नरसिंहगढ़: शिक्षकों ने सीखा कबाड़ से जुगाड़, बनाए नवाचारी शिक्षण उपकरण
नरसिंहगढ़ ब्लॉक के जमुनिया गोपचौहान संकुल में शैक्षिक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहाँ शिक्षकों ने कबाड़ से उपयोगी शिक्षण सामग्री बनाना सीखा।

नरसिंहगढ़ | संवाददाता: महेंद्र शर्मा
द क्लिफ न्यूज़ | नरसिंहगढ़ | 26 सितंबर 2026
नरसिंहगढ़ ब्लॉक के जमुनिया गोपचौहान संकुल में आयोजित एक विशेष शैक्षिक संवाद कार्यक्रम के दौरान, कक्षा छह से आठ तक के शिक्षकों ने शिक्षण अधिगम सामग्री (टीएलएम) निर्माण की कला सीखी। राज्य शिक्षा केंद्र के निर्देशानुसार आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को 'कबाड़ से जुगाड़' के माध्यम से कम खर्च में प्रभावी शिक्षण उपकरण बनाना सिखाना था, ताकि कठिन विषयों को विद्यार्थियों के लिए सरल बनाया जा सके।
कार्यक्रम में संकुल के सभी माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। उन्होंने कागज, धागे और अन्य सामान्य अनुपयोगी वस्तुओं का प्रयोग कर विभिन्न विषयों, जैसे विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और गणित, की जटिल अवधारणाओं को समझाने के लिए उपयोगी सामग्रियां तैयार कीं। शिक्षकों ने इन निर्मित उपकरणों पर अपनी प्रस्तुति भी दी, जिससे उनकी रचनात्मकता और नवाचार की क्षमता का प्रदर्शन हुआ।
प्रयोग आधारित शिक्षा का महत्व
इस शैक्षिक संवाद कार्यक्रम में विशेष अतिथि के तौर पर उपस्थित ब्लॉक अकादमी कोऑर्डिनेटर योगेश कुमार शुक्ला ने शिक्षकों के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि कबाड़ से जुगाड़ पद्धति से तैयार की गई शिक्षण सामग्री न केवल किफायती होती है, बल्कि प्रयोग आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने में भी अत्यंत प्रभावी सिद्ध होती है। शुक्ला ने जोर देकर कहा कि शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों को केवल सामग्री दिखाकर ही संतुष्ट न हों, बल्कि उन्हें इन उपकरणों को स्पर्श करने, अनुभव करने और स्वयं प्रयोग करने का अवसर भी प्रदान करें। इससे बच्चों का अधिगम अनुभव गहरा होगा और वे विषयों को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे।
कक्षा शिक्षण में नवाचार की आवश्यकता
संकुल प्राचार्य अशोक जाटव, बीएसी रामबाबू शर्मा और जन शिक्षक संजू दास बैरागी सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति भी इस कार्यक्रम में उपस्थित रहे। शिक्षकों और शिक्षाधिकारियों ने सामूहिक रूप से इस बात पर सहमति व्यक्त की कि इस तरह के नवाचारी प्रयासों को नियमित रूप से कक्षा शिक्षण में लागू किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि इससे विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता में गुणात्मक सुधार आएगा और वे ज्ञानार्जन के प्रति अधिक प्रेरित होंगे। कार्यक्रम के अंत में सामूहिक चर्चा के माध्यम से भविष्य की कार्ययोजनाओं का निर्धारण किया गया, ताकि इन सीखों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
