मध्य प्रदेश: 15 लाख बच्चे स्कूल से बाहर, 63% 12वीं तक ड्रॉपआउट
मध्य प्रदेश में लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। 15 लाख से अधिक बच्चे स्कूल से बाहर हैं, जबकि 12 लाख शिक्षा की मुख्यधारा से दूर हैं। 12वीं कक्षा तक 63% ड्रॉपआउट दर चिंताजनक है।

द क्लिफ न्यूज़ | भोपाल | 4 सितंबर 2026
मध्य प्रदेश में स्कूली शिक्षा व्यवस्था एक गंभीर संकट का सामना कर रही है, जहां बच्चों को स्कूल में बनाए रखने और उन्हें लगातार शिक्षा प्रदान करने की चुनौती विकराल रूप धारण कर चुकी है। नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, पिछले वर्ष प्रदेश में 15 लाख से अधिक बच्चे स्कूल से बाहर रहे, जबकि वर्तमान में लगभग 12 लाख बच्चे शिक्षा की मुख्यधारा से वंचित हैं। यह स्थिति न केवल नामांकन बढ़ाने के प्रयासों पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि प्रवेश के बाद भी बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखना कितना कठिन है।
चिंताजनक बात यह है कि जो बच्चे स्कूल में प्रवेश लेते भी हैं, उनमें से एक बड़ी संख्या माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते शिक्षा छोड़ देती है। रिपोर्टों में यह सामने आया है कि 12वीं कक्षा तक आते-आते करीब 63 प्रतिशत बच्चे स्कूल की मुख्यधारा से बाहर हो जाते हैं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो इसका दूरगामी प्रभाव न केवल युवाओं के कौशल और रोजगार पर पड़ेगा, बल्कि प्रदेश के सामाजिक-आर्थिक विकास पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ेगा।
कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का विलय और बंदी बढ़ी समस्या
प्रदेश में कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के विलय और बंदी की प्रक्रिया बच्चों की स्कूल तक पहुंच में एक बड़ी बाधा साबित हो रही है। विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में, जहां प्राथमिक या माध्यमिक विद्यालय को किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित कर दिया जाता है, वहां छोटे बच्चों के लिए दैनिक रूप से स्कूल पहुंचना अत्यंत दुष्कर हो जाता है।
भले ही स्कूल का भवन बंद हो जाए, लेकिन बच्चों और शिक्षा के बीच की दूरी कम नहीं होती। कई परिवारों के लिए, बच्चों को दूर स्थित विद्यालय तक रोज भेजना न केवल अतिरिक्त समय की मांग करता है, बल्कि परिवहन का खर्च भी बढ़ाता है। ऐसे में, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के स्कूल छोड़ने का खतरा और भी बढ़ जाता है, क्योंकि वे इस अतिरिक्त बोझ को उठाने में सक्षम नहीं होते।
दो किलोमीटर से अधिक की दूरी बन रही है अवरोध
कई क्षेत्रों में बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए दो किलोमीटर या उससे अधिक की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। यह दूरी, विशेषकर छोटे बच्चों के लिए, एक बड़ी चुनौती पेश करती है। बरसात, अत्यधिक गर्मी और खराब सड़क जैसी परिस्थितियां इस समस्या को और भी गंभीर बना देती हैं।
जहां सार्वजनिक परिवहन की सुविधा सीमित है, वहां परिवारों को अक्सर बच्चों की पढ़ाई और अपनी रोजमर्रा की आर्थिक जरूरतों के बीच किसी एक को प्राथमिकता देने की कठिन स्थिति का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में, जहां आजीविका के साधन सीमित हैं, स्कूल की दूरी शिक्षा जारी रखने में एक महत्वपूर्ण निर्णायक कारक बन जाती है।
आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारियां भी हैं मुख्य कारण
स्कूल ड्रॉपआउट का कारण केवल स्कूल की दूरी तक ही सीमित नहीं है। परिवार की आर्थिक स्थिति भी बच्चों की शिक्षा पर गहरा प्रभाव डालती है। कम आय वाले परिवारों में, बच्चों को अक्सर घरेलू कामों, कृषि कार्यों या अन्य आर्थिक गतिविधियों में हाथ बंटाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
शिक्षा से जुड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खर्चे भी परिवारों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करते हैं। किताबों, यूनिफॉर्म, परिवहन, परीक्षा शुल्क और अन्य शैक्षणिक संसाधनों की खरीद का बोझ गरीब परिवारों के लिए असहनीय हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में, बच्चे धीरे-धीरे स्कूल से अनुपस्थित रहने लगते हैं और अंततः पढ़ाई छोड़ने की स्थिति में पहुंच जाते हैं।
नामांकन के साथ-साथ बच्चों को स्कूल में बनाए रखना भी आवश्यक
प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने बच्चों ने स्कूल में प्रवेश लिया है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे पहली कक्षा से लेकर 12वीं कक्षा तक लगातार शिक्षा प्राप्त करते रहें।
