BREAKING
Revolutionary climate technology breakthrough announced • Championship finals draw record 150M+ viewers • Global markets surge following policy changes • New discovery in quantum computing promises faster processors
The Cliff News
National

केन-बेतवा परियोजना: हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगी रिपोर्ट, पन्ना टाइगर रिजर्व पर मंडराया खतरा

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने केन-बेतवा लिंक परियोजना की पर्यावरणीय चिंताओं पर केंद्र सरकार को सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। पन्ना...

Few mins ago
4 मिनट में पढ़ें
•संवाददाता: शफी ख़ान
केन-बेतवा परियोजना: हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगी रिपोर्ट, पन्ना टाइगर रिजर्व पर मंडराया खतरा

Jabalpur | संवाददाता: शफी ख़ान

द क्लिफ न्यूज़ | जबलपुर | 9 अक्टूबर 2026

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने केन-बेतवा लिंक परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों और वन एवं वन्यजीवों पर पड़ने वाले संभावित खतरों के मद्देनजर केंद्र सरकार को सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इस निर्देश के साथ ही बुंदेलखंड क्षेत्र की बहुचर्चित और महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना के भविष्य पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

जबलपुर निवासी अधिवक्ता अरिहंत तिवारी द्वारा दायर याचिका में परियोजना के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व के एक बड़े हिस्से के डूबने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, परियोजना के चलते पन्ना टाइगर रिजर्व का आधे से अधिक क्षेत्र जलमग्न हो सकता है, जिससे न केवल वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर गंभीर संकट आएगा, बल्कि उनके विचरण के लिए बने वन्यजीव गलियारे भी बाधित हो जाएंगे। यह स्थिति वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर सकती है।

पर्यावरणीय चिंताओं पर उठाए गए गंभीर सवाल

याचिका में परियोजना के पर्यावरणीय विनाशकारी पहलुओं को प्रमुखता से उजागर किया गया है। अधिवक्ता तिवारी ने अदालत को बताया कि इस परियोजना के निर्माण के लिए लगभग 60 लाख पेड़ों की कटाई की जाएगी। यह कटाई ऐसे समय में प्रस्तावित है जब बुंदेलखंड क्षेत्र पहले से ही भीषण सूखे और जल संकट से जूझ रहा है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों के काटे जाने से न केवल पर्यावरण की गुणवत्ता में भारी गिरावट आएगी, बल्कि यह क्षेत्र के वर्षा चक्र को भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है, जिससे जल संकट और गहराने की आशंका है।

इसके अतिरिक्त, याचिका में वर्ष 2017 में जारी की गई पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने इस रिपोर्ट को तथ्यात्मक त्रुटियों से भरा बताते हुए इसकी निष्पक्षता पर संदेह व्यक्त किया है। यह दावा किया गया है कि रिपोर्ट में परियोजना के संभावित दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों का पर्याप्त और सटीक मूल्यांकन नहीं किया गया है।

केन घड़ियाल अभयारण्य और विस्थापन का मुद्दा

याचिका में केन घड़ियाल अभयारण्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (NBWL) की स्थायी समिति ने परियोजना के कारण डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में स्थित घड़ियाल अभयारण्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का पर्याप्त वैज्ञानिक आकलन नहीं किया है। इस संबंध में एक स्वतंत्र और गहन वैज्ञानिक अध्ययन की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया गया है।

परियोजना से स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव को लेकर भी चिंताएं जताई गई हैं। याचिका में कहा गया है कि छतरपुर जिले में परियोजना के विरोध में चल रहे आंदोलनों के दौरान स्थानीय आदिवासी और किसान समुदायों पर प्रशासनिक दबाव बनाने के गंभीर आरोप लगे हैं। इस दबाव के चलते लोगों को अपनी आवाज उठाने या विरोध दर्ज कराने में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।

परियोजना का इतिहास और अदालत का निर्देश

केन-बेतवा लिंक परियोजना की परिकल्पना मूल रूप से 1980 के दशक में की गई थी, लेकिन इसे धरातल पर उतारने की प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2021 में इस परियोजना के वित्त पोषण को मंजूरी प्रदान की थी। परियोजना का मुख्य उद्देश्य केन नदी के अतिरिक्त जल को बेतवा बेसिन में स्थानांतरित कर बुंदेलखंड के कई जिलों को सिंचाई और पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराना है, ताकि इस क्षेत्र में जल की कमी को दूर किया जा सके।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने परियोजना के घोषित लाभों के दावों के साथ-साथ इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का निष्पक्ष एवं पारदर्शी मूल्यांकन करने की मांग की है। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता ने स्वयं अदालत के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत किया। केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील जैन और राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने सुनवाई में भाग लिया।

उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देशित किया है कि वह सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट में उल्लिखित कथित अनियमितताओं और इस मामले से संबंधित सुप्रीम कोर्ट में लंबित कार्यवाही की वर्तमान स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी प्रस्तुत करे। इसके साथ ही, मध्य प्रदेश सरकार को भी यह बताना होगा कि सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर उसने अब तक क्या कदम उठाए हैं और किन नीतियों पर अमल किया है।

इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 के लिए निर्धारित की गई है। न्यायालय का यह रुख न केवल परियोजना के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और विकास की परियोजनाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक कानूनी नज़ीर भी पेश कर सकता है।

संबंधित समाचार