कॉमन फाइबुलर नर्व की चोट: फुट ड्रॉप का एक प्रमुख कारण
घुटने के पास की यह नर्व चोटों के प्रति संवेदनशील होती है, जिससे पैर का गिरना (फुट ड्रॉप) जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

द क्लिफ न्यूज़ | 9 अगस्त 2026
कॉमन फाइबुलर नर्व, जिसे कॉमन पेरोनियल नर्व के नाम से भी जाना जाता है, साइटिक नर्व की एक महत्वपूर्ण शाखा है। यह नर्व घुटने के बाहरी हिस्से से होकर गुजरती है और फाइबुला की गर्दन के चारों ओर घूमती है। इस संवेदनशील क्षेत्र में, हड्डी और त्वचा के अत्यंत निकट होने के कारण, यह नर्व चोट, फ्रैक्चर, दबाव और घुटने की गंभीर चोटों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है। इस नर्व को होने वाली क्षति का सबसे आम और गंभीर परिणाम 'फुट ड्रॉप' है, जिसमें पैर का आगे का हिस्सा नीचे की ओर गिर जाता है।
कॉमन फाइबुलर नर्व में चोट लगने के कई कारण हो सकते हैं। फाइबुलर हेड या गर्दन का फ्रैक्चर, घुटने का डिसलोकेशन, गंभीर लिगामेंट चोटें और प्रॉक्सिमल टिबियोफाइबुलर जॉइंट को नुकसान इसके सामान्य कारण हैं। इसके अतिरिक्त, सीधे कटने या किसी अन्य प्रकार की भेदक चोट (penetrating trauma) भी नर्व को क्षतिग्रस्त कर सकती है। कृत्रिम उपकरणों के कारण होने वाला दबाव, जैसे कि टाइट प्लास्टर या कास्ट, ब्रेस का लंबे समय तक उपयोग, पैर क्रॉस करके लंबे समय तक बैठना, और घुटने की सर्जरी या आर्थ्रोप्लास्टी के दौरान भी नर्व पर दबाव पड़ सकता है। अन्य कारणों में ट्रैक्शन इंजरी, लंबे समय तक निष्क्रियता, ट्यूमर का बढ़ना या किसी अन्य संरचनात्मक दबाव का उत्पन्न होना शामिल है।
नर्व क्षति के लक्षण और पहचान
जब कॉमन फाइबुलर नर्व का मोटर फंक्शन प्रभावित होता है, तो टखने को ऊपर उठाने (डॉर्सिफ्लेक्सन) की क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे फुट ड्रॉप की स्थिति उत्पन्न होती है। इस स्थिति में, व्यक्ति को चलते समय अपने पैर को सामान्य से अधिक ऊपर उठाना पड़ता है, जिसे 'हाई-स्टेपिंग गैट' के रूप में जाना जाता है। पैर की उंगलियों को सीधा करने (एक्सटेंशन) और पैर को बाहर की ओर मोड़ने (इवर्शन) की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।
संवेदी लक्षणों में पैर के आगे-बाहरी हिस्से तथा पैर के ऊपरी भाग (डोरसम) में सुन्नपन, झनझनाहट या स्पर्श की अनुभूति में कमी शामिल है। विशेष रूप से, पहले वेब स्पेस (पहले और दूसरे पैर की उंगली के बीच की त्वचा) में संवेदना की जांच, डीप फाइबुलर नर्व के प्रभावित होने का एक महत्वपूर्ण संकेतक हो सकती है।
नैदानिक प्रक्रिया और परीक्षण
क्लिनिकल जांच में, डॉक्टर विभिन्न मांसपेशियों के कार्य और नर्व की कार्यक्षमता का विस्तृत परीक्षण करते हैं। टखने को ऊपर उठाने (डॉर्सिफ्लेक्सन) और बड़े पैर की उंगली को सीधा करने (ग्रेट-टो एक्सटेंशन) की क्रियाएं मुख्य रूप से डीप फाइबुलर नर्व द्वारा नियंत्रित होती हैं। वहीं, पैर को बाहर की ओर मोड़ने (फुट इवर्शन) की क्रिया सुपरफिशियल फाइबुलर नर्व के कार्य को दर्शाती है। यदि डॉर्सिफ्लेक्सन और इवर्शन दोनों कमजोर हैं, लेकिन पैर को अंदर की ओर मोड़ने (फुट इनवर्जन) की क्षमता सामान्य है, तो यह कॉमन फाइबुलर न्यूरोपैथी का एक मजबूत संकेत है। इसके विपरीत, यदि इनवर्जन भी कमजोर पाया जाता है, तो L5 रेडिकुलोपैथी या साइटिक नर्व के अधिक ऊपरी हिस्से में चोट की संभावना पर विचार किया जाता है। आमतौर पर, इस नर्व की चोट में प्रमुख डीप टेंडन रिफ्लेक्स (जैसे घुटने का झटका) में कोई विशेष कमी नहीं देखी जाती है।
