मध्य प्रदेश में सीमेंट-मुक्त सड़कों का सपना साकार, जियोपॉलिमर तकनीक से निर्माण की तैयारी
मध्य प्रदेश सरकार पारंपरिक सीमेंट के स्थान पर फ्लाई ऐश से बनने वाली जियोपॉलिमर कंक्रीट तकनीक से सड़क निर्माण की तैयारी में है। यह पर्यावरण के लिए बेहतर साबित हो सकती है।

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 3 सितंबर 2026
मध्य प्रदेश सड़क निर्माण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय बदलाव की ओर अग्रसर है। राज्य सरकार अब पारंपरिक सीमेंट-आधारित कंक्रीट के स्थान पर जियोपॉलिमर कंक्रीट तकनीक को अपनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। इस महत्वाकांक्षी पहल के तहत, राज्य सरकार जल्द ही भोपाल स्थित वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की एक प्रमुख प्रयोगशाला, CSIR-AMPRI (एडवांस्ड मैटेरियल्स एंड प्रोसेसेज रिसर्च इंस्टीट्यूट) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करेगी। इस तकनीक से न केवल औद्योगिक अपशिष्ट का बेहतर प्रबंधन होगा, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी और जल संरक्षण में भी मदद मिलेगी।
यह नई तकनीक सड़क निर्माण में सीमेंट के प्रयोग को पूरी तरह समाप्त कर देगी। इसके बजाय, बिजली संयंत्रों से निकलने वाली फ्लाई ऐश (coal ash) और अन्य औद्योगिक उप-उत्पादों का उपयोग एक विशेष प्रकार के बाइंडर के रूप में किया जाएगा। सीमेंट का उत्पादन एक ऊर्जा-गहन प्रक्रिया है, जो बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करती है। जियोपॉलिमर कंक्रीट में, सीमेंट की जगह फ्लाई ऐश जैसे पॉजोलैनिक पदार्थों को विशेष रासायनिक सक्रियकों के साथ मिलाकर एक मजबूत बाइंडर तैयार किया जाता है। मध्य प्रदेश जैसे राज्य के लिए यह तकनीक विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहाँ बिजली उत्पादन से बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश का उत्पादन होता है, जिसे अब तक एक अपशिष्ट माना जाता रहा है।
कार्बन उत्सर्जन में 83% तक कमी का दावा
जियोपॉलिमर कंक्रीट तकनीक का सबसे बड़ा पर्यावरणीय लाभ इसका अत्यंत कम कार्बन फुटप्रिंट है। विभिन्न अध्ययनों और उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस तकनीक से पारंपरिक सीमेंट-आधारित कंक्रीट की तुलना में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 83 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है। यदि इस पर्यावरण-अनुकूल तकनीक को बड़े पैमाने पर राज्य के सड़क निर्माण परियोजनाओं में अपनाया जाता है, तो यह न केवल राज्य के बुनियादी ढांचे के विकास को गति देगा, बल्कि उसके महत्वाकांक्षी पर्यावरण संरक्षण लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस प्रकार की कम-कार्बन निर्माण सामग्री का उपयोग राज्य के समग्र कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में एक युगांतरकारी कदम साबित हो सकता है।
जल-आधारित तराई की नहीं होगी आवश्यकता
जियोपॉलिमर कंक्रीट की एक और उल्लेखनीय विशेषता इसके क्योरिंग (मजबूती विकसित करने की प्रक्रिया) से संबंधित है। पारंपरिक कंक्रीट को मजबूती प्रदान करने के लिए नियमित रूप से पानी से तराई (water curing) की आवश्यकता होती है, जो बड़ी मात्रा में जल संसाधनों का उपभोग करती है। इसके विपरीत, प्रस्तावित जियोपॉलिमर कंक्रीट तकनीक में इस प्रकार की पारंपरिक जल-आधारित क्योरिंग की कोई आवश्यकता नहीं होती है। यह उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है जहाँ जल संसाधनों पर पहले से ही अत्यधिक दबाव है। सड़क निर्माण जैसी वृहद परियोजनाओं में पानी की खपत में कमी लाकर, निर्माण प्रक्रिया के जल पदचिह्न (water footprint) को भी प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है, जो बढ़ते जल संकट के दौर में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाएगी।
21 दिनों में उच्च संपीड़न शक्ति प्राप्त