रिपोर्ट में सामने आया लगभग 63 प्रतिशत का आंकड़ा इसी ‘रिटेंशन’ (बच्चों को स्कूल में बनाए रखने) की गंभीर चुनौती को रेखांकित करता है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा आंकड़ों में ड्रॉपआउट को विभिन्न स्तरों पर मापा जाता है, और 12वीं कक्षा तक का समग्र ड्रॉपआउट प्रतिशत उसी प्रकार प्रकाशित नहीं होता। उपलब्ध UDISE+ विश्लेषण के अनुसार, 2025-26 में माध्यमिक स्तर पर राष्ट्रीय ड्रॉपआउट दर 9.5 प्रतिशत बताई गई है।
सरकारी स्कूलों का प्रदर्शन उम्मीद जगाता है, पर चुनौती बनी है
हालिया बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में सरकारी स्कूलों का प्रदर्शन कई स्तरों पर बेहतर रहा है। 2026 में, कक्षा 12वीं में सरकारी स्कूलों का परिणाम 80.43 प्रतिशत रहा, जबकि गैर-सरकारी स्कूलों का परिणाम 69.67 प्रतिशत दर्ज किया गया। इससे यह पता चलता है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की शैक्षणिक क्षमता को लेकर बनी हुई आम धारणा से कुछ अलग तस्वीर भी सामने आती है।
हालांकि, परीक्षा परिणाम और स्कूल में नियमित उपस्थिति बनाए रखने की चुनौती दो अलग-अलग पहलू हैं। बेहतर परिणाम देने वाले मेधावी विद्यार्थियों के साथ-साथ उन बच्चों तक पहुंचना भी अत्यंत आवश्यक है जो स्कूल व्यवस्था से बीच में ही बाहर हो जाते हैं।
हजारों स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बेहद कम
प्रदेश में कम नामांकन वाले विद्यालयों की एक बड़ी संख्या शिक्षा व्यवस्था के सामने बदलती जनसंख्या की प्रवृत्ति और नामांकन के घटते रुझान को भी उजागर करती है। 2026-27 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के हजारों विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या अत्यंत न्यून है। एक विश्लेषण के अनुसार, 6,002 विद्यालयों में 10 से कम विद्यार्थी और 13,820 विद्यालयों में 20 से कम विद्यार्थी नामांकित हैं।
ऐसे स्कूलों के भविष्य को लेकर सरकार के सामने दोहरी चुनौती है: एक ओर, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर और कुशल उपयोग सुनिश्चित करना, और दूसरी ओर, यह सुनिश्चित करना कि स्कूलों के पुनर्गठन या विलय की प्रक्रिया के कारण बच्चों की शिक्षा में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो।
स्कूल ड्रॉपआउट को रोकने के प्रभावी समाधान की आवश्यकता
ड्रॉपआउट की समस्या को रोकने के लिए केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना या उनका विलय करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए स्थानीय स्तर पर ऐसे शिक्षा मॉडल विकसित करने की आवश्यकता है जो स्कूल की दूरी, परिवहन की सुविधा, परिवारों की आर्थिक स्थिति और बच्चों की नियमित उपस्थिति जैसे मुद्दों पर एक साथ काम कर सकें।
दूरदराज के इलाकों में बच्चों के लिए सुगम परिवहन की व्यवस्था, सुरक्षित आवागमन के लिए छात्रावास या अन्य सुविधाओं का निर्माण, कमजोर आय वर्ग के परिवारों के बच्चों के लिए विशेष सहायता कार्यक्रम, और स्कूल छोड़ चुके बच्चों की पुनः पहचान कर उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए प्रभावी तंत्र स्थापित किए जा सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, स्कूलों के विलय या पुनर्गठन से पूर्व, स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर यह आकलन करना अत्यंत आवश्यक है कि प्रस्तावित नए विद्यालय की दूरी वास्तव में बच्चों की पहुंच के भीतर है या नहीं।
समस्या सिर्फ 12 लाख बच्चों की नहीं, बल्कि भविष्य के अवसर की है
स्कूल से बाहर रह रहा प्रत्येक बच्चा केवल एक आंकड़ा नहीं है; उसके पीछे एक परिवार की उम्मीदें, एक आर्थिक हकीकत और उसके भविष्य का एक अनमोल अवसर जुड़ा हुआ है। यदि कोई बच्चा प्राथमिक स्तर पर ही शिक्षा से वंचित रह जाता है, तो उसके लिए भविष्य में कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर भी सीमित हो जाते हैं।
इसलिए, मध्य प्रदेश के सामने चुनौती केवल 12 लाख बच्चों को स्कूल तक वापस लाने की नहीं है, बल्कि एक ऐसी मजबूत और समावेशी शिक्षा व्यवस्था बनाने की है, जिसमें प्रत्येक बच्चा न केवल स्कूल तक पहुंचे, नियमित रूप से पढ़े, बल्कि बिना किसी मजबूरी या बाधा के अपनी माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा सफलतापूर्वक पूरी कर सके। अंततः, स्कूल की घंटी तभी सार्थक होगी जब उसकी आवाज प्रत्येक बच्चे तक पहुंचे, और कोई भी बच्चा दूरी, गरीबी या व्यवस्था की कमियों के कारण उस आवाज से कोसों दूर न रह जाए।
