नरसिंहगढ़ में 77 साल से जारी रामायण मानस शांति पाठ, नई पीढ़ी को मिल रहे संस्कार
नरसिंहगढ़ में 1949 से संचालित रामायण मानस शांति पाठ नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ रहा है। महंत दीपेंद्र दास खाकी के मार्गदर्शन में बच्चे केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि सेवा, योग और स्वच्छता से भी जुड़ रहे हैं।

द क्लिफ न्यूज़ | नरसिंहगढ़ | 26 जुलाई 2026
नरसिंहगढ़ में परम पूज्य ब्रह्मलीन महंत श्री नंदराम दास जी द्वारा वर्ष 1949 में प्रारंभ की गई रामायण मानस शांति पाठ की परंपरा आज भी उसी श्रद्धा, अनुशासन और भक्ति के साथ निरंतर जारी है। यह आयोजन, जो प्रतिदिन संध्या आरती के उपरांत संपन्न होता है, मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह गया है, बल्कि यह नई पीढ़ी में भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना के संचार का एक सशक्त माध्यम बन गया है।
वर्तमान समय में, जहां अधिकांश युवा पीढ़ी मोबाइल और सोशल मीडिया में अत्यधिक व्यस्त रहती है, वहीं नरसिंहगढ़ का यह शांति पाठ बच्चों को श्रीरामचरितमानस के अध्ययन, भक्ति और संस्कारों के अर्जन में अपना समय व्यतीत करने का अवसर प्रदान कर रहा है। मंदिर के महंत दीपेंद्र दास खाकी ने इस परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के साथ-साथ उनके सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
सर्वांगीण विकास पर केंद्रित गतिविधियां
महंत दीपेंद्र दास खाकी के कुशल नेतृत्व में, बच्चों के विकास को केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं रखा गया है। उनके संपूर्ण विकास के लिए विभिन्न प्रकार की गतिविधियां नियमित रूप से संचालित की जाती हैं। प्रत्येक पखवाड़े एक स्वच्छता अभियान आयोजित किया जाता है, जिसके माध्यम से बच्चों को समाज सेवा का महत्वपूर्ण संदेश दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, खेल गतिविधियों को बढ़ावा देकर उनके शारीरिक विकास को प्रोत्साहित किया जाता है, और योग व प्राणायाम का नियमित अभ्यास उन्हें स्वस्थ एवं अनुशासित जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा देता है। इन गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में सेवा भाव, अनुशासन, आत्मविश्वास और राष्ट्रप्रेम जैसी भावनाएं विकसित की जा रही हैं।
नई पीढ़ी की सहभागिता
रामायण मानस शांति पाठ में मानसी नामदेव, तनिष्का सोलंकी, आरव गुप्ता, केशव गुप्ता, राघव साहू, यश कुशवाहा, कुशल पुष्पद, प्रियांशी साहू, वंशिका साहू, बेटू सोलंकी, कनक गुप्ता, अंश साहू, रुद्र सोलंकी, अनमोल कुशवाहा, काव्या साहू, एनी साहू, मनन शर्मा, अर्जुन गुप्ता, अम्मू गुप्ता सहित अनेक बालक-बालिकाएं नियमित रूप से अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर रहे हैं। उनकी सक्रिय उपस्थिति इस प्राचीन परंपरा को अगली पीढ़ी तक सफलतापूर्वक पहुंचाने का एक जीवंत प्रमाण है।
समाज में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव
स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार, सात दशक से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा समाज में आध्यात्मिक जागरूकता, संस्कारों के आदान-प्रदान और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसे आयोजन बच्चों को न केवल भारतीय संस्कृति से जोड़ते हैं, बल्कि उनमें सेवा, अनुशासन और नैतिक मूल्यों के प्रति भी गहरी आस्था विकसित करते हैं। विश्वास है कि ब्रह्मलीन महंत श्री नंदराम दास जी द्वारा शुरू की गई यह पावन परंपरा भविष्य में भी इसी प्रकार अनवरत जारी रहेगी और आने वाली पीढ़ियों को संस्कार, सेवा और सनातन संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रेरित करती रहेगी।
