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मोहन भागवत का संदेश: एकता, सुरक्षा और पंच परिवर्तन से राष्ट्र निर्माण का आह्वान

नागपुर में विजयादशमी उत्सव पर RSS प्रमुख मोहन भागवत ने विदेशी हस्तक्षेप के प्रति आगाह किया और समाज से एकता, समरसता व पंच परिवर्तन को अपनाने का आग्रह किया।

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मोहन भागवत का संदेश: एकता, सुरक्षा और पंच परिवर्तन से राष्ट्र निर्माण का आह्वान

द क्लिफ न्यूज़ | नागपुर | 20 अक्टूबर 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्थापना दिवस और विजयादशमी के अवसर पर नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देशवासियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता, सुरक्षा और समाज में सकारात्मक बदलाव की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विदेशी हस्तक्षेप की आशंकाओं, सत्ता परिवर्तन की कोशिशों, युवाओं से जुड़ी चुनौतियों और भारतीय सामाजिक मूल्यों के संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया। डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि देश की समस्याओं का स्थायी समाधान केवल सरकार बदलने से नहीं, बल्कि नागरिकों के व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाने से ही संभव है।

अपने संबोधन में डॉ. भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की एकता और सामाजिक स्थिरता को कमजोर करने वाली गतिविधियों के प्रति सजग रहना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में हाल में देखे गए राजनीतिक व सामाजिक अस्थिरता के प्रयासों का उल्लेख किया। सरसंघचालक ने कहा कि भारत में भी ऐसी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने वाली ताकतों से सावधान रहने की आवश्यकता है। उन्होंने इस विचार को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया कि केवल सत्ता या नेतृत्व में बदलाव से किसी राष्ट्र की मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं होता।

लोकतंत्र में जनआंदोलनों की भूमिका और मर्यादा

डॉ. भागवत ने लोकतंत्र में जनआंदोलनों के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा कि सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए आवाज उठाना स्वाभाविक है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आंदोलनों का उद्देश्य समस्याओं का समाधान होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन और अविश्वास पैदा करना। उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व, प्रशासन और आंदोलनकर्ताओं से संविधान, कानून और सार्वजनिक जीवन की मर्यादाओं का पालन करने की अपील की। सरसंघचालक के अनुसार, किसी भी असंतोष का यदि राजनीतिक लाभ या सामाजिक विभाजन के लिए उपयोग किया जाता है, तो यह देश की एकता के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

'पंच परिवर्तन' की अवधारणा पर विशेष बल

समाज में सकारात्मक और स्थायी बदलाव लाने के उद्देश्य से, डॉ. भागवत ने संघ द्वारा प्रस्तुत 'पंच परिवर्तन' की अवधारणा को विशेष महत्व दिया। इस अवधारणा के तहत पांच प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है: सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध एवं स्वदेशी, और नागरिक कर्तव्यों का पालन। उन्होंने इन विषयों को केवल सैद्धांतिक चर्चा या नारे तक सीमित न रखकर, दैनिक जीवन में अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। सामाजिक समरसता के माध्यम से जाति, भाषा, क्षेत्र और अन्य आधारों पर समाज में व्याप्त दूरियों को कम करने तथा सभी नागरिकों के बीच आपसी सम्मान और सौहार्द बढ़ाने का संदेश दिया गया।

कुटुंब प्रबोधन के अंतर्गत, उन्होंने परिवार में संवाद, संस्कारों का महत्व, व्यक्तिगत जिम्मेदारी और आपसी संबंधों को मजबूत बनाने पर जोर दिया। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में, प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार और उपलब्ध संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता रेखांकित की गई। 'स्व-बोध' को अपनी सांस्कृतिक पहचान, गौरवशाली इतिहास और समृद्ध परंपराओं के प्रति जागरूकता के रूप में परिभाषित किया गया। वहीं, 'स्वदेशी' के माध्यम से देश में निर्मित वस्तुओं, स्थानीय उत्पादन और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करने की बात कही गई। नागरिक अनुशासन के तहत, कानून का सम्मान, अपने कर्तव्यों का निर्वहन और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार आचरण को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।

राष्ट्रीय एकता और विविधता को शक्ति के रूप में देखना

राष्ट्रीय एकता के विषय पर बोलते हुए, सरसंघचालक ने भारत की अद्भुत विविधता को उसकी सबसे बड़ी शक्ति के रूप में देखने की आवश्यकता बताई। भारत विभिन्न धर्मों, भाषाओं, जातीय समुदायों, खान-पान की परंपराओं और सांस्कृतिक मान्यताओं का देश है। इन विविधताओं के बावजूद, उन्होंने साझा राष्ट्रीय भावना को मजबूत बनाए रखने पर बल दिया। डॉ. भागवत ने विविधताओं के प्रति सम्मान और आपसी सौहार्द को देश की अखंडता के लिए अपरिहार्य बताया। उनका स्पष्ट संदेश था कि एक मजबूत और सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के बीच गहरा भावनात्मक जुड़ाव और अटूट परस्पर विश्वास नितांत आवश्यक है।

युवाओं से जुड़ी चुनौतियां और समाधान

युवा पीढ़ी से जुड़े मुद्दे भी डॉ. भागवत के संबोधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे। उन्होंने नई पीढ़ी को उचित और अनुचित के बीच स्पष्ट अंतर समझने, जिम्मेदार व्यवहार अपनाने और सामाजिक चुनौतियों के समाधान में सक्रिय योगदान देने की आवश्यकता पर बल दिया। नशीले पदार्थों के बढ़ते प्रचलन जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए उन्होंने परिवार, समाज और संबंधित संस्थाओं की सामूहिक और सक्रिय भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। इसके अतिरिक्त, डिजिटल माध्यमों और ओटीटी प्लेटफार्मों पर उपलब्ध सामग्री की गुणवत्ता और प्रभाव को लेकर भी उन्होंने चिंता व्यक्त की और इस संबंध में उचित नियमन की आवश्यकता का विषय उठाया। इन सभी मुद्दों को उन्होंने युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण तथा सामाजिक वातावरण को सकारात्मक दिशा देने से जोड़ा।

संघ की आगामी सामाजिक प्राथमिकताएं

संघ के शताब्दी वर्ष के समापन से जुड़े इस विजयादशमी उत्सव में डॉ. भागवत का संबोधन संगठन की आगामी सामाजिक प्राथमिकताओं और राष्ट्रीय दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से रेखांकित करने वाला रहा। उन्होंने सेवा, राष्ट्र निर्माण, आत्मनिर्भरता और सामाजिक एकता को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्थापना दिवस पर स्वयंसेवकों को शुभकामनाएं देते हुए संघ के सेवा, राष्ट्र निर्माण और सामाजिक समरसता जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में योगदान का विशेष उल्लेख किया।

समग्र रूप से, डॉ. मोहन भागवत के संबोधन का केंद्रीय संदेश यह रहा कि राष्ट्र की शक्ति और समृद्धि केवल राजनीतिक नेतृत्व या सरकारी नीतियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह नागरिकों के व्यक्तिगत आचरण, सामाजिक सद्भाव, पारिवारिक संस्कारों और सामूहिक जिम्मेदारी पर भी बहुत हद तक आधारित होती है। उनके विचारों के अनुसार, 'पंच परिवर्तन' को व्यवहार में उतारकर समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है, जिससे देश की एकता और स्थिरता को और अधिक सुदृढ़ किया जा सकेगा।

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