निदान की पुष्टि के लिए विभिन्न इमेजिंग तकनीकों का उपयोग किया जाता है। एक्स-रे के माध्यम से घुटने, फाइबुलर हेड और संबंधित फ्रैक्चर की जांच की जाती है। एमआरआई (MRI) या अल्ट्रासाउंड जैसी उन्नत तकनीकें नर्व की अखंडता, किसी भी प्रकार के दबाव, हेमेटोमा (खून का थक्का), ट्यूमर या अन्य संरचनात्मक असामान्यताओं का पता लगाने में सहायक होती हैं। इलेक्ट्रोमायोग्राफी (EMG) और नर्व कंडक्शन स्टडीज (NCS) नर्व चोट की सटीक स्थिति, उसकी गंभीरता और रिकवरी की संभावना का आकलन करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। प्रारंभिक जांच के बाद, आवश्यकतानुसार इन परीक्षणों को दोहराया जा सकता है। गंभीर ट्रॉमा के मामलों में, घुटने के लिगामेंट्स, रक्त वाहिकाओं और कम्पार्टमेंट सिंड्रोम जैसी अन्य संभावित समस्याओं की जांच भी आवश्यक हो जाती है।
उपचार के विकल्प और पुनर्वास
कॉमन फाइबुलर नर्व इंजरी का उपचार चोट के प्रकार और उसकी गंभीरता पर निर्भर करता है। हल्की न्यूराप्रैक्सिया (नर्व का अस्थायी अवरोध) या दबाव के मामलों में, दबाव के स्रोत को हटाना, संबंधित फ्रैक्चर या डिसलोकेशन का उचित उपचार और नियमित न्यूरोलॉजिकल निगरानी महत्वपूर्ण कदम हैं। फुट ड्रॉप की स्थिति में, चलने-फिरने में सहायता के लिए एंकल-फुट ऑर्थोसिस (AFO) नामक उपकरण का उपयोग किया जाता है। इसके साथ ही, फिजियोथेरेपी, सक्रिय और निष्क्रिय रेंज ऑफ मोशन व्यायाम, और टखने के संकुचन (equinus contracture) की रोकथाम भी उपचार का अभिन्न अंग हैं। यदि आवश्यक हो, तो नर्व संबंधी दर्द के प्रबंधन के लिए दवाएं दी जा सकती हैं।
गंभीर मामलों में, जैसे कि खुली चोट, नर्व का पूरी तरह से कट जाना (nerve transection), बढ़ती हुई न्यूरोलॉजिकल कमी, या स्पष्ट नर्व कम्प्रेशन की स्थिति में, सर्जिकल हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है। इसमें नर्व की जांच (surgical exploration) और दबाव को कम करना (decompression) शामिल है। यदि नर्व पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई है, तो चोट के स्तर और प्रकृति के आधार पर प्राथमिक नर्व रिपेयर या नर्व ग्राफ्टिंग की आवश्यकता पड़ सकती है। यदि लंबे समय तक उपचार के बाद भी पैर में कमजोरी बनी रहती है और पर्याप्त रिकवरी नहीं होती है, तो चयनित मरीजों के लिए बाद में टेंडन ट्रांसफर जैसे पुनर्निर्माण सर्जरी के विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है।
रोग का निदान और दीर्घकालिक प्रबंधन
कॉमन फाइबुलर नर्व इंजरी का रोग निदान (prognosis) मुख्य रूप से चोट की गंभीरता पर निर्भर करता है। न्यूराप्रैक्सिया जैसी हल्की चोटें अक्सर कुछ हफ्तों या महीनों में स्वतः ठीक हो जाती हैं। हालांकि, गंभीर एक्सोनल चोट या न्यूरोटमेसिस (नर्व का पूर्ण विघटन) की स्थिति में रिकवरी सीमित हो सकती है।
घुटने के डिसलोकेशन या फाइबुलर-हेड फ्रैक्चर के बाद, प्रारंभिक मोटर और संवेदी जांच के साथ-साथ नियमित अंतराल पर EMG/NCS परीक्षणों का दस्तावेजीकरण, उपचार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित होता है। यह डॉक्टरों को यह तय करने में मदद करता है कि क्या मरीज को केवल निगरानी और पुनर्वास की आवश्यकता है, या उसे डीकंप्रेशन, नर्व रिपेयर, ग्राफ्टिंग, या भविष्य में टेंडन ट्रांसफर जैसी अधिक हस्तक्षेपकारी सर्जिकल प्रक्रियाओं पर विचार करना चाहिए।
