदापुरम की महिलाओं ने संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखकर शिव-पार्वती और सूर्य देव की पूजा-अर्चना की।

नर्मदापुरम | संवाददाता: सुयश मिश्रा
द क्लिफ न्यूज़ | नर्मदापुरम | 18 सितंबर 2026
नर्मदापुरम में भाद्रपद मास की सप्तमी तिथि पर महिलाओं ने बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ संतान सप्तमी का पर्व मनाया। इस अवसर पर विवाहित महिलाओं ने दिनभर अन्न-जल का त्याग कर व्रत रखा और विधि-विधान से भगवान शिव, माता पार्वती तथा भगवान सूर्य की पूजा-अर्चना की। महिलाओं ने अपनी संतान के सुखद भविष्य, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए विशेष प्रार्थना की।
इस धार्मिक अनुष्ठान का उत्साह नर्मदापुरम के गौर कॉलोनी स्थित गणेश पंडाल में देखने को मिला, जहाँ अनेक महिलाओं ने एकत्र होकर पूजा-अर्चना की और धार्मिक रस्में निभाईं। पर्व को लेकर महिलाओं में विशेष उल्लास का माहौल था।
संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना
पर्व के महत्व को बताते हुए स्थानीय निवासी निर्मला राठौर ने बताया कि संतान सप्तमी के दिन भगवान सूर्य, माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करने की प्राचीन धार्मिक परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पूर्ण श्रद्धा से व्रत रखने और पूजन-अर्चना करने से निसंतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है, साथ ही मौजूदा संतानों को दीर्घायु, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
उन्होंने आगे कहा कि इस व्रत के माध्यम से संतान के जीवन में आने वाली बाधाओं और कष्टों के निवारण की भी कामना की जाती है। यही कारण है कि विवाहित महिलाएं पारिवारिक सुख और अपनी संतानों की सुरक्षा की कामना के साथ इस व्रत को अत्यंत निष्ठापूर्वक संपन्न करती हैं। यह पर्व परिवार में सुख-शांति और संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
यह पर्व भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को मनाया जाता है। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत होकर व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद वे शिव-पार्वती और सूर्य देव की मूर्ति या चित्र की स्थापना कर उनका षोडशोपचार विधि से पूजन करती हैं। पूजन में बिल्व पत्र, धूप, दीप, अक्षत, पुष्प, फल और मिष्ठान्न का प्रयोग किया जाता है। संतान सप्तमी के व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान की रक्षा और उनके दीर्घायु की कामना करना है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से न केवल संतान की आयु बढ़ती है, बल्कि उनके जीवन में सुख-समृद्धि भी आती है।
गौर कॉलोनी में आयोजित इस पूजा में कई महिलाओं ने एक साथ भाग लिया, जिससे सामूहिक पूजा का महत्व भी बढ़ा। महिलाओं ने एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दीं और संतान प्राप्ति तथा उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए सामूहिक रूप से प्रार्थना की। गणेश पंडाल को विशेष रूप से सजाया गया था, जहाँ भजन-कीर्तन का भी आयोजन किया गया। इस अवसर पर उपस्थित पंडितों ने व्रत की विधि और महत्व के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि यह व्रत मन की पवित्रता और ईश्वर में अटूट विश्वास का प्रतीक है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को वांछित फल की प्राप्ति होती है।
