मध्य प्रदेश: 637 एमएलडी सीवेज नदियों में, 1315 नाले जलस्रोतों को कर रहे प्रदूषित
मध्य प्रदेश के 352 नगरीय निकायों में सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था नहीं है। 1315 नालों से प्रतिदिन 637 एमएलडी गंदा पानी नदियों में मिल रहा है, जिससे जल गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 26 अगस्त 2026
मध्य प्रदेश में सीवेज प्रबंधन की गंभीर समस्या उजागर हुई है, जहाँ राज्य के 1,315 नालों के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 637 मिलियन लीटर (एमएलडी) सीवेज और अनुपचारित गंदा पानी विभिन्न नदियों और जलस्रोतों में प्रवाहित हो रहा है। इस प्रदूषण के कारण नर्मदा, क्षिप्रा और चंबल जैसी प्रदेश की प्रमुख नदियाँ भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं, जिससे जल की गुणवत्ता, जलीय पारिस्थितिकी और जन स्वास्थ्य पर खतरा मंडराने लगा है।
राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में कुल 413 नगरीय निकाय हैं, जिनमें से 352 नगरीय निकायों में सीवेज ट्रीटमेंट की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। इन नगरीय क्षेत्रों से निकलने वाला सीवेज बिना उपचार के सीधे नालों के माध्यम से जलस्रोतों तक पहुँच रहा है। यह स्थिति इन जलस्रोतों के पारिस्थितिकी तंत्र को धीरे-धीरे नष्ट कर रही है और पानी की गुणवत्ता में गिरावट ला रही है, जो अंततः पेयजल आपूर्ति को भी प्रभावित कर सकती है।
सीवेज उपचार क्षमता में भारी कमी
जिन 61 नगरीय निकायों में सीवेज प्रबंधन की व्यवस्था मौजूद है, वहाँ भी स्थिति शत-प्रतिशत संतोषजनक नहीं है। इन निकायों से प्रतिदिन लगभग 2,075.86 एमएलडी सीवेज उत्पन्न होता है, जबकि उपचार की कुल क्षमता मात्र 1,117.49 एमएलडी है। इस प्रकार, सीवेज उत्पादन और उसके उपचार की क्षमता के बीच एक बड़ा अंतर लगभग 958.37 एमएलडी का बना हुआ है। यह अंतर सीवेज के अनुपचारित रूप से जलस्रोतों में मिलने का एक प्रमुख कारण है।
इसके अतिरिक्त, प्रदेश में सीवर नेटवर्क का विस्तार भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। 12,67,626 से अधिक घर अभी भी मुख्य सीवर लाइन से नहीं जुड़े हैं, जिसका अर्थ है कि इन घरों से निकलने वाला गंदा पानी भी एक व्यवस्थित सीवेज प्रणाली से नहीं गुजरता और संभवतः सीधे पर्यावरण में मिल जाता है। इस कारण सीवेज प्रबंधन की समस्या और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि अनुपचारित घरेलू अपशिष्ट सीधे जल निकायों में मिल सकता है।
पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ
समग्र प्रदेश में सीवेज ट्रीटमेंट की कुल क्षमता और वास्तविक आवश्यकता के बीच लगभग 1,542.18 एमएलडी का अंतर आंका गया है। यह एक चिंताजनक आंकड़ा है, जो प्रदेश के नगरीय क्षेत्रों से निकलने वाले कुल सीवेज की तुलना में उपचारित किए जा सकने वाले सीवेज की मात्रा में भारी कमी को दर्शाता है। इस कमी को पूरा करने के लिए करीब 736 एमएलडी क्षमता के नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्थापित करने का प्रस्ताव है। हालांकि, इन प्रस्तावों के क्रियान्वयन में लगने वाला समय, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रियाएं और आवश्यक वित्तीय संसाधन एक अलग चुनौती पेश करते हैं। समयबद्ध तरीके से इन एसटीपी का निर्माण न होने पर, समस्या जस की तस बनी रहेगी।
उन 352 नगरीय निकायों की स्थिति सबसे चिंताजनक है जहाँ सीवेज ट्रीटमेंट की कोई व्यवस्था ही नहीं है। इन क्षेत्रों से प्रतिदिन लगभग 584.81 एमएलडी सीवेज निकलने का अनुमान है। इन जगहों पर बुनियादी सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव सीधे तौर पर नदियों और अन्य जल निकायों पर अत्यधिक दबाव डाल रहा है, जिससे प्रदूषण का स्तर खतरनाक दर से बढ़ रहा है। बिना किसी उपचार के यह सीवेज जलस्रोतों में मिलकर उन्हें केवल प्रदूषित ही नहीं करता, बल्कि जलीय जीवन के लिए भी घातक सिद्ध हो रहा है।