प्रस्तावित तकनीक से जुड़ी जानकारी के अनुसार, जियोपॉलिमर कंक्रीट मिश्रण 21 दिनों के भीतर सामान्य कंक्रीट के बराबर उच्च संपीड़न शक्ति (compressive strength) प्राप्त करने में सक्षम है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि मिश्रण का डिज़ाइन, सामग्री की गुणवत्ता और निर्माण प्रक्रिया के मानकों का कड़ाई से पालन किया जाए, तो इस तकनीक से निर्मित सड़कें पारंपरिक सड़कों के समान ही मजबूत और टिकाऊ हो सकती हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सड़क का वास्तविक प्रदर्शन कई स्थानीय कारकों पर निर्भर करेगा, जैसे कि सड़क का डिज़ाइन, यातायात का भार, स्थानीय मिट्टी की प्रकृति, तापमान, आर्द्रता, और उपयोग की जाने वाली फ्लाई ऐश की गुणवत्ता। इसलिए, बड़े पैमाने पर इसके प्रयोग से पहले गहन तकनीकी परीक्षणों और मानकीकरण की आवश्यकता होगी।
CSIR-AMPRI की विशेषज्ञता का मिलेगा लाभ
भोपाल स्थित CSIR-AMPRI, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की एक प्रतिष्ठित अनुसंधान प्रयोगशाला है, जो निर्माण सामग्री, खनिज एवं औद्योगिक अपशिष्ट के उपयोग तथा पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों के क्षेत्र में लंबे समय से अनुसंधान कर रही है। राज्य सरकार और इस संस्थान के बीच प्रस्तावित समझौता ज्ञापन (MoU) के माध्यम से, जियोपॉलिमर तकनीक को प्रयोगशाला स्तर के अनुसंधान से सड़क निर्माण के व्यावहारिक अनुप्रयोग तक ले जाने की राह प्रशस्त होगी। इस सहयोग के अंतर्गत, तकनीकी विशेषज्ञता का आदान-प्रदान, विस्तृत परीक्षण, प्रभावी मिश्रण डिजाइन का विकास, गुणवत्ता नियंत्रण के प्रोटोकॉल की स्थापना और विभिन्न परियोजनाओं में इस तकनीक के सफल कार्यान्वयन जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम किया जाएगा।
औद्योगिक कचरे से विकास की नई दिशा
फ्लाई ऐश का उपयोग निर्माण क्षेत्र में पहले से ही किया जाता रहा है, लेकिन जियोपॉलिमर तकनीक इसके उपयोग को एक नई और अधिक व्यापक दिशा प्रदान करती है। बिजली संयंत्रों से निकलने वाली राख का एक सुरक्षित और उत्पादक उपयोग सुनिश्चित होने से, उसके भंडारण और निपटान से जुड़ी गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान भी संभव हो सकेगा। यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल साबित होती है, तो भविष्य में न केवल सड़कों, बल्कि फुटपाथ, पुलों और अन्य कंक्रीट-आधारित निर्माण परियोजनाओं में भी इसके विस्तार की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। यह औद्योगिक कचरे को मूल्यवान निर्माण सामग्री में बदलने का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करेगा।
निर्माण नीति में हरित क्रांति का सूत्रपात
मध्य प्रदेश सरकार का यह प्रस्ताव सड़क निर्माण को केवल बुनियादी ढांचे के विस्तार के रूप में देखने के बजाय, उसे 'ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर' के साथ जोड़ने की दिशा में एक दूरगामी कदम है। सीमेंट की खपत को कम करना, फ्लाई ऐश जैसे औद्योगिक उप-उत्पादों का अधिकतम उपयोग बढ़ाना, जल संरक्षण को बढ़ावा देना और कार्बन उत्सर्जन को घटाना - ये सभी महत्वपूर्ण लक्ष्य एक ही पर्यावरण-अनुकूल तकनीक के माध्यम से साधने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, किसी भी नई तकनीक की सफलता केवल एक समझौते पर हस्ताक्षर करने से नहीं मिलती। इसके लिए स्पष्ट और सुसंगत तकनीकी मानकों का निर्धारण, कठोर गुणवत्ता नियंत्रण परीक्षण, संबंधित इंजीनियरों और ठेकेदारों का उचित प्रशिक्षण, तथा विभिन्न भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों में पायलट प्रोजेक्ट्स का सफल संचालन अत्यंत आवश्यक होगा।
यदि मध्य प्रदेश में जियोपॉलिमर कंक्रीट तकनीक तकनीकी और व्यावहारिक परीक्षणों में सफल सिद्ध होती है, और इसे राज्य में बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है, तो यह राज्य में सड़क निर्माण के परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल सकती है। सीमेंट की जगह फ्लाई ऐश का उपयोग, पानी की न्यूनतम आवश्यकता, और कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती - ये ऐसे फायदे हैं जो न केवल सतत विकास को बढ़ावा देंगे, बल्कि प्रकृति पर पड़ने वाले भार को भी उल्लेखनीय रूप से कम करेंगे। अब सभी की निगाहें प्रस्तावित MoU पर होंगी, और उसके पश्चात् शुरू होने वाले पायलट प्रोजेक्ट्स पर टिकी रहेंगी। यदि यह तकनीक मजबूती, लागत-प्रभावशीलता, स्थायित्व और निर्माण की गति जैसे महत्वपूर्ण मानकों पर खरी उतरती है, तो मध्य प्रदेश की भावी सड़कें न केवल असाधारण रूप से मजबूत होंगी, बल्कि पर्यावरण के प्रति कहीं अधिक जिम्मेदार और टिकाऊ भी साबित होंगी।
