मध्य प्रदेश: जर्जर भवन, नदी पार कर स्कूल, झोपड़ियों में पढ़ाई, शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल
मध्य प्रदेश के कई जिलों से सरकारी स्कूलों की बदहाल तस्वीरें सामने आ रही हैं। कहीं बच्चे उफनती नदी पार कर स्कूल पहुंच रहे हैं, तो कहीं झोपड़ीनुमा ढांचे और सामुदायिक भवन में कक्षाएं लग रही हैं।

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 9 अगस्त 2026
मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के सरकारी दावों के बीच, विभिन्न जिलों से सामने आ रही जमीनी हकीकतें शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल रही हैं। सागर, सीधी, शहडोल, मंडला, डिंडोरी और राजधानी भोपाल जैसे जिलों से ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जो स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षित भवनों की गंभीर कमी को दर्शाती हैं। कहीं बच्चे जान जोखिम में डालकर उफनती नदी पार करने को मजबूर हैं, तो कहीं जर्जर भवनों के कारण कक्षाओं का संचालन सामुदायिक भवनों, मंचों या अस्थायी झोपड़ीनुमा ढांचों में हो रहा है।
सागर जिले के बेरखेरी कला गांव में बारिश के मौसम में स्कूली बच्चों के लिए स्कूल पहुंचना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। नदी में जलस्तर बढ़ने पर बच्चों को उफनती धारा को पार कर स्कूल जाना पड़ता है, जिससे अभिभावकों की चिंता बढ़ जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे हालात बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं, खासकर जब सुरक्षित आवागमन के साधनों की अनुपलब्धता उनकी शिक्षा को बाधित करती है।
शिक्षकों की जवाबदेही और निगरानी पर प्रश्न
सीधी जिले के सिहावल ब्लॉक से एक सरकारी स्कूल में शिक्षक के शराब के नशे में पाए जाने का मामला सामने आया था, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। स्कूल परिसर में शराब की बोतल मिलने के दावों ने शिक्षा के मंदिर में शिक्षकों की जवाबदेही और विभागीय निगरानी व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाया है। यह घटना बच्चों के लिए अनुशासित और सुरक्षित वातावरण प्रदान करने की प्रणाली की प्रभावशीलता पर सवाल उठाती है, तथा ऐसी शिकायतों पर त्वरित जांच और कार्रवाई की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
जर्जर भवन और अस्थायी समाधान
शहडोल जिले में भी कई सरकारी स्कूलों के भवन जर्जर स्थिति में हैं। इसके कारण बच्चों को या तो सामुदायिक भवनों में पढ़ाया जा रहा है या फिर वैकल्पिक मंचों पर कक्षाओं का संचालन करना पड़ रहा है। इन जर्जर भवनों में बच्चों की सुरक्षा एक बड़ी चिंता का विषय है, खासकर बारिश के मौसम में जब इनकी स्थिति और बिगड़ जाती है। मंडला जिले के घुघरी ब्लॉक में तो बच्चों को झोपड़ीनुमा अस्थायी ढांचे में पढ़ाई करनी पड़ रही है, जो शिक्षा के संसाधनों की कमी को उजागर करता है। ये अस्थायी व्यवस्थाएं न केवल बारिश और खराब मौसम में चुनौती पेश करती हैं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल भवनों और अन्य बुनियादी सुविधाओं की दीर्घकालिक आवश्यकता को भी दर्शाती हैं।
ग्रामीणों के कंधों पर निर्माण का बोझ
डिंडोरी जिले की स्थिति इन सबसे अलग और गंभीर है, जहां एक स्कूल का भवन लगभग तीन वर्ष पहले ढह गया था। नए भवन के निर्माण में देरी के कारण विद्यार्थियों और ग्रामीणों को काफी परेशानी झेलनी पड़ी। अंततः, ग्रामीणों को स्वयं चंदा जुटाकर स्कूल भवन का निर्माण शुरू करना पड़ा। यह स्थिति सरकारी व्यवस्थाओं पर गहरा सवाल उठाती है कि जब बच्चों के लिए स्कूल भवन उपलब्ध कराने की प्राथमिक जिम्मेदारी भी ग्रामीणों को स्वयं उठानी पड़ रही है, तो शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के सरकारी दावों की समीक्षा क्यों न हो?
राजधानी में भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव
राजधानी भोपाल में भी सरकारी स्कूलों की स्थिति चिंताजनक है। कोलार रोड के ओम नगर में स्थित शासकीय नवीन प्राथमिक विद्यालय में लंबे समय तक लगभग 70 बच्चों को केवल एक शिक्षिका द्वारा पढ़ाया जाता रहा। हालांकि हाल ही में एक और शिक्षिका की व्यवस्था की गई है, लेकिन अभी भी पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों को एक ही कमरे में पढ़ना पड़ता है। सीमित स्थान और विद्यार्थियों की अधिक संख्या के कारण शिक्षकों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना और प्रत्येक बच्चे पर व्यक्तिगत ध्यान देना एक बड़ी चुनौती है।
इन स्कूलों में शिक्षकों की कमी के अलावा, पीने के पानी, बिजली और बैठने के लिए टेबल-बेंच जैसी मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है। बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है। स्थानीय लोगों के अनुसार, स्कूल में लंबे समय से बिजली की समस्या है, छत से बारिश का पानी टपकता है, शौचालयों की स्थिति खराब है और भवन की नियमित मरम्मत व रंगाई-पुताई नहीं होती। इन सुविधाओं की कमी के कारण स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या भी घटकर लगभग 60 से 70 रह गई है।
व्यवस्थाओं की पोल खोलती बारिश
मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों से सामने आ रही ये घटनाएं भले ही भिन्न प्रतीत हों, लेकिन इनमें एक समान धागा दिखाई देता है: सरकारी स्कूलों में बुनियादी अधोसंरचना की घोर कमी। सागर में आवागमन की बाधा, सीधी में शिक्षक की जवाबदेही पर सवाल, शहडोल और मंडला में जर्जर और अस्थायी भवन, डिंडोरी में ग्रामीणों द्वारा स्वयं निर्माण, और भोपाल में बिजली-पानी, फर्नीचर व पर्याप्त शिक्षकों की कमी – ये सभी परिस्थितियां बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
बारिश के मौसम ने इन व्यवस्थाओं की कमियों को और भी उजागर कर दिया है। जर्जर छतों से पानी टपकना, नदियों का उफान, अस्थायी ढांचों में कक्षाएं और भवनों की कमी जैसी समस्याएं विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई में बाधा डाल रही हैं। यह आवश्यक है कि सरकार सरकारी स्कूलों में अधोसंरचना सुधार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर जोर देने के अपने वादों को धरातल पर उतारे। इसके लिए स्कूलों का जमीनी स्तर पर गहन निरीक्षण, जर्जर भवनों की तत्काल मरम्मत, भवनविहीन स्कूलों के लिए नए भवनों का निर्माण, पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति, और बिजली, पानी, फर्नीचर तथा सुरक्षित आवागमन जैसी मूलभूत सुविधाओं को प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराना अनिवार्य है। आखिर, स्कूल की इमारतें केवल चार दीवारें नहीं होतीं, बल्कि वे बच्चों के सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य की पहली और सबसे मजबूत नींव होती हैं।