प्रमुख नदियों पर बढ़ता दबाव
मध्य प्रदेश की जीवन रेखा मानी जाने वाली नर्मदा, तथा धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षिप्रा और चंबल नदियाँ भी इस सीवेज प्रदूषण से अछूती नहीं हैं। नालों के माध्यम से लगातार अनुपचारित सीवेज का इन नदियों में मिलना न केवल जल की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है, बल्कि नदी तंत्र के जैव विविधता और पारिस्थितिकी पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। जलीय जीवों के जीवन पर संकट मंडराने लगा है और नदी आधारित पारिस्थितिकी तंत्र के बिगड़ने का खतरा बढ़ गया है। नदियों में घुलित ऑक्सीजन का स्तर कम होने से मछलियाँ मरने लगती हैं, और अन्य जलीय जीव भी प्रभावित होते हैं।
यह सीवेज प्रदूषण केवल जलीय जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पेयजल स्रोतों को भी दूषित करता है। नदियों का पानी पीने और सिंचाई के लिए इस्तेमाल होता है, और यदि यह पानी अनुपचारित सीवेज से प्रदूषित हो जाए, तो यह मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर बीमारियों जैसे डायरिया, टाइफाइड और अन्य जलजनित रोगों का कारण बन सकता है। इस प्रकार, सीवेज प्रबंधन की समस्या का सीधा संबंध सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।
आगे की राह: सत्यापन और समाधान
सीवेज प्रबंधन से जुड़े इन आंकड़ों की जमीनी हकीकत को जानने के लिए सत्यापन की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है। जिला स्तर पर वास्तविक स्थिति का गहन सर्वेक्षण और मौजूदा सीवेज ढांचे का सटीक आकलन महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करेगा कि उपलब्ध आंकड़े सही हैं और समस्या की भयावहता का सही अनुमान लगाया जा सके। इसके बाद, समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी रणनीतियाँ बनाई जा सकती हैं।
इन समस्याओं के समाधान के लिए नालों को सीधे जलस्रोतों में गिरने से रोकना, सीवर नेटवर्क का विस्तार करना, और मौजूदा एसटीपी की क्षमता को बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। नालों को सीधे नदियों में मिलने से रोकने के लिए, उनके प्रवाह को डायवर्ट कर उपचार संयंत्रों तक पहुँचाना होगा। सीवर नेटवर्क के विस्तार से अधिक से अधिक घरों को व्यवस्थित सीवेज प्रणाली से जोड़ा जा सकेगा, जिससे घरेलू अपशिष्ट का समुचित प्रबंधन हो पाएगा। साथ ही, मौजूदा एसटीपी की क्षमता को बढ़ाना भी एक महत्वपूर्ण कदम होगा ताकि उत्पन्न होने वाले सीवेज का अधिकतम उपचार सुनिश्चित किया जा सके।
प्रदेश में प्रतिदिन 63.7 करोड़ लीटर से अधिक गंदे पानी का नालों के माध्यम से नदियों और जलस्रोतों में बहना एक गंभीर संकट की ओर इशारा करता है। यह न केवल पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ जल की उपलब्धता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। जलस्रोतों के संरक्षण और उन्हें प्रदूषण मुक्त बनाए रखने के लिए, सीवेज उपचार क्षमता में वृद्धि, घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ना, तथा सीवेज प्रवाह को प्रभावी ढंग से उपचार संयंत्रों तक पहुंचाना एक बड़ी और तत्काल चुनौती है, जिस पर सरकार और संबंधित निकायों को मिलकर, प्रभावी और त्वरित कार्रवाई करनी होगी। यह एक दीर्घकालिक योजना की मांग करता है, जिसमें जन जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी भी आवश्यक है।
